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Delhi NCR News: डीयू में दाखिले के लिए बदल सकती है सीट मैट्रिक्स
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कुलपति ने कम से कम राउंड में बेहतर आवंटन के लिए कॉलेजों को मैट्रिक्स पर फिर से विचार करने की सलाह दी
कॉलेजों में सीटें खाली रहने का कारण सीयूईटी नहीं है : प्रो योगेश सिंह
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय में अगले शैक्षणिक सत्र (2026-27) के दाखिले के लिए सीट मैट्रिक्स बदल सकती हैं। डीयू कुलपति ने कॉलेजों को कम से कम राउंड में सीटों के बेहतर आवंटन के लिए सीट मैट्रिक्स पर फिर से विचार करने की सलाह दी गई है। कॉलेजों में कई राउंड के आवंटन के बाद भी खाली रह गई सीटों को भरने के लिए प्रस्ताव देने के लिए कहा गया है। डीयू ने स्पष्ट किया है कि सीट मैट्रिक्स बदलने की स्थिति में किसी कोर्स को बंद नहीं किया जाएगा। बस प्रयास यह किया जा रहा है कि कम से कम आवंटन राउंड में सीटों को भर दिया जाए।
डीयू में हर साल दाखिले के कई राउंड के बाद भी सीटें खाली रह जाती हैं। कुलपति प्रो. योगेश सिंह ने कहा कि खाली सीटों का कारण सीयूईटी नहीं है। सीयूईटी आने के बाद विश्वविद्यालय की दाखिला प्रक्रिया केंद्रीकृत सिस्टम के साथ अधिक तार्किक, पारदर्शी और जवाबदेह हो गई है। अब प्रत्येक हित धारक को हर सीट की स्थिति की जानकारी होती है। डीयू के कॉमन सीट एलोकेशन सिस्टम में हर आवंटन को सार्वजनिक किया जाता है। कुलपति ने कहा कि कम से कम राउंड में सीटों के बेहतर आवंटन के लिए हमने कॉलेजों को अपनी सीट मैट्रिक्स पर फिर से विचार करने की सलाह दी है।
डीयू के कुछ कॉलेजों में स्नातक प्रोग्राम में खाली सीटों पर दाखिला शाखा के आंकड़ों के आधार पर स्पष्ट किया कि सीयूईटी से पहले 12वीं के अंकों से दाखिले होने पर भी कुछ सीटें खाली रह जाती थी। उन्होंने 2018, 2019 (सीयूईटी से पहले-कोविड से पहले) और 2024, 2025 (कोविड के बाद) के दाखिलों के आंकड़ों के साथ बताया कि 2019 में मेरिट आधारित दाखिलों के समय डीयू में स्नातक की कुल उपलब्ध 70735 सीटों में से 68213 ही भरी गई थी, और 3.56 फीसदी सीटें खाली रह गई थी। इस बार 2025 में सीयूईटी आधारित दाखिलों के समय कुल उपलब्ध 71,642 सीटों के मुक़ाबले 72,229 दाखिले हुए हैं। इस तरह से इस बार 0.65 फीसदी दाखिले अधिक हुए हैं।
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उन्होंने कहा कि इससे यह भी पता चलता है कि सीयूईटी से पहले दाखिलों को अनिश्चित कट-ऑफ के कारण नियंत्रित नहीं किया जा सकता था। ऐसे भी मामले सामने आए हैं जहां 11 सीटों की क्षमता पर 203 दाखिले किए गए जो कि तय सीटों से 1745 फीसदी अधिक थे। अब जो नया सिस्टम लाए हैं उससे अधिक और कम दाखिलों की समस्या नियंत्रित की जा सकती है। अब कॉलेज तय करते हैं कि वे हर कोर्स में कितनी अतिरिक्त सीटें देना चाहते हैं। यूनिवर्सिटी अब प्रोग्राम की लोकप्रियता पर अनुमानित विश्लेषण कर सकती है, जिससे दाखिला नीति बनाने में मदद मिलती है।
उन्होंने कहा कि सीयूईटी से पहले सीटों की मंजूरी पर अधिक ध्यान नहीं दिया जा सकता था। एक खास प्रोग्राम में अधिक और बिना गिनती के दाखिलों के कई मामले होते थे। लेकिन सीयूईटी आने के बाद दाखिला प्रक्रिया तार्किक, पारदर्शी हो गई है। अब जो कॉलेजों को अपनी सीट मैट्रिक्स पर विचार करने के लिए कहा गया है, उससे किसी कोर्स को बंद नहीं किया जाएगा। कोशिश सिर्फ यह है कि कम से कम आवंटन राउंड में सीटों को बेहतर तरीके से भरा जाए।
