फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Delhi ›   Delhi NCR News ›   Don't ignore high blood sugar during pregnancy; different treatments are necessary for each woman.

Delhi NCR News: गर्भावस्था में बढ़ी शुगर को न करें नजरअंदाज, हर महिला के लिए अलग उपचार जरूरी

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sun, 07 Jun 2026 10:10 PM IST
विज्ञापन
- आईसीएमआर-एम्स के विशेषज्ञों ने अर्ली जेस्टेशनल डायबिटीज की नई समझ पर दिया जोर
विज्ञापन




अमर उजाला ब्यूरो

नई दिल्ली। गर्भावस्था के शुरुआती महीनों में ब्लड शुगर का बढ़ना मां और गर्भस्थ शिशु दोनों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर चिंता का विषय हो सकता है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि हर गर्भवती महिला में शुरुआती मधुमेह (अर्ली जेस्टेशनल डायबिटीज मेलिटस) का स्वरूप समान नहीं होता, इसलिए सभी मरीजों के लिए एक जैसी उपचार पद्धति अपनाना उचित नहीं है। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के विशेषज्ञों ने हाल ही में प्रकाशित एक लेख में इस बीमारी को लेकर नई समझ विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया है। विशेषज्ञों के अनुसार शुरुआती गर्भावधि मधुमेह के मामलों को हल्के, मध्यम और गंभीर वर्गों में विभाजित कर उपचार तय किया जाना चाहिए।
नियमित व्यायाम और समय-समय पर निगरानी जरूरी-
विशेषज्ञ डॉ. यशदीप गुप्ता के अनुसार कुछ महिलाओं में गर्भावस्था की शुरुआत में ब्लड शुगर बढ़ जाती है, लेकिन बाद में स्वतः सामान्य हो जाती है। ऐसे मामलों को रिग्रेसर श्रेणी में रखा जाता है। इन मरीजों को अनावश्यक रूप से इंसुलिन या दवाएं देने से मां और शिशु दोनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। दूसरी ओर कुछ महिलाओं में शुरुआती जांच सामान्य आती है, लेकिन 24 से 28 सप्ताह के बीच मधुमेह विकसित हो जाता है। ऐसे मामलों को पोटेंशियल जीडीएम श्रेणी में रखा गया है। एम्स निदेशक डॉ. निखिल टंडन ने कहा कि हल्के मामलों में संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और समय-समय पर निगरानी से ही ब्लड शुगर नियंत्रित की जा सकती है। उन्होंने चेतावनी दी कि अनावश्यक दवा उपचार गर्भस्थ शिशु के विकास को प्रभावित कर सकता है और जन्म के समय उसका वजन कम रह सकता है।
विज्ञापन

विशेषज्ञों ने प्रिसीजन मेडिसिन यानी व्यक्ति विशेष के अनुरूप उपचार पद्धति अपनाने की वकालत की है। उनका कहना है कि उपचार तय करते समय महिला की उम्र, वजन, पारिवारिक इतिहास, पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम और अन्य जोखिम कारकों को ध्यान में रखना चाहिए। डॉ. यशदीप गुप्ता ने गर्भवती महिलाओं को सलाह दी कि वे गर्भावस्था की शुरुआत में ही ब्लड शुगर की जांच कराएं, संतुलित खान-पान अपनाएं और नियमित शारीरिक गतिविधि बनाए रखें। साथ ही किसी भी दवा या इंसुलिन का सेवन केवल चिकित्सकीय सलाह पर ही करें।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed