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कश्मीरी प्रवासी की अपील खारिज: अदालत ने कहा- सेवानिवृत्ति के बाद सरकारी आवास रखने का हक नहीं
Wed, 23 Mar 2022 07:53 PM IST
प्रशांत कुमार
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
Published by: प्रशांत कुमार
Updated Wed, 23 Mar 2022 07:53 PM IST
सार
न्यायालय ने सरकारी सेवा से सेवानिवृत्ति के बाद भी आवंटित सरकारी आवास में तीन वर्ष रहने की मांग संबंधी कश्मीरी प्रवासी की याचिका खारिज कर दी। याची ने तर्क दिया कि उनके गृहनगर लौटने से उनके जीवन और उनके परिवार के सदस्यों के जीवन को गंभीर खतरा होगा।
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
उच्च न्यायालय ने सरकारी सेवा से सेवानिवृत्ति के बाद भी आवंटित सरकारी आवास में तीन वर्ष रहने की मांग संबंधी कश्मीरी प्रवासी की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने हाईकोर्ट के ही सिंगल जज के याचिका खारिज करने संबंधी फैसले को उचित ठहराते हुए कहा कि इस फैसले में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है।
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कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विपिन सांघी और न्यायमूर्ति नवीन चावला की खंडपीठ ने कहा कि तथ्यों से ऐसा कुछ नहीं है कि सरकारी अधिकारी याची के साथ भेदभाव कर रहे हैं। पीठ ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता की अपील को स्वीकार किया जाता है तो सरकारी आवास के लिए कतार में इंतजार कर रहे अन्य लोगों का क्या होता है? सरकार के पास असीमित आवास नहीं है।
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न्यायमूर्ति वी कामेश्वर राव ने 16 फरवरी को याची सेवानिवृत्त कश्मीरी प्रवासी की उस याचिका को खारिज कर दिया था जिसमें उसे दिल्ली में आवंटित सरकारी क्वार्टर से उनकी बेदखली को चुनौती दी थी। अपीलकर्ता सुशील कुमार धर ने कश्मीरी प्रवासी होने का दावा करते हुए बताया कि उसे राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (फील्ड ऑपरेशन डिवीजन) उधमपुर जम्मू और कश्मीर राज्य में एसआरओ के रूप में नियुक्त किया गया था। वर्ष 1983 में उसकी नियुक्ति हुई बाद में उसे दिल्ली स्थानांतरित कर दिया गया। याची ने कहा वह 31 मार्च 2020 को सेवा से सेवानिवृत्त हुआ। उन्होंने दावा किया कि सरकार ने 28 मार्च, 2017 को एक योजना शुरू की थी जिसमें जम्मू और कश्मीर राज्य से संबंधित केंद्र सरकार के सेवानिवृत्त कर्मचारियों को वैकल्पिक आवास प्रदान किया गया है।
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याची धर ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि जिसमें कश्मीरी प्रवासियों को सेवानिवृत्ति की तारीख से तीन साल की अवधि के लिए आवास बनाए रखने की अनुमति दी है। उन्होंने बेदखली की कार्यवाही पर रोक लगाने और तीन साल की अवधि के लिए आवास बनाए रखने की अनुमति मांगी प्रदान करने का निर्देश देने का आग्रह किया।
याची ने तर्क दिया कि उनके गृहनगर लौटने से उनके जीवन और उनके परिवार के सदस्यों के जीवन को गंभीर खतरा होगा। एकल न्यायाधीश ने याचिका को इस आधार पर खारिज कर दिया था कि मार्च 2017 की योजना केंद्र सरकार के उन कर्मचारियों पर लागू थी जो संबंधित समय पर श्रीनगर में तैनात थे और 1 नवंबर 1989 के बाद सुरक्षा आधार पर दिल्ली स्थानांतरित कर दिए गए थे।