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दिल्ली के CM बने तो कांटों का ताज पहनेंगे केजरीवाल

Tue, 10 Feb 2015 08:52 AM IST
Updated Tue, 10 Feb 2015 08:52 AM IST
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became Delhi CM will run on a bed of thorns Kejriwal

तमाम एग्जिट पोल आम आदमी पार्टी को स्पष्ट बहुमत दर्शा रहे हैं, ऐेसे में अगर अरविंद केजरीवाल केंद्र शासित दिल्ली में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठते हैं तो अपने वायदे पूरे करने को उन्हें कांटों की सेज पर चलना होगा।

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दरअसल, आप के मुख्य वायदों में शामिल जनलोकपाल बिल, पूर्ण राज्य का दर्जा, आवसीय योजना, कानून व्यवस्था, पूरी दिल्ली को सीसीटीवी कैमरों व वाईफाई से युक्त करने सहित अन्य कामों के लिए बजट या मंजूरी उसके सबसे बड़े मौजूदा राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी भाजपा की मोदी सरकार से ही मिलेगी।
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सिर्फ बड़े मुद्दों का सवाल ही नहीं है बड़ा चुनावी मुद्दा रहे अनाधिकृत कॉलोनियों को अधिकृत करने, उनके विकास कार्य, बजट के अभाव में पूर्वी दिल्ली, उत्तरी व दक्षिणी दिल्ली नगर निगमों में सालों व महीनों से अटकी वृद्धा व विधवा पेंशन व अन्य गली-मुहल्ले के छोटे कामकाज के लिए भी केजरीवाल के सामने संकट खड़ा हो सकता है। वहीं बिजली-पानी का भी दिल्ली में आपूर्ति करना मुश्किल भरा कदम साबित हो सकता है।
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हरियाणा की भाजपा सरकार अगर मुनक नहर में पानी नहीं छोड़ती है तो गर्मी में पानी की समस्या से भी जूझना पड़ेगा। दिल्ली के विकास को लेकर बना दिल्ली विकास प्राधिकरण से भी तालमेल बिठाना कठिन होगा। क्योंकि यह प्राधिकरण सीधे तौर पर केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय के अधीन है।

इन मुद्दों का देना होग जवाब

became Delhi CM will run on a bed of thorns Kejriwal

दिल्ली फतेह करने के बाद भले ही केजरीवाल भाजपा के कब्जे वालीं नगर निगम की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाकर वहां कब्जा कराने की कोशिश करें लेकिन यह भी 2017 तक संभव नहीं होगा, क्योंकि 2017 में नगर निगम में चुनाव होने के बाद ही सत्ता परिवर्तन संभव है।

वर्ष 2013 में 28 विधानसभा सीटें आने के बाद कांग्रेस के समर्थन से जब केजरीवाल ने सरकार बनाई थी तो जनलोकपाल के मुद्दे पर उन्होंने 49 दिनों में सरकार छोड़ दी। उन्हें भगौड़ा बताने वाले विपक्ष ने यह मुद्दा इस चुनाव में भी कायम रखा

जानकारों की माने तो जनलोकपाल सहित अन्य मुद्दों पर पूर्ण बहुमत मिलने पर केजरीवाल सरकार इस बार योजनाबद्ध तरीके से इंतजार तो कर सकती है लेकिन उसे जनता व मीडिया के बीच अपने वायदों का जवाब समय-समय पर देना होगा।

तमाम बजट व योजनाएं एलजी के माध्यम से केंद्र सरकार से मंजूरी के बिना न मिलने के अलावा केंद्र के ही अधीन कानून व्यवस्था भी एक बड़ा इश्यू है। वैसे भी प्रचार के दौरान भाजपा नेता मंच से यह बोलते रहे कि केंद्र के बाद राज्य की सरकार जनता बनाती है तो ही सभी काम हो आसानी से हो सकेंगे।

क्या फिर धरना-प्रदर्शन करेगी सरकार?

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दिल्ली सरकार की स्थिति ठीक वैसी ही होती है जैसे की बैंक में लॉकर लिया जाता है। लॉकर के इस्तेमाल में बैंकर व ग्राहक के पास मौजूद दोनों चाबी लगने पर ही लॉकर खुलता है। दिल्ली की सरकार के साथ केंद्र सरकार की चाबी लगे बिना अधिकांश कार्य संभव नहीं है।

ऐसी स्थिति में दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिलने पर ही राज्य सरकार अकेली चाबी से सबकुछ कर सकती है। ऐसे में सवाल यह उठता है पूर्ण राज्य का दर्जा या जनलोकपाल बिल की मंजूरी के लिए क्या आप सरकार व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल फिर धरने-प्रदर्शन करेंगे।

उनके धरने प्रदर्शन की शैली को प्रचार में विपक्ष ने हथियार बनाया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तो अपने प्रचार में यह तक कहा कि आप की मास्टरी धरने प्रदर्शन की है, उसे वही करने दो।

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