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दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा- यौन उत्पीड़न की शिकार बच्ची की स्वाभाविक गवाही दोष तय करने के लिए पर्याप्त, सजा जरूरी
Thu, 25 Sep 2025 06:32 AM IST
दुष्यंत शर्मा
अमर उजाला नेटवर्क, दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, दिल्ली
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Thu, 25 Sep 2025 06:32 AM IST
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दिल्ली हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को अपने एक अहम फैसले में कहा कि अगर यौन उत्पीड़न की शिकार किसी बच्ची की गवाही साफ, स्वाभाविक और एक जैसी हो, तो उसे बार-बार दूसरे सबूतों से साबित करने की जरूरत नहीं होती। ऐसी गवाही अकेले ही दोष तय करने के लिए पर्याप्त है।
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जस्टिस संजीव नरुला ने यह टिप्पणी उस अपील पर सुनवाई के दौरान की, जिसमें एक व्यक्ति को पॉक्सो कानून की धारा 6 और आईपीसी 376(2) के तहत दोषी ठहराया गया था। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को आठ साल की बच्ची के यौन शोषण में 10 साल कैद की सजा सुनाई थी। इस फैसले को उसने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। व्यक्ति की दलील थी कि बच्ची के बयान बार-बार बदलते रहे हैं।
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कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि छोटी-छोटी बातें बयान में फर्क डाल सकती हैं, लेकिन मूल घटना वही रहती है। बच्ची ने लगातार बताया कि उसे चुप कराकर उसके साथ गंदी हरकत की गई। इसके तुरंत बाद उसने मां को पूरी बात बताई। इस केस में वैज्ञानिक सबूत भी दोषी के खिलाफ पाए गए। बच्ची के कपड़ों पर मिला डीएनए उससे मैच हुआ। कोर्ट ने कहा कि यह सबूत उसकी बेगुनाही के दावे से मेल नहीं खाता। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला बरकरार रखते हुए पीड़िता को मुआवजा देने का भी निर्देश दिया।
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यौन अपराध बच्चों की गरिमा पर सीधा हमला...दोषी ठहराए गए व्यक्ति का यह दावा भी खारिज हुआ कि परिवार में पहले से दुश्मनी थी, इसलिए उसे झूठा फंसाया गया। कोर्ट ने कहा कि यह सिर्फ अंदाजा है, इसका कोई सबूत नहीं। जस्टिस नरुला ने कहा कि ऐसे अपराध बच्चों की गरिमा और सुरक्षा पर सीधा हमला हैं। इसलिए ऐसे मामलों में सख्त सजा जरूरी है।