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Faridabad News: लकवा होने के बाद दोनों बेटों ने धक्के मारकर घर से निकाला...
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जिनको उंगली पकड़कर चलना सिखाया आखिरी समय में उन्होंने छोड़ दिया हाथ
अंतरराष्ट्रीय वृद्ध जन दिवस :
वृद्धाश्रम में अपनों से मिलने के इंतजार में 30 बुजुर्ग
संवाद न्यूज एजेंसी
फरीदाबाद। आजकल सभी की यही चाह होती है कि उनका अंतिम समय उनके परिवार के साथ बीते, लेकिन कई बुजुर्ग बेटों और बहुओं की बेरुखी के चलते जीवन के अंतिम समय में वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर हैं। अंतरराष्ट्रीय वृद्ध जन दिवस के मौके पर एनआईटी-दो स्थित ताऊ देवीलाल वृद्धाश्रम में बातचीत के दौरान बुजुर्ग उमेश कुमार ने बताया कि उनको लकवा होने के बाद दोनों बेटों ने उन्हें घर से धक्के मारकर बाहर निकाल दिया। रुंधे हुए गले से उन्होंने बताया कि जिनको उंगली पकड़कर चलना सिखाया, आज उन्होंने ही आखिरी समय में हमारा हाथ छोड़ दिया। बुजुर्ग उमेश कुमार तो बस एक मिसाल भर हैं न जाने कितने ऐसे बुजुर्ग अपने अपनों के सताए हुए हैं।
बुजुर्गों को उम्र के जिस पड़ाव में अपनों की जरूरत पड़ती है उस समय वह अकेले में जीवन जीने को मजबूर हैं। बुजुर्गों को तो जीते जी सम्मान चाहिए होता है। दो वक्त की रोटी के साथ उनके लिए तो परिवार की खुशियां ही बचती है। वहीं, आज ताऊ देवीलाल वृद्धाश्रम में करीब 30 बुजुर्ग अपनों से मिलने के लिए काफी आतुर हैं। घंटों तक उनको याद करके आंखों से आंसू बहाते रहते हैं लेकिन उनके परिवार की ओर से कोई भी उनकी सुध लेने नहीं आता। अंतरराष्ट्रीय वृद्ध जन दिवस के मौके पर अमर उजाला के संवाददाता ने वृद्ध आश्रम पहुंचकर कुछ बजुर्गों से उनकी कहानी जानी।
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पिछले पांच वर्ष से वृद्धाश्रम में जीवन काट रहा हूं। मेरे परिवार में पत्नी और दो बेटों ने मुझे लकवा मारने के बाद घर से धक्के मारकर बाहर निकाल दिया। इसके बाद मैं कुछ दिन भगत सिंह कॉलोनी में अपनी 80 वर्ष की मां के पास रहा। जब उनसे मेरी देखभाल न हुई तो मैं वृद्धाश्रम आ गया। आज भी बेटों की याद आती है, लेकिन मैं उनसे मिल नहीं सकता हूं।
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-उमेश कुमार, भगत सिंह कॉलोनी
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उत्तराखंड से यहां नौकरी करने आया था। एक निजी कंपनी में ड्यूटी करते समय लकवा मार गया। परिवार में एक बेटा और एक बेटी है। वह उत्तराखंड में ही रहते हैं। पिछले एक साल से इस वृद्धाश्रम में हूं। बेटी लेने आई थी, लेकिन मैं गया नहीं लेकिन बेटे ने आज तक मुझसे कभी बात करने की कोशिश भी नहीं की और न ही मुझे लेने आया। कई बार आश्रम में बैठकर घंटों उनके बारे में सोचता हूं तो आंखों से आंसू आ जाते हैं। आश्रम में आने के बाद यहां समय से खाना और दवा मिल जाती है।
-धनराज भंडारी, सेक्टर-15ए
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पति और बेटे के साथ यहां काम करने आई थी लेकिन पति की एक दुर्घटना में मौत हो गई। इसके बाद मैं बीमार हो गई। बीमार होने के बाद बीके अस्पताल के बाहर बैठी रहती थी। इस दौरान मेरे बेटे ने एक बार भी मुझसे बात नहीं की। वृद्धाश्रम आने के बाद अब में घर के बारे में ही सोचती रहती हूं। पिछले तीन साल से यहां हूं। यहां खाना और दवा समय पर मिलती जाती है।
-अनीता, रोहतक
