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Delhi NCR News: डूसू चुनाव से पहले अस्तित्व में आई एबीवीपी, 14 साल बाद लड़ा पहला चुनाव
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एबीवीपी का वर्ष 1949 में हुआ था गठन और डूसू चुनाव वर्ष 1954 से होने शुरू हुए थे
विनोद डबास
नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ (डूसू) में दबादबा बनाए रखने वाला अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ऐसा संगठन है जिसका गठन डूसू चुनाव शुरू होने से पांच वर्ष पूर्व 1949 में हो गया था। संगठन ने 14 साल बाद 1968 में पहला चुनाव लड़ा। जबकि डूसू चुनाव 1954 से शुरू हो चुके थे। 1954 से लेकर 1968 तक करीब डेढ़ दशक तक डूसू के चुनावों में कांग्रेस समर्थक गुटों का ही दबदबा रहा। उस समय राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस पार्टी भी सबसे ताकतवर राजनीतिक शक्ति थी और उसके नेताओं की पकड़ दिल्ली विश्वविद्यालय में भी स्पष्ट दिखती थी। एबीवीपी के चुनावी मैदान से दूर रहने की वजह से डूसू की राजनीति कांग्रेस के नेताओं के इर्द-गिर्द ही घूमती रही।
एबीवीपी ने 1968 से पहली बार डूसू चुनाव में अपनी औपचारिक मौजूदगी दर्ज कराई। हालांकि संगठन पहले से विश्वविद्यालय के भीतर वैचारिक और गतिविधि स्तर पर सक्रिय था, लेकिन चुनावी भागीदारी से उसने छात्र राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत करने का नया प्रयास किया। मगर चुनावी अखाड़े में शुरुआती सफर उसके लिए आसान नहीं रहे। डूसू चुनाव में एबीवीपी का पहला अनुभव निराशाजनक रहा। वर्ष 1968 से लेकर लगातार तीन चुनावों तक संगठन को हार का सामना करना पड़ा। एबीवीपी को भले ही शुरुआती हारों ने चुनौती दी, लेकिन यही अनुभव आगे उसके लिए पूंजी साबित हुई। संगठन ने धीरे-धीरे अपनी पकड़ मजबूत की और छात्रों के बीच वैचारिक राजनीति को स्थापित किया। एबीवीपी ने खुद को सिर्फ चुनावी संगठन के रूप में नहीं, बल्कि एक सक्रिय छात्र आंदोलन के रूप में स्थापित करना शुरू किया। इससे छात्रों का झुकाव उसकी ओर बढ़ा और समय के साथ उसने डूसू चुनाव में अपनी पहचान बनाई।
एनएसयूआई की भी हार से शुरू हुई थी चुनावी यात्रा
भाजपा के छात्र संगठन एबीवीपी की तरह कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई को भी शुरुआती वर्षों में हार का सामना करना पड़ा। इस मामले में वह एबीवीपी से भी काफी आगे रही। एबीवीपी ने तो तीन हार के बाद जीत नसीब हुई, लेकिन एनएसयूआई को तो लगातार चार हार का सामना करना पड़ा। वर्ष 1971 में अस्तित्व में आई एनएसयूआई ने वर्ष 1972 में पहला चुनाव लड़ा। उसे वर्ष 1972, 73, 74 व 77 में हार झेलनी पड़ी। वर्ष 1975 व 76 में देश में आपातकाल लगने के कारण डूसू के चुनाव नहीं हुए थे।
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विनोद डबास
नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ (डूसू) में दबादबा बनाए रखने वाला अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ऐसा संगठन है जिसका गठन डूसू चुनाव शुरू होने से पांच वर्ष पूर्व 1949 में हो गया था। संगठन ने 14 साल बाद 1968 में पहला चुनाव लड़ा। जबकि डूसू चुनाव 1954 से शुरू हो चुके थे। 1954 से लेकर 1968 तक करीब डेढ़ दशक तक डूसू के चुनावों में कांग्रेस समर्थक गुटों का ही दबदबा रहा। उस समय राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस पार्टी भी सबसे ताकतवर राजनीतिक शक्ति थी और उसके नेताओं की पकड़ दिल्ली विश्वविद्यालय में भी स्पष्ट दिखती थी। एबीवीपी के चुनावी मैदान से दूर रहने की वजह से डूसू की राजनीति कांग्रेस के नेताओं के इर्द-गिर्द ही घूमती रही।
एबीवीपी ने 1968 से पहली बार डूसू चुनाव में अपनी औपचारिक मौजूदगी दर्ज कराई। हालांकि संगठन पहले से विश्वविद्यालय के भीतर वैचारिक और गतिविधि स्तर पर सक्रिय था, लेकिन चुनावी भागीदारी से उसने छात्र राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत करने का नया प्रयास किया। मगर चुनावी अखाड़े में शुरुआती सफर उसके लिए आसान नहीं रहे। डूसू चुनाव में एबीवीपी का पहला अनुभव निराशाजनक रहा। वर्ष 1968 से लेकर लगातार तीन चुनावों तक संगठन को हार का सामना करना पड़ा। एबीवीपी को भले ही शुरुआती हारों ने चुनौती दी, लेकिन यही अनुभव आगे उसके लिए पूंजी साबित हुई। संगठन ने धीरे-धीरे अपनी पकड़ मजबूत की और छात्रों के बीच वैचारिक राजनीति को स्थापित किया। एबीवीपी ने खुद को सिर्फ चुनावी संगठन के रूप में नहीं, बल्कि एक सक्रिय छात्र आंदोलन के रूप में स्थापित करना शुरू किया। इससे छात्रों का झुकाव उसकी ओर बढ़ा और समय के साथ उसने डूसू चुनाव में अपनी पहचान बनाई।
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एनएसयूआई की भी हार से शुरू हुई थी चुनावी यात्रा
भाजपा के छात्र संगठन एबीवीपी की तरह कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई को भी शुरुआती वर्षों में हार का सामना करना पड़ा। इस मामले में वह एबीवीपी से भी काफी आगे रही। एबीवीपी ने तो तीन हार के बाद जीत नसीब हुई, लेकिन एनएसयूआई को तो लगातार चार हार का सामना करना पड़ा। वर्ष 1971 में अस्तित्व में आई एनएसयूआई ने वर्ष 1972 में पहला चुनाव लड़ा। उसे वर्ष 1972, 73, 74 व 77 में हार झेलनी पड़ी। वर्ष 1975 व 76 में देश में आपातकाल लगने के कारण डूसू के चुनाव नहीं हुए थे।
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