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सर्वे ने लगाई सच्चाई पर मुहर : अशिक्षा का अंधेरा, विपरीत हालात में कट रहा जीवन

Sat, 22 Jan 2022 06:31 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Sat, 22 Jan 2022 06:31 AM IST
सार

स्वास्थ्य, शिक्षा और पोषण से वंचित बाल श्रमिकों का जीवन नहीं आसान।

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Darkness of illiteracy, life is struggling in adverse circumstances in the national capital
बाल श्रम - फोटो : पिक्साबे

विस्तार

इस तरह गुजरा बचपन की खिलौने ना मिले, और जवानी में बुढ़ापे से मुलाकात हुई...मंजर भोपाली की ये लाइनें सुनहरी कही जाने वाली दिल्ली की तंग गलियों में खामोश हो रहे बचपन पर कुछ हद तक सटीक बैठती हैं। बात कर रहे हैं बहुमंजिला इमारतों से इतर गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे परिवारों के बच्चों की। उन झुग्गी-झोपड़ियों की जहां किसी न किसी मजबूरी में बच्चों के बस्ते खूंटी पर टंग जाते हैं। मासूमों के कदम स्कूल की डगर से दूर कारखानों व फैक्ट्रियों की तरफ बढ़ने लगते हैं। फिर यहीं से शुरू होता है बेहतर जीवन की उम्मीदों के भटकने का सिलसिला जो ताउम्र टीस बनकर रह जाता है। भले ही मजबूरियों व परेशानी से त्रस्त शिक्षा से दूर यह तबका आम लोगों को नजर न आता हो, लेकिन सरकारी व गैर सरकारी आंकड़े जरूर इसकी गवाही देते हैं। पेश है प्रगति मिश्रा की एक रिपोर्ट...
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बुनियादी सुविधाओं के अभाव से जूझ रहा बचपन
दिल्ली कमीशन फॉर प्रोटेक्शन चाइल्ड राइट्स के एक सर्वे अनुसार अस्थाई ठिकानों जैसे सड़क, गलियों, झोपड़ियों ( स्ट्रीट चाइल्ड) में रहने वाले 70 हजार बच्चों में से करीब 50 प्रतिशत को बुनियादी जरूरतें जैसे खाना, पानी, बिजली भी नहीं मिलती। इनकी तलाश में वह अक्सर उत्पीड़न का शिकार बनते हैं। स्वास्थ्य, शिक्षा पाने के लिए पर्याप्त सुविधाएं इनके पास नहीं हैं। जब बचपन इन सुविधाओं से महरूम होगा तो बुनियाद का बिगड़ना और रास्तों का भटकना भी लाजिमी है।
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दो जून की रोटी के लिए खतरे के मुहाने पर
दिल्ली कमीशन फॉर प्रोटेक्शन चाइल्ड राइट्स ने वर्ष 2020-21 में 331 बच्चों को बाल श्रम से बचाया, जो बेहद विपरीत परिस्थितियों में काम कर रहे थे।  इनमें 10 साल तक के बच्चे शामिल हैं। इन बच्चों को कारखानों, बेकरी इकाइयों, मशीन इकाइयों और ऑटो सेंटर के साथ ही आवासीय कॉलोनियों में घरेलू नौकर के रूप में काम करते पाया गया।
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कम उम्र में शादी और भविष्य की कोई योजना नहीं
नेशनल हेल्थ सर्वे के दौरान 20-24 साल की 9.9 प्रतिशत ऐसी महिलाएं सामने आईं, जिनकी शादी 18 साल से पहले हुई थी। वहीं सर्वे के दौरान 15 से 19 साल की आयु में गर्भवती या मां बन चुकी 3.3 प्रतिशत महिलाएं मिली। दिल्ली के बाल श्रम प्रभावित क्षेत्रों जैसे सीलमपुर, नागलोई आदि में जाएं तो यहां एक महिला के 6 से 8 बच्चे होना आम है। नेशनल हेल्थ सर्वे के अनुसार 15 से 49 साल की करीब 23 प्रतिशत ऐसी महिलाएं हैं, जिन्होंने कभी परिवार नियोजन से जुड़ा कोई उपाय नहीं अपनाया है।

सेव द चिल्ड्रेन की डायरेक्टर (पॉलिसी एंड प्रोग्राम इंपेक्ट ) नमृता कहती हैं कि बाल श्रम से जुड़े पहलुओं को भावनात्मक नजरिए से देखते हुए संवेदनशीलता के साथ योजनाएं बनना आवश्यक है। कम आयु में शादी और बच्चे जैसे कारण बाल श्रम को प्रोत्साहन देने वाली बड़ी वजह हैं। स्टेट ऑफिस सीनियर मैनेजर मिंटू देवनाथ कहते हैं कि कोविड के बाद आर्थिक रूप से कमजोर घरों में बच्चों को शिक्षा के लिए प्रोत्साहन मिलना और कम हो गया है।

स्कूल तक नहीं पहुंच पा रहीं बेटियां
पिछले दिनों आए नेशनल हेल्थ सर्वे के अनुसार दिल्ली में 6 साल से अधिक आयु की करीब 16.2 प्रतिशत लड़कियों ने कभी स्कूल में कदम नहीं रखा । यहां 15 से 49 साल की आयु वाली महिलाओं का साक्षरता प्रतिशत 83.7 है, लेकिन इनमें से 59.7 ने ही 10 या उससे अधिक साल तक पढ़ाई की है। लड़कों की स्थिति थोड़ा बेहतर है। लेकिन बड़ी संख्या में स्कूल ड्राप आउट का सिलसिला जारी है। 15 से 49 साल के पुुरुषों में 90.2 प्रतिशत साक्षर हैं। इनमें से 10 या उससे अधिक साल पढ़ाई करने वालों का प्रतिशत 60.9 ही है।

अजीत नगर : अब नहीं लुभाती स्कूल की डगर
14 साल की अर्शिया (बदला नाम) ने बताया कि उसे स्कूल जाना अब पसंद नहीं है। क्योंकि कई दोस्तों ने स्कूल छोड़ दिया है। उनकी बेस्ट फ्रेंड जिया ने टीबी की बीमारी के चलते कुछ महीनों पहले स्कूल छोड़ दिया। सरकारी अस्पताल में इलाज तो चल रहा है, लेकिन घर पर सिलाई का काम, फिर पढ़ाई दोनों काम बीमार होने के बाद उससे नहीं होते।


...और बिखर गए सपने
15 साल की सीता( बदला नाम) कहती हैं वह बड़ी होकर पढ़ाई पूरी कर पॉर्लर खोलना चाहती हैं। घर और पड़ोस में ज्यादातर लड़कियां कपड़ों के काम में लगी रहती हैं। उसे य काम पसंद नहीं है। लेकिन पापा को कैंसर होने के बाद रिश्तेदार मेरी पढ़ाई छुड़वा कर शादी करने को कहते हैं। पापा को कुछ हो गया तो मां अकेले उसे कैसे संभालेगी सब ये चिंता जताते हैं।
 
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