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दुनिया में सर्वाधिक भू-जल दोहन करने वाला देश है भारत : केंद्र

Wed, 14 Nov 2018 03:19 PM IST
विवेक मिश्रा, अमर उजाला, नई दिल्ली
विवेक मिश्रा, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Wed, 14 Nov 2018 03:19 PM IST
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central government says india exploits underground water most in the world
water - फोटो : file photo

सुप्रीम कोर्ट के आदेश को 22 वर्ष बीत चुके हैं लेकिन अभी तक देश में भू-जल संरक्षण को लेकर कोई नीति नहीं है। वहीं, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में केंद्र सरकार की ओर से दाखिल हलफनामे में कहा गया है कि इस वक्त भारत दुनिया का सर्वाधिक भू-जल दोहन करने वाला देश है।

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2009 में देश के भीतर जहां 2700 अरब क्यूबिक मीटर (बीसीएम) भू-जल उपलब्ध था वहीं, 2013 में हुए अब तक के अंतिम आकलन के मुताबिक देश में महज 411 बीसीएम भू-जल ही बचा है। नाखुश एनजीटी ने भू-जल संरक्षण मामले में केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय के सचिव को तलब करते हुए कहा है कि चार हफ्तों के भीतर भू-जल संरक्षण नीति तय होनी चाहिए।
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जस्टिस आदर्श कुमार गोयल की अध्यक्षता वाली पीठ याची विक्रांत तोंगड़ के मामले में सुनवाई कर रही है। प्रधान पीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के इतर ट्रिब्यूनल बीते छह वर्ष से इस मामले पर लगातार संबंधित मंत्रालय और विभागों को आदेश दे रहा है।
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अभी तक सिर्फ हीलाहवाली की जा रही है। मामले की अगली सुनवाई 18 नवंबर को होगी। ऐसे में कार्रवाई और रणनीति के साथ केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय के सचिव अगली सुनवाई में ट्रिब्यूनल के समक्ष पेश हों।

पीठ ने पूछा क्यों नहीं हैं समृद्ध उपकरण ? 

पीठ ने केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय को फटकार लगाते हुए कहा कि लगातार यह दलील दी जा रही है कि विभागों के पास समृद्ध उपकरण नहीं हैं। हम यह पूछना चाहते हैं कि अभी तक उपकरण क्यों नहीं हैं? वहीं अभी तक जो नीति तैयार की गई है वह भी विचाराधीन है। इतने वर्षों में कोई कार्रवाई नहीं की गई। पीठ ने कहा कि चार हफ्तों से अधिक का समय नीति तय करने में नहीं लगनी चाहिए। कम से कम प्राथमिक स्तर पर यह काम हो जाना चाहिए। इसमें भू-जल को प्रदूषित करने वालों के खिलाफ कार्रवाई और भू-जल दोहन का तरीका भी तय होना चाहिए।

कृषि क्षेत्र में 90 फीसदी भू-जल दोहन 
केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय की ओर से एनजीटी में दाखिल हलफनामे में कहा गया है कि देश के भीतर होने वाले भू-जल दोहन में 90 फीसदी कृषि कार्य और 10 फीसदी पेयजल व अन्य कार्यों के लिए किया जा रहा है। सरकार ने एनजीटी के समक्ष अपनी फरियाद रखी है कि वह नई गाइडलाइन प्रारूप में कृषि क्षेत्र को शर्तों और अनापत्ति प्रमाण पत्र इत्यादि से मुक्त रखना चाहती है। जबकि याची की मांग है कि यदि 90 फीसदी क्षेत्र को यूं ही छोड़ दिया गया तो भू-जल सरंक्षण कैसे होगा। इसलिए नई गाइडलाइन का प्रारूप बिल्कुल ठीक नहीं है।

खेती के लिए वैकल्पिक स्रोत से पानी की जरूरत
पीठ ने का कि बिना वर्षा जल का संचयन किए और अन्य प्रभावी कदम उठाए भवन निर्माण, पानी बोतलों के प्लांट, स्विमिंग पूल के लिए भू-जल का दोहन खतरे की घंटी है। पीठ ने हा कि जहां पीने के जल का कोई साधन नहीं है वहां भू-जल दोहन की बात समझी जा सकती है लेकिन शुल्क लेकर पानी की कमी झेलने वाले इलाकों में औद्योगिक ईकाइयों को मंजूरी बेहद दुखद और स्थायी विकास के सिद्धांतों के विपरीत है। पीठ ने कहा कि कृषि क्षेत्र के लिए भी भू-जल दोहन को सीमित करने की जरूरत है। किसानों को वैकल्पिक माध्यमों से खेती के लिए जल उपलब्ध कराया जाना चाहिए।

केंद्रीय मंत्रालय ने जताई असमर्थता
केंद्रीय मंत्रालय की ओर से कहा गया है कि देश में भू-जल दोहन के लिए करीब 3 करोड़ सरंचनाएं हैं। वहीं, प्रत्येक घर में भू-जल दोहन की निगरानी और पाबंदी एक जटिल और चुनौतीपूर्ण काम है। भू-जल दोहन रोकने और एनओसी लेने के लिए व्यापक जागरुकता अभियान शुरु किया जाएगा।

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