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ब्रिटिश काल: एक दर्जन से अधिक अकाल से 50 से 100 मिलियन लोगों की मौत, भारत से भेजा था 45 ट्रिलियन यूएस डॉलर
Thu, 17 Jul 2025 12:31 PM IST
शाहरुख खान
सीमा शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
सीमा शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: शाहरुख खान
Updated Thu, 17 Jul 2025 12:31 PM IST
सार
ब्रिटिश काल में एक दर्जन से अधिक अकाल से 50 से 100 मिलियन लोगों की मौत हुई थी। यह आंकड़ा द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हुई मौतों के लगभग बराबर था।
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- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
ब्रिटिश काल में भारत में करीब एक दर्जन से 20 अकाल पड़े थे। खाना की कमी के चलते करीब ' 50 से 100 मिलियन ' मौतें हुई थीं। इंसानों के साथ जानवर भी अकाल की आगोश में समा गए थे। यह आंकड़ा द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हुई मौतों के लगभग बराबर था।
वर्ष 1876 से 1878 के बीच अकाल पड़ा और लोग भूख से मर रहे थे। जबकि लार्ड लिटन ने खाद्य पदार्थों के दाम कम न करने का सरकारी आदेश जारी कर रखा था। एक ओर लोग मर रहे थे और लार्ड लिटन 1876 में दिल्ली दरबार में 68000 अधिकारियों और चापलुस महाराजाओं को एक हफ्ते तक दावत दे रहा था।
यह खुलासा एनसीईआरटी की आठवीं कक्षा की सामाजिक विज्ञान की पाठयपुस्तक ' एक्सप्लोरिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियोंड ' में ब्रिटिश काल के अध्याय में किया गया है।
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एनसीईआरटी की सामाजिक विज्ञान की पाठय पुस्तक में विभिन्न इतिहासकारों ने ब्रिटिश काल को एक काला अध्याय का नाम दिया है। ब्रिटिश काल में अकाल के कारण लोगों की भूख से बेबसी के कारण ही ' भक्ति आंदोलन ' की शुरुआत हुई थी।
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वर्ष 1876 से 1878 के बीच अकाल पड़ा और लोग भूख से मर रहे थे। जबकि लार्ड लिटन ने खाद्य पदार्थों के दाम कम न करने का सरकारी आदेश जारी कर रखा था। एक ओर लोग मर रहे थे और लार्ड लिटन 1876 में दिल्ली दरबार में 68000 अधिकारियों और चापलुस महाराजाओं को एक हफ्ते तक दावत दे रहा था।
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यह खुलासा एनसीईआरटी की आठवीं कक्षा की सामाजिक विज्ञान की पाठयपुस्तक ' एक्सप्लोरिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियोंड ' में ब्रिटिश काल के अध्याय में किया गया है।
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एनसीईआरटी की सामाजिक विज्ञान की पाठय पुस्तक में विभिन्न इतिहासकारों ने ब्रिटिश काल को एक काला अध्याय का नाम दिया है। ब्रिटिश काल में अकाल के कारण लोगों की भूख से बेबसी के कारण ही ' भक्ति आंदोलन ' की शुरुआत हुई थी।
ब्रिटिश काल में ही भारत के उन्नत उद्योग धंधे, शिल्प उद्योग का पतन हुआ। इसी दौरान हिंदू संत और मुस्लिम सूफी क साथ सामने आए और अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत मानी जा सकती है। पुस्तक में 1857 की क्रांति का भी उल्लेख है। बंगाल में मंगल पांडे द्वारा ब्रिटिश अधिकारियों पर अटैक के बाद मेरठ से क्रांति होते हुए मुगल शहंशाह बहादुरशाह जफर, कानपुर, लखनऊ की घटनाओं का भी जिक्र है।
