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सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब केजरीवाल के सामने है काम कर दिखाने की चुनौती

Thu, 05 Jul 2018 01:43 PM IST
शरद गुप्ता, अमर उजाला, नई दिल्ली
शरद गुप्ता, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Thu, 05 Jul 2018 01:43 PM IST
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Chief Minister Arvind kejriwal Now has a challenge of work in Delhi
kejriwal

दिल्ली सरकार बड़ी है या उपराज्यपाल, इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर जिम्मेदारी बढ़ गई है। अब वे अपनी नाकामियों के लिए किसी अन्य को दोषी नहीं ठहरा पाएंगे - न प्रधानमंत्री को और न ही उपराज्यपाल को।

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पिछले दिनों एक सर्वेक्षण में दिल्ली के 54 फीसदी लोगों ने माना था कि केंद्र सरकार उपराज्यपाल के जरिए केजरीवाल को काम नहीं करने दे रही है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद यह दलील नहीं चलेगी।
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जनता अब सिर्फ उन्हें उनकी सरकार के प्रदर्शन की कसौटी पर कसेगी। बमुश्किल दस महीने बाद होने वाले लोकसभा चुनाव और डेढ़ साल बाद विधानसभा चुनाव से पहले उनके सामने अपने चुनावी वादे पूरी करने की चुनौती है।
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31 जनवरी 2015 को जारी आम आदमी पार्टी के 70 मुद्दों वाले घोषणापत्र को केजरीवाल ने अपने लिए गीता और बाइबिल क़रार दिया था। उनके अनुसार चार महीनों की मशक्कत के बाद यह घोषणापत्र बनाया गया था।

शुरू से टकराव

Chief Minister Arvind kejriwal Now has a challenge of work in Delhi
अरविंद केजरीवाल

इनमें जन लोकपाल कानून, स्वराज कानून बनाने, बिजली बिल आधे करने, बिजली कंपनियों का ऑडिट सीएजी से कराने, हर परिवार को प्रति माह 20,000 लीटर मुफ्त पानी, सार्वजनिक स्थानों पर फ्री वाईफाई, 15 लाख सीसीटीवी कैमरे लगाने, चार लाख टॉयलेट बनाने, बसों में महिला पुलिस और हर साल लाखों नौकरियां देने जैसे कई वादे थे।

इनमें से कुछ पर काम हुआ है, कुछ पर आधा अधूरा हुआ है और मुफ्त वाईफाई जैसे कई विषय हैं जिन पर अभी सरकार ने काम शुरू ही नहीं किया है। अब जल्द ही देश चुनावी मोड़ में आने वाला है और तब जनता केजरीवाल से उनके वादों के बारे में पूछेगी।

केजरीवाल सरकार का आगाज ही केंद्र सरकार और उपराज्यपाल के साथ टकराव से हुआ था। चाहे जन लोकपाल विधेयक हो या फिर मंत्रिमंडल के दूसरे फैसले, राज्य सरकार ने उपराज्यपाल को नजरअंदाज करना शुरू कर दिया। इसी के बाद उनके सभी काम राजभवन में जाकर अटक जाते थे।

वापस मिली ताकत

Chief Minister Arvind kejriwal Now has a challenge of work in Delhi
kejriwal and sheila dixit

शीला दीक्षित के पंद्रह साल के शासन और केजरीवाल के तीन साल की सरकार में मूल फर्क सिर्फ सर्विसेज (नौकरशाही) के केंद्र के पास चले जाने का था।

यही वजह था कि शीला सरकार ने हजारों करोड़ रुपये के बिजली वितरण के निजीकरण के फैसले को राजभवन की मंजूरी के लिए नहीं भेजा और तत्कालीन एलजी ने भी कोई आपत्ति नहीं जताई।

वहीं केजरीवाल के हर फैसले पर उपराज्यपाल के सवाल जवाब हो रहे थे। केजरीवाल का आरोप है कि दिल्ली सरकार की 400 से ज्यादा फाइलें एलजी के पास अटकी थीं। लेकिन अब यह समस्या खत्म हो गई है।

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