Delhi: 'पुरानी FIR के नाम पर नौकरी से बाहर रखना गैरकानूनी', निर्देश देते हुए हाईकोर्ट ने की सख्त टिप्पणी
दिल्ली हाईकोर्ट ने साफ कहा कि आपराधिक केस में बरी हो चुके व्यक्ति को सिर्फ पुरानी एफआईआर के नाम पर जीवन भर नौकरी से बाहर रखना संविधान विरोधी और गैरकानूनी है। कोर्ट ने सीआईएसएफ को अभ्यर्थी को तुरंत कांस्टेबल पद पर नियुक्ति देने और बकाया वेतन-भत्ते चुकाने का आदेश दिया।
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दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज होने मात्र से उसे सरकारी या अर्धसैनिक बल की नौकरी से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा जब कोई व्यक्ति अदालत से बरी हो चुका है तब उसे नौकरी से दूर रखना कानून सम्मत नहीं है। न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद की एकल पीठ ने अपने फैसले में केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) की भर्ती प्रक्रिया पर कड़ी टिप्पणी की।
अभ्यर्थी को जनवरी 2025 में ट्रायल कोर्ट ने सभी आरोपों से बरी कर दिया था। अदालत ने स्पष्ट लिखा था कि शिकायतकर्ता और अभ्यर्थी के बीच सिर्फ गलतफहमी हुई थी और कोई अपराध सिद्ध नहीं हुआ।
लेकिन सीआईएसएफ की स्क्रीनिंग कमेटी ने बरी होने के आदेश को नजरअंदाज करते हुए केवल एफआईआर दर्ज होने के आधार पर चयन रद्द कर दिया।
कोर्ट ने कहा कि यह प्रक्रिया यांत्रिक
हाईकोर्ट ने इसे यांत्रिक प्रक्रिया करार देते हुए कहा कि चयन समितियों का दायित्व है कि वे बरी होने के आदेश को ध्यान से पढ़ें और यह समझें कि व्यक्ति को सम्मानजनक तरीके से बरी किया गया है या सिर्फ संदेह का लाभ देकर छोड़ा गया है। कोर्ट ने कहा कि पुराने मुकदमे के आधार पर व्यक्ति को आजीवन दंडित करना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), 15 (भेदभाव निषेध) और 21 (जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता) का उल्लंघन है। कोर्ट ने सीआईएसएफ को निर्देश दिया कि वह अभ्यर्थी को तुरंत कांस्टेबल के रूप में नियुक्ति दे और पिछले वेतन-भत्तों सहित सभी लाभ प्रदान करे।