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पूरी अरावली है वन क्षेत्र
Updated Fri, 05 Oct 2018 11:12 PM IST
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पूरी अरावली है वन क्षेत्र
फरीदाबाद। औद्योगिक नगरी में अरावली संरक्षण का प्रयास कर रहे लोगों के लिए खुशखबरी है। एनसीआर प्लानिंग बोर्ड की हाल ही में जारी की अपनी रिपोर्ट में पूरे अरावली क्षेत्र को वन क्षेत्र घोषित किया है। रिपोर्ट मेें गैर मुमकिन (कृषि के अयोग्य) पहाड़, भूड़ या चाही वन क्षेत्र को अरावली वनों का अभिन्न अंग घोषित किया है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले और एनसीआर प्लानिंग बोर्ड की रिपोर्ट लागू होने पर अरावली में 1992 के बाद जो भी निर्माण हुए हैं, उन्हें अब गिराया जा सकता है।
एनसीआर प्लानिंग बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, पूरी अरावली पहाड़ियां और उनकी प्राकृतिक संपदा वन क्षेत्र में ही आते हैं। अरावली में स्थित गैर मुमकिन पहाड़ हो, भूड़ एरिया या चाही वन क्षेत्र यह सभी जंगल हैं। इसके अलावा पंजाब लैंड प्रिजर्वेशन एक्ट 1900 के तहत आने वाली जमीन को भी वन क्षेत्र घोषित किया है। एनसीआर प्लानिंग बोर्ड की रिपोर्ट लागू होने से कांत एंक्लेव के अलावा, लेकवुड (इरोज डेवलपर्स), केनवुड मर्केंटाइल, कई फार्म हाउस, बैंक्वट हॉल, इमारतें, हुडा के सेक्टर-44 और 47, जिमखाना क्लब सेक्टर-21 सी, सेक्टर-47 स्थित फायर स्टेशन, सेक्टर-44 स्थित पुलिस चौकी के अतिरिक्त लेजर वैली का 49 एकड़ एरिया, निजी विश्वविद्यालय सहित अन्य संस्थाएं भी वन के अभिन्न क्षेत्र में विकसित की गई हैं। पर्यावरण प्रेमी सुनील हरसाना कहते हैं कि एनसीआर प्लानिंग बोर्ड की रिपोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसले से अरावली की हरियाली और वन बच जाने की आशा जागी है। प्रभारी जिला वन अधिकारी सुरेंद्र पुनिया ने बताया कि एनसीआर प्लानिंग बोर्ड ने भूड़, चाही और गैरमुमकिन पहाड़ को वन क्षेत्र माना है, इस संबंध में प्रदेश मुख्यालय से जो भी निर्देश मिलेंगे उन्हें लागू करवाया जाएगा।
सरकार का बदलना होगा वन क्षेत्र के प्रति नजरिया
अरावली संरक्षण का प्रयास कर रहे सेव फरीदाबाद गु्रप के सदस्य विष्णु गोयल ने बताया कि दरअसल सरकार अरावली के गैर मुमकिन पहाड़, चाही और भूड़ एरिया को वन क्षेत्र नहीं मानती थी। यही कारण है कि सरकार ने इन क्षेत्रों में 1992 से पहले हुए निर्माण प्रोजेक्टस को नियमित कर दिया था। 1992 में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने वन की परिभाषा तय की, इसके बाद अरावली में निर्माण कार्यों पर रोक लगा दी गई। वह बताते हैं कि सरकार ने 2018 में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को पत्र लिखकर ऐसे गैरमुमकिन पहाड़, भूड़ और चाही एरिया जिनमें अरावली की परंपरागत वनस्पति 30 फीसदी से कम हो, वन क्षेत्र में शामिल नहीं किए जाने का अनुरोध किया था, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने इसे अस्वीकृत करते हुए पूरी अरावली को वन क्षेत्र घोषित किया था।
फरीदाबाद। औद्योगिक नगरी में अरावली संरक्षण का प्रयास कर रहे लोगों के लिए खुशखबरी है। एनसीआर प्लानिंग बोर्ड की हाल ही में जारी की अपनी रिपोर्ट में पूरे अरावली क्षेत्र को वन क्षेत्र घोषित किया है। रिपोर्ट मेें गैर मुमकिन (कृषि के अयोग्य) पहाड़, भूड़ या चाही वन क्षेत्र को अरावली वनों का अभिन्न अंग घोषित किया है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले और एनसीआर प्लानिंग बोर्ड की रिपोर्ट लागू होने पर अरावली में 1992 के बाद जो भी निर्माण हुए हैं, उन्हें अब गिराया जा सकता है।
एनसीआर प्लानिंग बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, पूरी अरावली पहाड़ियां और उनकी प्राकृतिक संपदा वन क्षेत्र में ही आते हैं। अरावली में स्थित गैर मुमकिन पहाड़ हो, भूड़ एरिया या चाही वन क्षेत्र यह सभी जंगल हैं। इसके अलावा पंजाब लैंड प्रिजर्वेशन एक्ट 1900 के तहत आने वाली जमीन को भी वन क्षेत्र घोषित किया है। एनसीआर प्लानिंग बोर्ड की रिपोर्ट लागू होने से कांत एंक्लेव के अलावा, लेकवुड (इरोज डेवलपर्स), केनवुड मर्केंटाइल, कई फार्म हाउस, बैंक्वट हॉल, इमारतें, हुडा के सेक्टर-44 और 47, जिमखाना क्लब सेक्टर-21 सी, सेक्टर-47 स्थित फायर स्टेशन, सेक्टर-44 स्थित पुलिस चौकी के अतिरिक्त लेजर वैली का 49 एकड़ एरिया, निजी विश्वविद्यालय सहित अन्य संस्थाएं भी वन के अभिन्न क्षेत्र में विकसित की गई हैं। पर्यावरण प्रेमी सुनील हरसाना कहते हैं कि एनसीआर प्लानिंग बोर्ड की रिपोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसले से अरावली की हरियाली और वन बच जाने की आशा जागी है। प्रभारी जिला वन अधिकारी सुरेंद्र पुनिया ने बताया कि एनसीआर प्लानिंग बोर्ड ने भूड़, चाही और गैरमुमकिन पहाड़ को वन क्षेत्र माना है, इस संबंध में प्रदेश मुख्यालय से जो भी निर्देश मिलेंगे उन्हें लागू करवाया जाएगा।
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सरकार का बदलना होगा वन क्षेत्र के प्रति नजरिया
अरावली संरक्षण का प्रयास कर रहे सेव फरीदाबाद गु्रप के सदस्य विष्णु गोयल ने बताया कि दरअसल सरकार अरावली के गैर मुमकिन पहाड़, चाही और भूड़ एरिया को वन क्षेत्र नहीं मानती थी। यही कारण है कि सरकार ने इन क्षेत्रों में 1992 से पहले हुए निर्माण प्रोजेक्टस को नियमित कर दिया था। 1992 में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने वन की परिभाषा तय की, इसके बाद अरावली में निर्माण कार्यों पर रोक लगा दी गई। वह बताते हैं कि सरकार ने 2018 में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को पत्र लिखकर ऐसे गैरमुमकिन पहाड़, भूड़ और चाही एरिया जिनमें अरावली की परंपरागत वनस्पति 30 फीसदी से कम हो, वन क्षेत्र में शामिल नहीं किए जाने का अनुरोध किया था, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने इसे अस्वीकृत करते हुए पूरी अरावली को वन क्षेत्र घोषित किया था।
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