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पति और दो बेटों के साथ रहती थी और हम सभी एयरपोर्ट पर नौकरी करते थे। पति और दोनों बेटों की भी मौत होने के बाद घर की बहुओं ने घर से बाहर निकाल दिया और घर पर कब्जा कर लिया। इसके बाद मैं वृद्धाश्रम आ गई और अब यही पर जीवन व्यतीत कर रही हूं।
-संतोष, महिपालपुर
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अंतरराष्ट्रीय वृद्ध जन दिवस :
वृद्धाश्रम में अपनों से मिलने के इंतजार में 30 बुजुर्ग
संवाद न्यूज एजेंसी
फरीदाबाद। आजकल सभी की यही चाह होती है कि उनका अंतिम समय उनके परिवार के साथ बीते, लेकिन कई बुजुर्ग बेटों और बहुओं की बेरुखी के चलते जीवन के अंतिम समय में वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर हैं। अंतरराष्ट्रीय वृद्ध जन दिवस के मौके पर एनआईटी-दो स्थित ताऊ देवीलाल वृद्धाश्रम में बातचीत के दौरान बुजुर्ग उमेश कुमार ने बताया कि उनको लकवा होने के बाद दोनों बेटों ने उन्हें घर से धक्के मारकर बाहर निकाल दिया। रुंधे हुए गले से उन्होंने बताया कि जिनको उंगली पकड़कर चलना सिखाया, आज उन्होंने ही आखिरी समय में हमारा हाथ छोड़ दिया। बुजुर्ग उमेश कुमार तो बस एक मिसाल भर हैं न जाने कितने ऐसे बुजुर्ग अपने अपनों के सताए हुए हैं।
बुजुर्गों को उम्र के जिस पड़ाव में अपनों की जरूरत पड़ती है उस समय वह अकेले में जीवन जीने को मजबूर हैं। बुजुर्गों को तो जीते जी सम्मान चाहिए होता है। दो वक्त की रोटी के साथ उनके लिए तो परिवार की खुशियां ही बचती है। वहीं, आज ताऊ देवीलाल वृद्धाश्रम में करीब 30 बुजुर्ग अपनों से मिलने के लिए काफी आतुर हैं। घंटों तक उनको याद करके आंखों से आंसू बहाते रहते हैं लेकिन उनके परिवार की ओर से कोई भी उनकी सुध लेने नहीं आता। अंतरराष्ट्रीय वृद्ध जन दिवस के मौके पर अमर उजाला के संवाददाता ने वृद्ध आश्रम पहुंचकर कुछ बजुर्गों से उनकी कहानी जानी।
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पिछले पांच वर्ष से वृद्धाश्रम में जीवन काट रहा हूं। मेरे परिवार में पत्नी और दो बेटों ने मुझे लकवा मारने के बाद घर से धक्के मारकर बाहर निकाल दिया। इसके बाद मैं कुछ दिन भगत सिंह कॉलोनी में अपनी 80 वर्ष की मां के पास रहा। जब उनसे मेरी देखभाल न हुई तो मैं वृद्धाश्रम आ गया। आज भी बेटों की याद आती है, लेकिन मैं उनसे मिल नहीं सकता हूं।
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-उमेश कुमार, भगत सिंह कॉलोनी
उत्तराखंड से यहां नौकरी करने आया था। एक निजी कंपनी में ड्यूटी करते समय लकवा मार गया। परिवार में एक बेटा और एक बेटी है। वह उत्तराखंड में ही रहते हैं। पिछले एक साल से इस वृद्धाश्रम में हूं। बेटी लेने आई थी, लेकिन मैं गया नहीं लेकिन बेटे ने आज तक मुझसे कभी बात करने की कोशिश भी नहीं की और न ही मुझे लेने आया। कई बार आश्रम में बैठकर घंटों उनके बारे में सोचता हूं तो आंखों से आंसू आ जाते हैं। आश्रम में आने के बाद यहां समय से खाना और दवा मिल जाती है।
-धनराज भंडारी, सेक्टर-15ए
पति और बेटे के साथ यहां काम करने आई थी लेकिन पति की एक दुर्घटना में मौत हो गई। इसके बाद मैं बीमार हो गई। बीमार होने के बाद बीके अस्पताल के बाहर बैठी रहती थी। इस दौरान मेरे बेटे ने एक बार भी मुझसे बात नहीं की। वृद्धाश्रम आने के बाद अब में घर के बारे में ही सोचती रहती हूं। पिछले तीन साल से यहां हूं। यहां खाना और दवा समय पर मिलती जाती है।
-अनीता, रोहतक
पति और दो बेटों के साथ रहती थी और हम सभी एयरपोर्ट पर नौकरी करते थे। पति और दोनों बेटों की भी मौत होने के बाद घर की बहुओं ने घर से बाहर निकाल दिया और घर पर कब्जा कर लिया। इसके बाद मैं वृद्धाश्रम आ गई और अब यही पर जीवन व्यतीत कर रही हूं।
-संतोष, महिपालपुर