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सांस से जुड़े नहीं अन्य अंगों पर भी हमला करता है कोरोना, एम्स के आधा से ज्यादा मरीजों में दिखे ये लक्षण

Fri, 28 Aug 2020 11:48 AM IST
पूजा त्रिपाठी अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: पूजा त्रिपाठी Updated Fri, 28 Aug 2020 11:48 AM IST
सार

- इन मरीजों में फेफड़ों और सांस से जुड़े लक्षण नहीं दिखे
- एम्स में जुलाई और अगस्त में भर्ती 122 मरीजों के लक्षण पर अध्ययन किया गया

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Coronavirus delhi corona do not effect only on breathing organ but also on neuro kidney and other organs aiims many patient dont
फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

एम्स अस्पताल में भर्ती आधे से ज्यादा कोरोना मरीजों में फेफड़े और सांस से जुड़े लक्षण नहीं हैं, बल्कि इन मरीजों में दिल, किडनी और न्यूरो से जुड़े लक्षण दिखाई दे रहे हैं। यह बातें अस्पताल में जुलाई और अगस्त के पहले सप्ताह में भर्ती 122 मरीजों पर किए गए अध्ययन में सामने आई हैं।

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इसके मुताबिक, 122 मरीजों में से 53 फीसदी मरीजों में सांस रोगों से जुड़े लक्षण की बजाय अन्य अंगों को प्रभावित करने वाले लक्षण दिखे हैं। इनमें से 30 फीसदी मरीज ऐसे थे, जिन्हें कोई और बीमारी नहीं थी।
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एम्स के निदेशक रणदीप गुलेरिया के मुताबिक, कोरोना वायरस शरीर की कोशिकाओं में एसीई2 रिसेप्टर के जरिए कोशिकाओं में अंदर जाता है। ये रिसेप्टर सिर्फ फेफड़ों में ही नहीं बल्कि शरीर के अन्य अंगों में भी मौजूद होते हैं।
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कुछ लोगों को गलतफहमी है कि कोरोना से खतरा केवल उन्हीं लोगों को है, जिन्हें डायबिटिज और दिल की बीमारी या कैंसर जैसी बीमारियां हैं, कोरोना केवल फेफड़ों और श्वसन तंत्र पर ही हमला करता है लेकिन अब कई रिसर्च से स्पष्ट हो चुका है कि कोरोना इनके अलावा शरीर के कई अन्य अंगों पर भी हमला करता है।


दिल के दौरे का भी खतरा
कोरोना पीड़ित मरीजों में दिल का दौरा पड़ने और ब्रेन स्ट्रोक का भी खतरा अधिक होता है। कोरोना संक्रमित मरीज की रक्तवाहिनियों में खून के थक्के भी बन जाते हैं। यह थक्के दिल और ब्रेन तक भी पहन सकते हैं, जिसकी वजह से दिल का दौरा पड़ने और ब्रेन स्ट्रोक होने का खतरा भी बढ़ जाता है। दिल्ली के जीबी पंत और एम्स अस्पताल में कई ऐसे मामले सामने आए हैं। कोरोना के मरीजों के इलाज करने वाली हिंदूराव अस्पताल की डॉक्टर अंकिता सिंह का कहना है कि आईसीयू में भर्ती गम्भीर मरीजों के इलाज के दौरान कई प्रकार की जांच की जाती है, ताकि पता चल सके कि मरीज की धमनियों में खून का थक्का तो नहीं पड़ने वाला है। यही वजह है कि कोरोना के मरीजों में खून को जमने से रोकने के लिए दवाओं पर जोर दिया जा रहा है। मरीजों को रिवारोक्साबेन सॉल्ट की दवाएं लगातार दी जा रही हैं, ताकि खून शरीर में पतला रहे और जम न सके।

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