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दिल्ली: पहले बड़ी कक्षाएं फिर छोटे बच्चों के लिए खुलें स्कूल, एक्सपर्ट कमेटी की राय
Thu, 26 Aug 2021 03:43 AM IST
पूजा त्रिपाठी
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
Published by: पूजा त्रिपाठी
Updated Thu, 26 Aug 2021 03:43 AM IST
सार
एक्सपर्ट कमेटी की राय है कि कोरोना के जिस तरह के हालात दिल्ली में है उसे देखते हुए अब स्कूल धीरे-धीरे खोले जा सकते हैं। हालांकि इसका अंतिम निर्णय डीडीएमए की बैठक में ही होगा।
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स्कूल (फाइल फोटो)
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
दिल्ली में कोरोना के नियंत्रित मामलों को देखते हुए स्कूल खोलने के लिए बनाई गई एक्सपर्ट कमेटी ने सुझाव दिया है कि अब राजधानी में धीरे-धीरे स्कूल खोले जाने चाहिए। सबसे पहले बड़े बच्चों की कक्षाएं खोली जाएं उसके बाद प्राइमरी और मिडिल कक्षाएं खोली जाएं।
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एक्सपर्ट कमेटी की राय है कि कोरोना के जिस तरह के हालात दिल्ली में है उसे देखते हुए अब स्कूल धीरे-धीरे खोले जा सकते हैं। हालांकि इसका अंतिम निर्णय डीडीएमए की बैठक में ही होगा।
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गौरतलब है कि दिल्ली में स्कूल किस तरह खोले जाएं इसको लेकर दिल्ली डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी ने एक एक्सपर्ट कमेटी का गठन किया था। इसी एक्सपर्ट कमेटी ने दिल्ली में कोविड के हालात को देखते हुए स्कूल खोलने पर अपनी राय दी है।
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दिल्ली सरकार ने इससे पहले स्कूलों को आंशिक रूप से खोलने की घोषणा की थी जिसमें 10वीं और 12वीं कक्षा के बच्चे स्कूल आकर एडमिशन से संबंधित, काउंसिलिंग और प्रैक्टिकल से जुड़े कार्य कर सकते हैं। दिल्ली सरकार ने स्कूल खोलने को लेकर बच्चों, शिक्षकों और अभिभावकों से भी उनकी राय मांगी थी।
शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने इस माह की शुरुआत में बताया था कि स्कूल खोलने को लेकर उन्हें 35000 सुझाव मिले हैं। उन्होंने बताया था कि 35000 सुझाव अब तक मिले हैं जिसमें से 12000 तो सिर्फ एक दिन में ही मिले थे। हम जल्द ही इन सुझावों को ध्यान में रखकर स्कूल खोलने पर कोई फैसला करेंगे।
हाल ही में कई राज्यों ने अपने यहां शैक्षणिक संस्थानों को खोल दिया है जिसमें खासतौर से बड़ी कक्षाओं के स्कूल हैं। हाल ही में नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट ने भी उन सभी जगहों के स्कूल खोलने की बात कही है जहां कोविड केस न के बराबर हैं या बहुत कम हैं। एनडीएमए ने कहा है कि सभी जगह कोरोना प्रोटोकॉल को ध्यान में रखकर ही स्कूल खोले जाएं।
समिति की राय से स्वास्थ्य विशेषज्ञ असहमत
कोरोना महामारी के बीच पिछले डेढ़ साल से तालाबंदी के शिकार स्कूलों को फिर से खोले जाने पर स्वास्थ्य विशेषज्ञ दिल्ली सरकार की सलाहकार समिति के फैसले पर एकमत नहीं हैं।
समिति का मानना है कि सबसे पहले बड़ी क्लास को शुरू करना चाहिए और फिर समय के साथ साथ प्राइमरी क्लास तक शुरू कर दी जाएं जबकि स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना हैकि इस तरह की सलाह में सरकार वैज्ञानिक तथ्यों को नजरदांज न करें। स्कूलों के बंद होने का सबसे बड़ा नुकसान छोटे बच्चों का है। इन प्राइमरी बच्चों की क्लास सबसे पहले शुरू कर देनी चाहिए और इसमें किसी भी तरह की घबराहट रखने की जरूरत भी नहीं।
बुधवार को स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. चंद्रकांत लहारिया ने तो सोशल मीडिया पर एलजी अनिल बैजल तक से अपील करते हुए कहा कि स्कूल खोलने का निर्णय तथ्यों के आधार पर ही होना चाहिए।
डॉ. लहारिया का कहना है कि 6 से 12 साल तक की आयु के बच्चे सबसे अधिक सुरक्षित हैं। पिछले साल जब कोरोना महामारी सामने आई तब इसके प्रभावों के बारे में पूरी दुनिया अनजान थी लेकिन अब विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) से लेकर तमाम देशों में चिकित्सीय अध्ययन सामने आ चुके हैं। इन बच्चों में प्रतिरोधक क्षमता इतनी मजबूत है कि यह संक्रमण का सामना खुद कर सकते हैं। जिन बच्चों को पहले से कोई न कोई बीमारी है उन्हें कुछ समय के लिए स्कूल जाने से रोका जा सकता है।
पहली-दूसरी लहर में कोई अंतर नहीं: मंत्रालय