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कॉलेजों में सीटें खाली रहने का कारण सीयूईटी नहीं है : प्रो योगेश सिंह
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय में अगले शैक्षणिक सत्र (2026-27) के दाखिले के लिए सीट मैट्रिक्स बदल सकती हैं। डीयू कुलपति ने कॉलेजों को कम से कम राउंड में सीटों के बेहतर आवंटन के लिए सीट मैट्रिक्स पर फिर से विचार करने की सलाह दी गई है। कॉलेजों में कई राउंड के आवंटन के बाद भी खाली रह गई सीटों को भरने के लिए प्रस्ताव देने के लिए कहा गया है। डीयू ने स्पष्ट किया है कि सीट मैट्रिक्स बदलने की स्थिति में किसी कोर्स को बंद नहीं किया जाएगा। बस प्रयास यह किया जा रहा है कि कम से कम आवंटन राउंड में सीटों को भर दिया जाए।
डीयू में हर साल दाखिले के कई राउंड के बाद भी सीटें खाली रह जाती हैं। कुलपति प्रो. योगेश सिंह ने कहा कि खाली सीटों का कारण सीयूईटी नहीं है। सीयूईटी आने के बाद विश्वविद्यालय की दाखिला प्रक्रिया केंद्रीकृत सिस्टम के साथ अधिक तार्किक, पारदर्शी और जवाबदेह हो गई है। अब प्रत्येक हित धारक को हर सीट की स्थिति की जानकारी होती है। डीयू के कॉमन सीट एलोकेशन सिस्टम में हर आवंटन को सार्वजनिक किया जाता है। कुलपति ने कहा कि कम से कम राउंड में सीटों के बेहतर आवंटन के लिए हमने कॉलेजों को अपनी सीट मैट्रिक्स पर फिर से विचार करने की सलाह दी है।
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डीयू के कुछ कॉलेजों में स्नातक प्रोग्राम में खाली सीटों पर दाखिला शाखा के आंकड़ों के आधार पर स्पष्ट किया कि सीयूईटी से पहले 12वीं के अंकों से दाखिले होने पर भी कुछ सीटें खाली रह जाती थी। उन्होंने 2018, 2019 (सीयूईटी से पहले-कोविड से पहले) और 2024, 2025 (कोविड के बाद) के दाखिलों के आंकड़ों के साथ बताया कि 2019 में मेरिट आधारित दाखिलों के समय डीयू में स्नातक की कुल उपलब्ध 70735 सीटों में से 68213 ही भरी गई थी, और 3.56 फीसदी सीटें खाली रह गई थी। इस बार 2025 में सीयूईटी आधारित दाखिलों के समय कुल उपलब्ध 71,642 सीटों के मुक़ाबले 72,229 दाखिले हुए हैं। इस तरह से इस बार 0.65 फीसदी दाखिले अधिक हुए हैं।
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उन्होंने कहा कि इससे यह भी पता चलता है कि सीयूईटी से पहले दाखिलों को अनिश्चित कट-ऑफ के कारण नियंत्रित नहीं किया जा सकता था। ऐसे भी मामले सामने आए हैं जहां 11 सीटों की क्षमता पर 203 दाखिले किए गए जो कि तय सीटों से 1745 फीसदी अधिक थे। अब जो नया सिस्टम लाए हैं उससे अधिक और कम दाखिलों की समस्या नियंत्रित की जा सकती है। अब कॉलेज तय करते हैं कि वे हर कोर्स में कितनी अतिरिक्त सीटें देना चाहते हैं। यूनिवर्सिटी अब प्रोग्राम की लोकप्रियता पर अनुमानित विश्लेषण कर सकती है, जिससे दाखिला नीति बनाने में मदद मिलती है।
उन्होंने कहा कि सीयूईटी से पहले सीटों की मंजूरी पर अधिक ध्यान नहीं दिया जा सकता था। एक खास प्रोग्राम में अधिक और बिना गिनती के दाखिलों के कई मामले होते थे। लेकिन सीयूईटी आने के बाद दाखिला प्रक्रिया तार्किक, पारदर्शी हो गई है। अब जो कॉलेजों को अपनी सीट मैट्रिक्स पर विचार करने के लिए कहा गया है, उससे किसी कोर्स को बंद नहीं किया जाएगा। कोशिश सिर्फ यह है कि कम से कम आवंटन राउंड में सीटों को बेहतर तरीके से भरा जाए।