फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Delhi ›   Delhi NCR News ›   Delhi High Court said person cannot be denied job merely because a criminal case

Delhi: 'पुरानी FIR के नाम पर नौकरी से बाहर रखना गैरकानूनी', निर्देश देते हुए हाईकोर्ट ने की सख्त टिप्पणी

Tue, 09 Dec 2025 07:53 AM IST
अनुज कुमार गौरव बाजपेई, अमर उजाला, दिल्ली
गौरव बाजपेई, अमर उजाला, दिल्ली Published by: अनुज कुमार Updated Tue, 09 Dec 2025 07:53 AM IST
सार

दिल्ली हाईकोर्ट ने साफ कहा कि आपराधिक केस में बरी हो चुके व्यक्ति को सिर्फ पुरानी एफआईआर के नाम पर जीवन भर नौकरी से बाहर रखना संविधान विरोधी और गैरकानूनी है। कोर्ट ने सीआईएसएफ को अभ्यर्थी को तुरंत कांस्टेबल पद पर नियुक्ति देने और बकाया वेतन-भत्ते चुकाने का आदेश दिया।

विज्ञापन
Delhi High Court said person cannot be denied job merely because a criminal case
दिल्ली हाईकोर्ट - फोटो : ANI

विस्तार

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज होने मात्र से उसे सरकारी या अर्धसैनिक बल की नौकरी से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा जब कोई व्यक्ति अदालत से बरी हो चुका है तब उसे नौकरी से दूर रखना कानून सम्मत नहीं है। न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद की एकल पीठ ने अपने फैसले में केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) की भर्ती प्रक्रिया पर कड़ी टिप्पणी की।

विज्ञापन

कोर्ट ने सीआईएसएफ के कांस्टेबल (सामान्य ड्यूटी) पद पर चयनित एक अभ्यर्थी की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि अभ्यर्थी को केवल इसलिए नौकरी से बाहर करना कि उसके खिलाफ पहले आईपीसी की धारा 451 (घर में अनधिकृत प्रवेश), 323 (मारपीट), 354 (महिला की लज्जा भंग करना) और 506 (आपराधिक धमकी) के तहत मुकदमा दर्ज हुआ था, पूरी तरह गलत और संविधान विरोधी है।

अभ्यर्थी को जनवरी 2025 में ट्रायल कोर्ट ने सभी आरोपों से बरी कर दिया था। अदालत ने स्पष्ट लिखा था कि शिकायतकर्ता और अभ्यर्थी के बीच सिर्फ गलतफहमी हुई थी और कोई अपराध सिद्ध नहीं हुआ।
लेकिन सीआईएसएफ की स्क्रीनिंग कमेटी ने बरी होने के आदेश को नजरअंदाज करते हुए केवल एफआईआर दर्ज होने के आधार पर चयन रद्द कर दिया।
 
विज्ञापन
विज्ञापन

कोर्ट ने कहा कि यह प्रक्रिया यांत्रिक
हाईकोर्ट ने इसे यांत्रिक प्रक्रिया करार देते हुए कहा कि चयन समितियों का दायित्व है कि वे बरी होने के आदेश को ध्यान से पढ़ें और यह समझें कि व्यक्ति को सम्मानजनक तरीके से बरी किया गया है या सिर्फ संदेह का लाभ देकर छोड़ा गया है। कोर्ट ने कहा कि पुराने मुकदमे के आधार पर व्यक्ति को आजीवन दंडित करना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), 15 (भेदभाव निषेध) और 21 (जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता) का उल्लंघन है। कोर्ट ने सीआईएसएफ को निर्देश दिया कि वह अभ्यर्थी को तुरंत कांस्टेबल के रूप में नियुक्ति दे और पिछले वेतन-भत्तों सहित सभी लाभ प्रदान करे।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed