हाथ फैलाते वे मुंह मोड़ते हम: भीख मांगना कुछ की मजबूरी है, तो कई ने इसे व्यवसाय बना लिया है
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भारत जैसे देश के कोने-कोने में भिखारी मिल जाएंगे। कुछ की मजबूरी है, तो कुछ ने इसे अपना व्यवसाय बना लिया है। दिल्ली हाइकोर्ट के हालिया फैसले के बाद दिल्ली में भीख मांगना अपराध नहीं रहा। इसके पक्ष में भी लोगों के तर्क हैं और इसके विपक्ष में भी लोग खड़े हैं।
''तुम्हें अपने आप पर शर्म आनी चाहिए,'' एक मनचले टाइप का युवक हाथ फैलाए खड़े भिखारी से कहता है। ''चलो, मैं तुम्हें काम दिलवाता हूं।'' साफ है कि युवक टाइम पास के मूड में है। ''भीख भले ही मत दो, पर ज्ञान मत बांटो,'' भिखारी का जवाब है। फिर वह होठों ही होठों में कुछ बुदबुदाते हुए एक कार की तरफ चला जाता है। देश की राजधानी और सत्ता की मायानगरी दिल्ली में भिखारी बहुतायत में पाए जाते हैं। उपरोक्त दृश्य बहुत आम हैं। सड़क पर सिग्नल के लाल होते ही भिखारी सक्रिय हो जाते हैं। अचानक से कार की खिड़कियां बजने लगती हैं और फैली हुई हथेलियां सामने आ जाती हैं।
दूधमुंहे बच्चे आंखों के सामने लाकर आपकी करुणा उपजाने की कोशिश, जो अधिकतर कामयाब रहती है। जब ब्रितानी टूरिस्ट शान स्वान दिल्ली और राजस्थान के छह हफ्तों के टूर पर भारत आया, तो उसने पूरे तीन गीगाबाइट फोटो सिर्फ हिंदुस्तानी भिखारियों के खींचे। जाने के पहले उसने कहा कि भारत के वातावरण में ही कुछ ऐसा है, क्योंकि भिखारियों के चेहरे पर काफी शांति का भाव होता है और यह भाव भाग्यवादी नहीं है। यूरोपीय भिखारियों के चेहरे पर एक आपराधिक भाव होता है, क्योंकि वे हमेशा कानून का उल्लंघन करते रहते हैं। खैर, भिखारी तो भिखारी ही हैं।
दिल्ली में भीख मांगना अब अपराध नहीं रहा
शान का निरीक्षण बिल्कुल गलत नहीं है। कहने को तो भिक्षावृत्ति भारत में भी अपराध है, लेकिन आठ अगस्त को आए एक ताजातरीन अदालती फैसले ने राजधानी दिल्ली को तो इस अपराध से मुक्त कर ही दिया है। दिल्ली में भीख मांगना अब अपराध नहीं रहा। दिल्ली हाईकोर्ट ने भिक्षावृत्ति को अपराध बनाने वाले कानून बॉम्बे भिक्षावृत्ति रोकथाम अधिनियम (बॉम्बे बैगिंग प्रिवेंशन एक्ट) 1959 को राजधानी के संदर्भ में असंवैधानिक बताते हुए खारिज कर दिया। इस फैसले के बाद दिल्ली पुलिस भिखारियों को गिरफ्तार नहीं कर पाएगी, जबकि इससे पहले पुलिस भिखारियों को इस अधिनियम के तहत गिरफ्तार करती थी।
कार्यवाहक मुख्य न्यायमूर्ति गीता मित्तल व न्यायमूर्ति सी. हरिशंकर की खंडपीठ ने कहा कि इस अधिनियम के तहत दिल्ली में भिक्षावृत्ति को अपराध बताने और इस संबंध में पुलिस अधिकारी को शक्ति प्रदान करने वाले प्रावधान असंवैधानिक हैं, इसलिए इसे खारिज किया जाता है। इससे अलग मुद्दों से संबंधित प्रावधानों को खारिज करने की जरूरत नहीं है, यह पहले की तरह ही प्रभावी रहेंगे। हालांकि कोर्ट ने जबरन भिक्षावृत्ति कराने वालों पर कार्रवाई के लिए दिल्ली सरकार को कानून बनाने की छूट दी है। हाईकोर्ट ने 16 मई को कहा था कि जिस देश में सरकार लोगों को रोजगार व भोजन देने में असमर्थ है, वहां पर भिक्षावृत्ति को अपराध कैसे माना जा सकता है। कोर्ट ने यह टिप्पणी दो जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए की थी।
सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर और कर्णिका साहनी ने जनहित याचिका दायर कर दिल्ली में भिखारियों को मूलभूत सुविधाएं देने और भिक्षावृत्ति को अपराध के दायरे से बाहर लाने की मांग की थी। इन याचिकाओं में भिखारियों के लिए भोजन और चिकित्सा सुविधाएं देने का भी आग्रह किया गया था। ये भिखारी कौन होते हैं? ये भीख क्यों मांगते हैं? भिखारी शायद ही अकेले घूमते हैं। वे हमेशा समूहों में या ‘घरानों’ में चलते हैं। उनके पास आदिवासियों जैसे नैतिक मानदंड नहीं होते। बच्चे बड़ी धूर्तता से बड़ों से अतिरिक्त मिली भीख छुपाते हैं। हर कोई दूसरों पर नजरें गड़ाए रहता है और जिन दिनों भिखारियों को पकड़ने का अभियान चल रहा होता है, एक तीखी सीटी की आवाज आती है और सब के सब हवा में यूं गायब हो जाते हैं, जैसे गधे के सिर से सींग। वे कहां छुपते हैं? उन्हें कौन छुपाता है? जहां भी ‘घराना’ सक्रिय होता है, वहां एक सीधा साधा-सा लोफर मंडराता रहता है, जो जरा-सा भी खतरा नजर आते ही, उन्हें सुरक्षित जगह पर ले जाता है। वह उनका संरक्षक और उनकी कमाई का मालिक भी होता है। किसी अनदेखे दादा से उनका तालमेल भी वही बैठाता है।
भिखारियों के भी इलाके यानी कि बीट्स तय होते हैं
दिलचस्प बात यह है कि पुलिसवालों और रिपोर्टरों की तरह भिखारियों के भी इलाके यानी कि बीट्स तय होते हैं और वे अपने इलाकों में ही पाए जाते हैं। वही भिखारी हर दिन उसी जगह पर बैठा मिलेगा। अभी हाल ही के कुछ दिनों तक राजीव चौक से मिंटो ब्रिज को जोड़ने वाली सड़क पर एक लड़की सुबह साढ़े सात से साढ़े आठ बजे के बीच रेंगते हुए भीख मांगती थी। जब ट्रैफिक घना हो जाता था, तब वह वापस लौट जाती थी। जाहिरा तौर पर पोलियो की शिकार बमुश्किल 11 साल की यह लड़की ट्रैफिक सिग्नल के लाल होते ही कारों, तिपहिया वाहनों और स्कूटरों के बीच खुद को हाथों और घुटनों पर ठेलती हुई रेंगने लगती थी। उसके रेंगते हुए शरीर को देखकर सहानुभूति उपजती थी।
वह चिथड़ों में कभी नजर नहीं आती थी, बल्कि उसके कानों से सस्ते झुमके लटक रहे होते थे। वहीं पास में फुटपाथ पर उसका छह वर्षीय भाई उसके संरक्षक के तौर पर खड़ा रहता था, जो पैसा उससे लेकर अपनी मां को दे देता था, जो अपने एक दूधमुंहे बच्चे (एक दो साल की बेटी) के साथ किसी निकटस्थ गलियारे में खड़ी रहकर नजर रख रही होती थी। दफ्तरों की भीड़ शुरू होते ही यह पूरा परिवार हनुमान मंदिर चला जाता था। शंकर मार्केट के गलियारे में एक बुढ़िया हुआ करती थी, जो अपने कूल्हों पर बैठती थी। वह काफी उम्रदराज नजर आती थी। उसकी आंखों पर जो मोतियाबिंद की धूसर परत थी, उसके मद्देनजर केवल सत्यजित राय का कैमरा ही इस गतिहीन निश्चल इंसानी आकृति के साथ न्याय कर सकता था। शंकर मार्केट के पीछे दुकान चलाने वाले एक दर्जी ने कसम खाकर कहा कि वह सौ साल से ऊपर की है, क्योंकि ऐसा उसके अब्बाजान कहते थे।
जिस तरह से वह साड़ी लपेटती थी, उससे लगता था कि वह बंगाल या ओडिशा की है। बिना हाथ या चेहरा हिलाए, वह सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे तक एक ही स्थिति में पड़ी रहती थी। एक दिन किसी ने उसके खाली कटोरे में 20 रुपये का नोट डाला। दूसरे ने दो और पांच रुपये के दो सिक्के डाले और तीसरे ने एक-एक रुपये के तीन सिक्के, ताकि वे कुल दस रुपये हो जाएं। दो घंटे बाद जब वे वापस आए, तो देखा कि कटोरा खाली था। खंभे के पीछे से कोई नजर रखे हुए था। सवाल यह था कि हर दो घंटे बाद पैसा कहां चला जाता था? पैसे पर किसकी नजर थी? चार बजे बाद वह कहां जाती थी?