वर्ष 1835 से भारतीय शिक्षा व भाषा का पतन
पुस्तक में लिखा है कि वर्ष 1835 में ' भारतीय शिक्षा में बदलाव ' आना शुरू हुआ। या यूं कहें उस दौरान कांवेंट यानी अंग्रेजी भाषा का बोलबाला और संस्कृत व अरबी भाषा को छोटा माना गया। इसी दौरान भारतीय शिक्षा, भाषा, लिटरेचर का पतन शुरू हुआ। क्योंकि ब्रिटिश इतिहासकार और राजनीतिज्ञ थॉमस बैबिंग्टन मैकाले ने माना था कि यूरोपिय लाइब्रेरी का एक छोटा सेल्फ भी पूरी भारतीय लिखित लिटरेचर से बड़ा है। यूरोपिय की नॉलेज भारतीय शिक्षा से बड़ा है।
पुस्तक में लिखा है कि वर्ष 1835 में ' भारतीय शिक्षा में बदलाव ' आना शुरू हुआ। या यूं कहें उस दौरान कांवेंट यानी अंग्रेजी भाषा का बोलबाला और संस्कृत व अरबी भाषा को छोटा माना गया। इसी दौरान भारतीय शिक्षा, भाषा, लिटरेचर का पतन शुरू हुआ। क्योंकि ब्रिटिश इतिहासकार और राजनीतिज्ञ थॉमस बैबिंग्टन मैकाले ने माना था कि यूरोपिय लाइब्रेरी का एक छोटा सेल्फ भी पूरी भारतीय लिखित लिटरेचर से बड़ा है। यूरोपिय की नॉलेज भारतीय शिक्षा से बड़ा है।
अंग्रेजी भाषा संस्कृत और अरबी से बड़ी है। इसलिए ब्रिटिश एजुकेशन को अपनाने की जरूरत है। क्योंकि यही भाषा भारतीयों को एक क्लास या स्टैंडर्ड दे सकती है। इसी दौरान मैकाले की पॉलिसी के कारण भारतीय पांरपरिक स्कूल व शिक्षा पद्धति धीरे-धीरे समाप्त होने लगी। इसके बाद अंग्रेजी भाषा भारत में एक प्रेसटीज बनकर उभरी। अमीरों ने इंग्लिश को बढ़ावा देना शुरू किया। ब्रिटिश प्रशासन में ऐसे लोगों को नौकरी में बढ़ावा दिया जाने लगा। इस प्रकार भारतीय अपनी शिक्षा पद्धति, भाषा, संस्कृति, समृद्ध परंपराओं से दूर हो गए।
ब्रिटिश काल में 45 ट्रिलियन यूएस डॉलर भारत से भेजा गया
पुस्तक में इतिहासकार रोमेशचंद्र दत्त ने ' इकोनामिक हिस्ट्री ऑफ इंडिया ' का जिक्र है। इसमें लिखा है कि वर्ष 1765 से 1938 के बीच ' 45 ट्रिलियन डॉलर यूएस डॉलर ' (आज की वेल्यू के अनुसार) भारत से टेलीग्राफ पोस्टल नेटवर्क, रेलवे, युद्ध, हीरे, जवाहरात, टैक्स समेत अन्य माध्यमों से ब्रिटेन गया। यह ब्रिटेन की वर्ष 2023 की जीडीपी का करीब 13 गुना था। पश्चिमी इतिहासकार लिखते हैं कि भारत ने विश्व को करीब एक चौथाई जीडीपी का योगदान दिया। भारत और चीन उस समय विश्व की दो बड़ी अर्थव्यवस्था थी।
पुस्तक में इतिहासकार रोमेशचंद्र दत्त ने ' इकोनामिक हिस्ट्री ऑफ इंडिया ' का जिक्र है। इसमें लिखा है कि वर्ष 1765 से 1938 के बीच ' 45 ट्रिलियन डॉलर यूएस डॉलर ' (आज की वेल्यू के अनुसार) भारत से टेलीग्राफ पोस्टल नेटवर्क, रेलवे, युद्ध, हीरे, जवाहरात, टैक्स समेत अन्य माध्यमों से ब्रिटेन गया। यह ब्रिटेन की वर्ष 2023 की जीडीपी का करीब 13 गुना था। पश्चिमी इतिहासकार लिखते हैं कि भारत ने विश्व को करीब एक चौथाई जीडीपी का योगदान दिया। भारत और चीन उस समय विश्व की दो बड़ी अर्थव्यवस्था थी।
शिवाजी ने ' राज्य व्यवहार कोष ' से मराठी भाषा को मजबूती दी
मराठा काल अध्याय में शिवाजी द्वारा मराठी भाषा को मजबूती देने के लिए विशेष रूप से ' राज्य व्यवहार कोष ' का गठन का जिक्र है। इसका काम मराठी, संस्कृत व साहित्य को सहेजना था। इसमें मराठा ' अष्टप्रधान मंडल ' भी है। यानी शिवाजी के समय भी प्रधानमंत्री, वित्तमंत्री, गृहमंत्री, सेनामंत्री, शिक्षामंत्री राज्य को चलाते थे। इसमें मराठा नेवी का भी वर्णन है। शिवाजी ने 18वीं शताब्दी में भारत के पश्चिमी तटों को मजबूती देने के लिए ' मराठा नेवी ' का गठन किया था। इसमें 100 से अधिक जहाज थे। मराठा नेवी के जहाजों की तकनीक यूरोपियन जहाजों को टक्कर देती थी। इसी कारण मराठा ने यूरोपियन को चुनौती दी और उसका पश्चिमी तट प्रयोग करने के लिए उनसे टैक्स मांगा जाता था।