आंकड़ों की बात करें तो केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि पहली और दूसरी लहर के दौरान एक समान बच्चे कोरोना संक्रमित हुए थे। जिन्हें कोरोना हुआ और अस्पताल में भर्ती करना पड़ा उनमें से 70 फीसदी संक्रमित होने से पहले किसी अन्य बीमारी से ग्रस्त थे।
बड़े बच्चों में आशंका अधिक : आईसीएमआर
इनके अलावा भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के स्वास्थ्य महानिदेशक डॉ. बलराम भार्गव ने हाल ही में कहा था कि छोटे बच्चों को संक्रमण का खतरा नहीं है। बल्कि बड़े बच्चों के लिए आशंका जरूर व्यक्त की जा सकती है।
समिति की सलाह का असर सिर्फ देरी
डॉ. लहारिया के अनुसार चरणबद्घ तरीके से स्कूल खोलना या फिर पहले बड़ी क्लास के शुरू किए जाने जैसी सलाह के जरिए सिर्फ बच्चों को स्कूल तक लाने में देरी होगी, इसके अलावा और कुछ नहीं।
मुखिया को देख समिति बनाती हैं सलाह
सर गंगाराम अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. धीरेन गुप्ता का कहना है कि अक्सर सरकारी समितियों में मौजूद सलाहकार वही निष्कर्ष निकालते हैं जो उनका मुखिया सुनना चाहता है। इनकी खुद की सोच या अध्ययन किसी काम का नहीं है। अगर चिकित्सीय और विज्ञान के लिहाज से बात करें तो यह कहना पूरी तरह से गलत है कि पहले बड़े बच्चों को स्कूल जाना चाहिए और फिर छोटे बच्चों के लिए रास्ता खोलना चाहिए।
इस तरह की सरकारी प्रक्रिया की आवश्यकता नहीं है। इससे अभिभावकों में भी पैनिक होगा। लोगों को किसी भी तरह से डरने की जरूरत नहीं है। वे अपने बच्चों को स्कूल भेज सकते हैं। हालांकि यह देखना जरूरी है कि किसी बच्चे को पहले से कोई परेशानी तो नहीं है।
समिति का मानना है कि सबसे पहले बड़ी क्लास को शुरू करना चाहिए और फिर समय के साथ साथ प्राइमरी क्लास तक शुरू कर दी जाएं जबकि स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना हैकि इस तरह की सलाह में सरकार वैज्ञानिक तथ्यों को नजरदांज न करें। स्कूलों के बंद होने का सबसे बड़ा नुकसान छोटे बच्चों का है। इन प्राइमरी बच्चों की क्लास सबसे पहले शुरू कर देनी चाहिए और इसमें किसी भी तरह की घबराहट रखने की जरूरत भी नहीं।
बुधवार को स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. चंद्रकांत लहारिया ने तो सोशल मीडिया पर एलजी अनिल बैजल तक से अपील करते हुए कहा कि स्कूल खोलने का निर्णय तथ्यों के आधार पर ही होना चाहिए।
डॉ. लहारिया का कहना है कि 6 से 12 साल तक की आयु के बच्चे सबसे अधिक सुरक्षित हैं। पिछले साल जब कोरोना महामारी सामने आई तब इसके प्रभावों के बारे में पूरी दुनिया अनजान थी लेकिन अब विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) से लेकर तमाम देशों में चिकित्सीय अध्ययन सामने आ चुके हैं। इन बच्चों में प्रतिरोधक क्षमता इतनी मजबूत है कि यह संक्रमण का सामना खुद कर सकते हैं। जिन बच्चों को पहले से कोई न कोई बीमारी है उन्हें कुछ समय के लिए स्कूल जाने से रोका जा सकता है।
पहली-दूसरी लहर में कोई अंतर नहीं: मंत्रालय
आंकड़ों की बात करें तो केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि पहली और दूसरी लहर के दौरान एक समान बच्चे कोरोना संक्रमित हुए थे। जिन्हें कोरोना हुआ और अस्पताल में भर्ती करना पड़ा उनमें से 70 फीसदी संक्रमित होने से पहले किसी अन्य बीमारी से ग्रस्त थे।
बड़े बच्चों में आशंका अधिक : आईसीएमआर
इनके अलावा भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के स्वास्थ्य महानिदेशक डॉ. बलराम भार्गव ने हाल ही में कहा था कि छोटे बच्चों को संक्रमण का खतरा नहीं है। बल्कि बड़े बच्चों के लिए आशंका जरूर व्यक्त की जा सकती है।
समिति की सलाह का असर सिर्फ देरी
डॉ. लहारिया के अनुसार चरणबद्घ तरीके से स्कूल खोलना या फिर पहले बड़ी क्लास के शुरू किए जाने जैसी सलाह के जरिए सिर्फ बच्चों को स्कूल तक लाने में देरी होगी, इसके अलावा और कुछ नहीं।
मुखिया को देख समिति बनाती हैं सलाह
सर गंगाराम अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. धीरेन गुप्ता का कहना है कि अक्सर सरकारी समितियों में मौजूद सलाहकार वही निष्कर्ष निकालते हैं जो उनका मुखिया सुनना चाहता है। इनकी खुद की सोच या अध्ययन किसी काम का नहीं है। अगर चिकित्सीय और विज्ञान के लिहाज से बात करें तो यह कहना पूरी तरह से गलत है कि पहले बड़े बच्चों को स्कूल जाना चाहिए और फिर छोटे बच्चों के लिए रास्ता खोलना चाहिए।
इस तरह की सरकारी प्रक्रिया की आवश्यकता नहीं है। इससे अभिभावकों में भी पैनिक होगा। लोगों को किसी भी तरह से डरने की जरूरत नहीं है। वे अपने बच्चों को स्कूल भेज सकते हैं। हालांकि यह देखना जरूरी है कि किसी बच्चे को पहले से कोई परेशानी तो नहीं है।