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अमर उजाला अभियान: संरक्षित अरावली से कांत एंक्लेव ही नहीं अन्य निर्माण भी हटें
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अमर उजाला अभियान: संरक्षित अरावली से कांत एंक्लेव ही नहीं अन्य निर्माण भी हटें
फरीदाबाद। अरावली संरक्षित वन क्षेत्र में स्थापित किए गए कांत एंक्लेव ही नहीं हुडा के दो सेक्टर, सेक्टर-21 जिमखाना क्लब सहित कई निजी निर्माण चरणबद्ध तरीके से खत्म किए जाने हैं। सर्वोच्च न्यायालय को यह सलाह वर्ष 2009 में सेंट्रल एंपावर्ड कमेटी ने अरावली का सर्वे करने के बाद एक रिपोर्ट बनाकर दी थी। एक दशक के बाद कांत एंक्लेव को तोड़ने की कवायद शुरू हो गई है जबकि इसी संरक्षित अरावली में अन्य निर्माण बदस्तूर जारी हैं। महज 3.59 फीसदी वन क्षेत्र का संरक्षण करने के बजाय सरकार पीएलपीए में संशोधन कर उसे भी खत्म करना चाह रही है। सरकार को चाहिए कि सेंट्रल एंपावर्ड कमेटी की रिपोर्ट को लागू करे। सरकार से यह मांग कर रहे हैं सेव फरीदाबाद ग्रुप के सदस्य।
पर्यावरण संरक्षण के लिए काम कर रही सेव फरीदाबाद के सदस्य विष्णु गोयल बताते हैं कि एमसी मेहता बनाम केंद्र सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2008 में सेंट्रल एंपावर्ड कमेटी (सीईसी) गठित की थी। सीईसी की ओर से 13 जनवरी 2009 को पेश की गई रिपोर्ट के अनुसार अरावली संरक्षित वन क्षेत्र में कांत एंक्लेव के अलावा, लेकवुड (इरोज डेवलपर्स), केनवुड मर्केंटाइल, कई फार्म हाउस, बैंक्वेट हॉल, इमारतें, हुडा के सेक्टर-44 और 47, जिमखाना क्लब सेक्टर-21 सी, सेक्टर-47 स्थित फायर स्टेशन, सेक्टर-44 स्थित पुलिस चौकी के अतिरिक्त लेजर वैली का 49 एकड़ एरिया भी आता है। रिपोर्ट में कांत एंक्लेव को किसी भी प्रकार की छूट नही दिए जाने के साथ ही अरावली संरक्षित वन क्षेत्र में अवैध निर्माण, कॉलोनाइजेशन (जिसमें कांत एंक्लेव, लेकवुड, कर्मयोगी शेल्टर्स आदि शामिल हैं), फार्म हाउस, बैंक्वेट हॉल आदि को समयबद्ध तरीके से ध्वस्त (डिमोलिश) करवाने की सलाह दी गई थी।
समीक्षा पिटिशन किसी की, फायदा अन्य को
पवन शर्मा शून्य कहते हैं कि सीईसी रिपोर्ट के आधार पर ही सर्वोच्च न्यायालय ने संरक्षित वन क्षेत्र में सभी निर्माण कार्य रोकने और कांत एंक्लेव सहित अन्य निर्माण गिराने का आदेश दिया था। आदेश के खिलाफ कांत एंक्लेव की ओर से समीक्षा याचिका (रिव्यू पिटिशन) डाली गई थी, उसका फायदा अन्य सभी निर्माणों को मिला। विष्णु गोयल कहते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय के प्रतिबंध के कारण सरकारी प्रोजेक्ट तो रोक दिए गए लेकिन निजी निर्माण जारी रहा जो अब तक चल रहा है। रिपोर्ट में अरावली रिहैबिलिटेशन फंड बनाने के निर्देश भी दिए गए थे, इस फंड में राज्य सरकार और हुडा को 45 करोड़ रुपये जमा करवाने थे। खनन की मद से होने वाली आय में से 10 फीसदी इस फंड में डाले जाने थे। इस फंड का उपयोग अरावली संरक्षित वन क्षेत्र में हरियाली और वनीकरण करने में होना था। पर्यावरण प्रेमी वीर विक्रम का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को अरावली में हो रहे अन्य अवैध निर्माण पर भी लागू करवाया जाए इसकी मांग जारी रहेगी।