मराठा काल अध्याय में शिवाजी द्वारा मराठी भाषा को मजबूती देने के लिए विशेष रूप से ' राज्य व्यवहार कोष ' का गठन का जिक्र है। इसका काम मराठी, संस्कृत व साहित्य को सहेजना था। इसमें मराठा ' अष्टप्रधान मंडल ' भी है। यानी शिवाजी के समय भी प्रधानमंत्री, वित्तमंत्री, गृहमंत्री, सेनामंत्री, शिक्षामंत्री राज्य को चलाते थे। इसमें मराठा नेवी का भी वर्णन है। शिवाजी ने 18वीं शताब्दी में भारत के पश्चिमी तटों को मजबूती देने के लिए ' मराठा नेवी ' का गठन किया था। इसमें 100 से अधिक जहाज थे। मराठा नेवी के जहाजों की तकनीक यूरोपियन जहाजों को टक्कर देती थी। इसी कारण मराठा ने यूरोपियन को चुनौती दी और उसका पश्चिमी तट प्रयोग करने के लिए उनसे टैक्स मांगा जाता था।
प्राचीन काल से भारतीय कौशल से विकास को मिली रफ्तार
पुस्तक का आखिरी अध्याय ' फैक्टर ऑफ प्रोडेक्शन ' पर आधारित है। इसमें दर्शाया है कि भारत के पास 2000 वर्ष पूर्व जहाज बनाने की यूनिक उन्नत तकनीक थी। वहीं, शिक्षा व कौशल से भारत में कौशल क्रांति का भी जिक्र है। इसमें ऑनलाइन पढ़ाई के स्वयं प्लेटफार्म के बारे में बताया गया है। इसके अलावा टाटा समूह के जेआरडी टाटा भी शामिल है। उन्हें ' एक आदमी जिसने भारत के लिए बड़े सपने देखे ' नाम से संबोधित किया गया है। वे मानते थे कि बिजनेस सिर्फ पैसा कमाने के लिए नहीं, बल्कि समाज की मदद के लिए भी होना चाहिए। वर्ष 1932 में टाटा एयरलाइन शुरू हुई, जोकि बाद में एयर इंडिया बनीं। उन्होंने स्टील, कार, पावर, कैमिकल आदि क्षेत्रों में देश के विकास के लिए काम किया। वर्ष 1992 में उनके समाज व देश सेवा में योगदान के लिए भारत रतन का खिताब मिला। इसके अलावा, पुस्तक में भारत हेल्थकेयर, सूचना, प्रौद्योगिकी, सप्लाई चैन, प्राकृतिक संसाधन, मानव संसाधन (चायपत्ती, कैमिकल इंजीनियर, कारपेंटर, सॉफ्टवेयर डेवलेपर), शिक्षा और ट्रेनिंग, सामाजिक व सांस्कृतिक प्रभाव का वर्णन है।
पुस्तक का आखिरी अध्याय ' फैक्टर ऑफ प्रोडेक्शन ' पर आधारित है। इसमें दर्शाया है कि भारत के पास 2000 वर्ष पूर्व जहाज बनाने की यूनिक उन्नत तकनीक थी। वहीं, शिक्षा व कौशल से भारत में कौशल क्रांति का भी जिक्र है। इसमें ऑनलाइन पढ़ाई के स्वयं प्लेटफार्म के बारे में बताया गया है। इसके अलावा टाटा समूह के जेआरडी टाटा भी शामिल है। उन्हें ' एक आदमी जिसने भारत के लिए बड़े सपने देखे ' नाम से संबोधित किया गया है। वे मानते थे कि बिजनेस सिर्फ पैसा कमाने के लिए नहीं, बल्कि समाज की मदद के लिए भी होना चाहिए। वर्ष 1932 में टाटा एयरलाइन शुरू हुई, जोकि बाद में एयर इंडिया बनीं। उन्होंने स्टील, कार, पावर, कैमिकल आदि क्षेत्रों में देश के विकास के लिए काम किया। वर्ष 1992 में उनके समाज व देश सेवा में योगदान के लिए भारत रतन का खिताब मिला। इसके अलावा, पुस्तक में भारत हेल्थकेयर, सूचना, प्रौद्योगिकी, सप्लाई चैन, प्राकृतिक संसाधन, मानव संसाधन (चायपत्ती, कैमिकल इंजीनियर, कारपेंटर, सॉफ्टवेयर डेवलेपर), शिक्षा और ट्रेनिंग, सामाजिक व सांस्कृतिक प्रभाव का वर्णन है।