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डेढ़ साल की बच्ची के शरीर में दो प्राइवेट पार्ट

Tue, 16 Sep 2014 04:07 PM IST
Updated Tue, 16 Sep 2014 04:07 PM IST
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15 month old girl have both male and female private parts.

दिल्ली के एक नामी अस्पताल में ऐसी विदेशी बच्ची को भर्ती कराया गया जिसके मेल और फीमेल दोनों प्राइवेट पार्ट विकसित हो रहे थे।

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नाईजीरिया की एक 15 माह की बच्ची के प्राइवेट पार्ट्स की सर्जरी कर दिल्ली के डॉक्टरों ने शारीरिक विकृति से मुक्ति दिलाई है। जेनेटिक डिस्ऑर्डर की वजह से बच्ची के प्राइवेट पार्ट्स की जगह महिला और पुरुष दोनों के अंग विकसित हो गए थे।

जिसके बाद बच्ची की सर्जरी कर पुरुष के निजी अंग को हटाया गया और बच्ची के प्राइवेट पार्ट्स की रि-कंस्ट्रक्टिव सर्जरी की गई। बच्ची अब पूरी तरह स्वस्थ है और उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई है।
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डॉक्टरों ने इलाज के बाद उसके परिजनों को एक सलाह भी दी है जिसे नजरअंदाज करने का परिणाम बुरा हो सकता है।

दोबारा विकसित हो सकता है वो अंग

15 month old girl have both male and female private parts.

शालीमार बाग स्थित मैक्स सुपर स्पेशयलिटी अस्पताल में नाईजीरिया की 15 माह बच्ची को इलाज के लिए लाया गया था। जांच के बाद पता लगा कि बच्ची के शरीर में 21 हाइड्रोएक्साजइल एंजाइम की कमी की वजह से निजी अंगों के पास मेल और फीमेल दोनों के प्राइवेट पार्ट्स विकसित हो गए थे।

लिहाजा मैक्स अस्पताल की पीडियाट्रिक इंडोक्रिनोलॉजी विभाग की कंसलटेंट और पीडियाट्रिक सर्जन ने मिलकर बच्ची की सर्जरी करने का निर्णय लिया।

पहले तो निजी अंग के पास विकसित हुए पुरुष के निजी अंग को हटाया गया। इसके बाद बच्ची के निजी अंगों की रि-कंस्ट्रक्टिव सर्जरी की गई। बच्ची अब सामान्य जीवन जी सकेगी और भविष्य में मां भी बन सकेगी।

चिकित्सकों का कहना है कि मरीज को जीवन भर दवा खानी पड़ेगी। दवा छोड़ने पर भविष्य में वही अंग दोबारा से विकसित होने का खतरा रहता है।

जानिए, कैसे और कब होती है ये समस्या

15 month old girl have both male and female private parts.

डॉ. वैशाखी रस्तगी ने बताया कि किडनी के उपर एड्रिनल ग्लैंड होती है जो शरीर में ग्लूकोज, ब्लड प्रेशर और हॉरमोन्स को मेंटेन करता है। जेनेटिक डिस्ऑडर की वजह से बच्ची कॉर्टिसोल, एलडोस्ट्रोन में ब्लॉकेज था। इसकी वजह से सारा हॉरमोन्स सीधे टैस्टोस्ट्रोन में जा रहा था।

इसकी वजह से कई बार गर्ल चाईल्ड में पुरुष के अंग विकसित हो जाते हैं। भारत जैसे देश में भी पांच से छह हजार बच्चों में से एक में इस तरह की समस्या आती है।

लेकिन शुरूआती दौर में पता लगने पर इस बीमारी को दवा से ठीक कर ली जाती है। लेकिन देर होने पर सर्जरी करनी पड़ती है और जीवन भर दवा भी खानी पड़ती है।

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