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फरीदाबाद। अरावली संरक्षित वन क्षेत्र में स्थापित किए गए कांत एंक्लेव ही नहीं हुडा के दो सेक्टर, सेक्टर-21 जिमखाना क्लब सहित कई निजी निर्माण चरणबद्ध तरीके से खत्म किए जाने हैं। सर्वोच्च न्यायालय को यह सलाह वर्ष 2009 में सेंट्रल एंपावर्ड कमेटी ने अरावली का सर्वे करने के बाद एक रिपोर्ट बनाकर दी थी। एक दशक के बाद कांत एंक्लेव को तोड़ने की कवायद शुरू हो गई है जबकि इसी संरक्षित अरावली में अन्य निर्माण बदस्तूर जारी हैं। महज 3.59 फीसदी वन क्षेत्र का संरक्षण करने के बजाय सरकार पीएलपीए में संशोधन कर उसे भी खत्म करना चाह रही है। सरकार को चाहिए कि सेंट्रल एंपावर्ड कमेटी की रिपोर्ट को लागू करे। सरकार से यह मांग कर रहे हैं सेव फरीदाबाद ग्रुप के सदस्य।
पर्यावरण संरक्षण के लिए काम कर रही सेव फरीदाबाद के सदस्य विष्णु गोयल बताते हैं कि एमसी मेहता बनाम केंद्र सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2008 में सेंट्रल एंपावर्ड कमेटी (सीईसी) गठित की थी। सीईसी की ओर से 13 जनवरी 2009 को पेश की गई रिपोर्ट के अनुसार अरावली संरक्षित वन क्षेत्र में कांत एंक्लेव के अलावा, लेकवुड (इरोज डेवलपर्स), केनवुड मर्केंटाइल, कई फार्म हाउस, बैंक्वेट हॉल, इमारतें, हुडा के सेक्टर-44 और 47, जिमखाना क्लब सेक्टर-21 सी, सेक्टर-47 स्थित फायर स्टेशन, सेक्टर-44 स्थित पुलिस चौकी के अतिरिक्त लेजर वैली का 49 एकड़ एरिया भी आता है। रिपोर्ट में कांत एंक्लेव को किसी भी प्रकार की छूट नही दिए जाने के साथ ही अरावली संरक्षित वन क्षेत्र में अवैध निर्माण, कॉलोनाइजेशन (जिसमें कांत एंक्लेव, लेकवुड, कर्मयोगी शेल्टर्स आदि शामिल हैं), फार्म हाउस, बैंक्वेट हॉल आदि को समयबद्ध तरीके से ध्वस्त (डिमोलिश) करवाने की सलाह दी गई थी।
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समीक्षा पिटिशन किसी की, फायदा अन्य को
पवन शर्मा शून्य कहते हैं कि सीईसी रिपोर्ट के आधार पर ही सर्वोच्च न्यायालय ने संरक्षित वन क्षेत्र में सभी निर्माण कार्य रोकने और कांत एंक्लेव सहित अन्य निर्माण गिराने का आदेश दिया था। आदेश के खिलाफ कांत एंक्लेव की ओर से समीक्षा याचिका (रिव्यू पिटिशन) डाली गई थी, उसका फायदा अन्य सभी निर्माणों को मिला। विष्णु गोयल कहते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय के प्रतिबंध के कारण सरकारी प्रोजेक्ट तो रोक दिए गए लेकिन निजी निर्माण जारी रहा जो अब तक चल रहा है। रिपोर्ट में अरावली रिहैबिलिटेशन फंड बनाने के निर्देश भी दिए गए थे, इस फंड में राज्य सरकार और हुडा को 45 करोड़ रुपये जमा करवाने थे। खनन की मद से होने वाली आय में से 10 फीसदी इस फंड में डाले जाने थे। इस फंड का उपयोग अरावली संरक्षित वन क्षेत्र में हरियाली और वनीकरण करने में होना था। पर्यावरण प्रेमी वीर विक्रम का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को अरावली में हो रहे अन्य अवैध निर्माण पर भी लागू करवाया जाए इसकी मांग जारी रहेगी।
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