किसी जमाने में लोग गुलाम रखते थे, अब लोग भिखारी रखते हैं
हर शनिवार और मंगलवार को लोहे के चादर से बनी आकृतियां बड़े-बड़े लोहे के कटोरों में रखकर मद्रास होटल और बाराखंभा रोड की भीड़ भरे बस-स्टापों, हनुमान मंदिर, पार्क होटल, सिंधिया हाउस आदि जैसे महत्वपूर्ण बिंदुओं पर रख दी जाती हैं। इन आकृतियों पर गेंदे के फूल का एक सस्ता माला भी लपेट दिया जाता है। शनि देवता के कोप से बचने के लिए लोग इन कटोरों में सिक्के डालते रहते हैं। उतनी ही तेजी से ये कटोरे खाली भी होते रहते हैं। जाहिर है कि कोई इन पर नजर रखे रहता है। तथापि वह उपाय कुशल व्यक्ति कौन है, जो औसत व्यक्ति के डर और मनोविज्ञान से उसका फायदा उठाने की हद तक वाकिफ है।
किसी जमाने में लोग गुलाम रखते थे, अब लोग भिखारी रखते हैं। ये ‘मालिक’ तय करते हैं कि भिखारी कहां भीख मांगेगा और रिमोट कंट्रोल से उसकी जिंदगी को चलाते हैं। जहां खाने-पीने की जगहें न हों, ऐसी जगहों को प्राथमिकता दी जाती है। मालिकों को नकदी चाहिए, भले ही वह बूंद-बूंद करके आए। भीख के बदले भिखारियों को क्या मिलता है? खाना, कपड़ा और आसरा। बंगाली मार्केट से मिंटो ब्रिज तक रेलवे लाइन के किनारे झुग्गियों की कतार है। दादाओं ने यहां पांच-पांच फुट के दड़बे बना रखे हैं, जो भिखारियों को 1000 रुपए में किराये पर दिए जाते हैं। इस गैरकानूनी निर्माण को नगर निगम गिरा देता है, लेकिन वे फिर से बन जाते हैं।
भिखारियों के साथ एक दिन बिताने के बाद यह कहा जा सकता है कि भिखारी पैदा नहीं होते, बल्कि बनाए जाते हैं। शरलॉक होम्स को भी ‘एक मुड़े हुए होठ वाले आदमी (मैन विद द ट्विस्टेड लिप) से निपटना पड़ा था, जिसे भीख मांगने में पत्रकारिता या बैंक की नौकरी से ज्यादा पैसा नजर आया था। 1981 में ‘जोश’ नामक एक फिल्म भी आई थी, जिसमें भिक्षावृत्ति के पेशे को रेखांकित किया गया था कि किस तरह एक संगठित गिरोह लोगों से भीख मंगवाकर करोड़पति हो जाता है और अंत में उस गिरोह के सरगना की मौत भिखारियों से वसूले गए सिक्कों के ढेर के नीचे दबकर होती है। लेकिन सवाल है, इंसानों को इस तरह से क्यों गिरना चाहिए?