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दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा- किशोरों को बिना डरे प्रेम जाहिर करने की अनुमति हो, सजा के बजाय समझ पर जोर
Thu, 20 Feb 2025 05:30 AM IST
दुष्यंत शर्मा
अमर उजाला नेटवर्क, दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, दिल्ली
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Thu, 20 Feb 2025 05:30 AM IST
सार
अदालत ने किशोर प्रेम से जुड़े आपराधिक मामलों में सजा के बजाय समझ को प्राथमिकता देने वाले दृष्टिकोण पर जोर दिया। पीठ ने कहा कि कानून ऐसे रिश्तों को स्वीकार करने के लिए विकसित होना चाहिए, जो सहमति से बने हों और जबरदस्ती से मुक्त हों।
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Delhi High Court
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि किशोरों को बिना किसी खौफ के प्रेम जाहिर करने की अनुमति होनी चाहिए। अदालत ने किशोर प्रेम से जुड़े आपराधिक मामलों में सजा के बजाय समझ को प्राथमिकता देने वाले दृष्टिकोण पर जोर दिया। पीठ ने कहा कि कानून ऐसे रिश्तों को स्वीकार करने के लिए विकसित होना चाहिए, जो सहमति से बने हों और जबरदस्ती से मुक्त हों।
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जस्टिस जसमीत सिंह ने आदेश में कहा कि प्रेम मौलिक मानवीय अनुभव है और किशोरों को भावनात्मक संबंध बनाने का अधिकार है। जस्टिस सिंह ने कहा, हालांकि सहमति की कानूनी उम्र नाबालिगों की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन मेरा मानना है कि किशोरों को अपराधीकरण के डर के बिना भावनाओं को जाहिर करने और संबंध बनाने की अनुमति दी जानी चाहिए। कानून का ध्यान प्रेम को दंडित करने के बजाय शोषण व दुर्व्यवहार को रोकने पर होना चाहिए। सहमति और सम्मानजनक किशोर प्रेम मानव विकास का एक स्वाभाविक हिस्सा है। ब्यूरो
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आरोपी को बरी करने का फैसला बरकरार
हाईकोर्ट ने पॉक्सो के तहत यौन उत्पीड़न के आरोपी को बरी करने का ट्रायल कोर्ट का फैसला बरकरार रखा। दिसंबर, 2014 में पिता ने पुलिस में शिकायत दी थी कि नाबालिग बेटी ट्यूशन से घर नहीं लौटी। मामले में आरोपी पर संदेह जताया गया था, क्योंकि वह भी घर से लापता था।
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नाबालिग की सहमति पर पिछले फैसले का दिया हवाला
जस्टिस सिंह ने हाईकोर्ट के पिछले फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा था कि जब 16 वर्ष से अधिक उम्र की लड़की बयान देती है कि उसने रिश्ते के लिए सहमति दी है और इसे मंजूर किया जा सकता है, तो कोर्ट को आईपीसी की धारा 363 व 376 की कार्यवाही रद्द करने का अधिकार है।