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Delhi Election: दिल्ली की ये 12 सीटें ऐसीं, जहां जो दल जीता वही बना सिकंदर; वजूद में आने के बाद से परंपरा जारी
Tue, 14 Jan 2025 08:04 AM IST
शाहरुख खान
विनोद डबास, अमर उजाला, नई दिल्ली
विनोद डबास, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: शाहरुख खान
Updated Tue, 14 Jan 2025 08:04 AM IST
सार
दिल्ली की 12 विधानसभाएं ऐसीं हैं, जहां जो दल जीता वही सिकंदर बना है। इन विधानसभाओं में जीतने वाली पार्टी की सरकार बनी है। इन सीटों के वजूद में आने के बाद से परंपरा जारी है।
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Delhi Election
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
राजधानी के विधानसभा चुनावों में कुछ क्षेत्र विशेष रुचि और चर्चा के केंद्र में रहते हैं। यह न केवल उनके ऐतिहासिक मतदान पैटर्न के कारण है, बल्कि उनकी राजनीतिक प्रवृत्ति भी अलग है। राजधानी के 12 विधानसभा क्षेत्रों के मतदाता वर्ष 1993 से हर चुनाव में सत्तारूढ़ दल के उम्मीदवार को जिताने का सिलसिला बनाए हुए हैं।
लिहाजा ये क्षेत्र बेलवेदर क्षेत्र (सत्तापक्ष का संकेत देने वाले क्षेत्र) कहे जाते हैं। तिमारपुर, मॉडन टाउन, सदर बाजार, पटेल नगर, मादीपुर, मालवीय नगर, पटपड़गंज और सीमापुरी क्षेत्र 1993 से सत्तापक्ष की सरकार के उम्मीदवार को जिताते आ रहे हैं।
इनके अलावा, 2008 में अस्तित्व में आए विकासपुरी, नई दिल्ली, देवली और कोंडली ने भी यही परंपरा निभाई। इन क्षेत्रों के मतदाताओं ने वर्ष 1993 में भाजपा और 1998, 2003 व 2008 में कांग्रेस की सरकार बनाने में भूमिका निभाई, वहीं 2013, 2015 व 2020 में आम आदमी पार्टी की सरकार बनवाने में भूमिका रही।
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2025 के चुनाव में परंपरा कायम रहेगी
आगामी चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या इन क्षेत्रों के मतदाता सत्तापक्ष के उम्मीदवार को समर्थन देकर परंपरा जारी रखते हैं या कोई नया रुझान देते हैं। लिहाजा इस बारे में आठ फरवरी को आने वाले चुनाव परिणाम के बाद मालूम होगा।
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लिहाजा ये क्षेत्र बेलवेदर क्षेत्र (सत्तापक्ष का संकेत देने वाले क्षेत्र) कहे जाते हैं। तिमारपुर, मॉडन टाउन, सदर बाजार, पटेल नगर, मादीपुर, मालवीय नगर, पटपड़गंज और सीमापुरी क्षेत्र 1993 से सत्तापक्ष की सरकार के उम्मीदवार को जिताते आ रहे हैं।
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इनके अलावा, 2008 में अस्तित्व में आए विकासपुरी, नई दिल्ली, देवली और कोंडली ने भी यही परंपरा निभाई। इन क्षेत्रों के मतदाताओं ने वर्ष 1993 में भाजपा और 1998, 2003 व 2008 में कांग्रेस की सरकार बनाने में भूमिका निभाई, वहीं 2013, 2015 व 2020 में आम आदमी पार्टी की सरकार बनवाने में भूमिका रही।
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2025 के चुनाव में परंपरा कायम रहेगी
आगामी चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या इन क्षेत्रों के मतदाता सत्तापक्ष के उम्मीदवार को समर्थन देकर परंपरा जारी रखते हैं या कोई नया रुझान देते हैं। लिहाजा इस बारे में आठ फरवरी को आने वाले चुनाव परिणाम के बाद मालूम होगा।
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यदि इस बार भी सत्तापक्ष के पक्ष में मतदान करते हैं तो यह उनकी राजनीतिक समझ और व्यापक दृष्टिकोण को पुनः प्रमाणित करेगा। यह राजनीतिक दलों के लिए भविष्य की रणनीति तैयार करने में एक अहम संकेतक साबित हो सकता है।
सभी दल इन क्षेत्रों के मतदाताओं को लुभाने में जुटे
राजनीतिक दल इन क्षेत्रों के मतदाताओं को लुभाने के लिए जोर-शोर से जुटे हैं। स्थानीय मुद्दों से लेकर पार्टी के राष्ट्रीय एजेंडे तक, हर पहलू को ध्यान में रखा जा रहा है। इन क्षेत्रों के मतदाता न केवल स्थानीय विकास और प्रशासनिक कार्यों को महत्व देते हैं, बल्कि व्यापक राजनीतिक संदेश भी देते हैं।
राजनीतिक दल इन क्षेत्रों के मतदाताओं को लुभाने के लिए जोर-शोर से जुटे हैं। स्थानीय मुद्दों से लेकर पार्टी के राष्ट्रीय एजेंडे तक, हर पहलू को ध्यान में रखा जा रहा है। इन क्षेत्रों के मतदाता न केवल स्थानीय विकास और प्रशासनिक कार्यों को महत्व देते हैं, बल्कि व्यापक राजनीतिक संदेश भी देते हैं।