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अर्जुन पुरस्कार विजेता के साथ हुआ 'विश्वासघात'
अमर उजाला, विनय बहुगुणा, कर्णप्रयाग
Updated Thu, 29 Aug 2013 08:28 AM IST
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उत्तराखंड के सुरेंद्र सिंह कनवासी अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी होने के साथ ही अर्जुन पुरस्कार विजेता भी हैं। सरकार ने इनसे कई वायदे किए लेकिन पूरा नहीं कर पाई।
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इतना ही नहीं प्रदेश के लिए कुछ करने की ललक में अपनी जॉब भी छोड़ी, लेकिन सरकार वादाखिलाफह से इनका सपना सच नहीं हो पाया।
रोइंग (नौकायन) के अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी सुरेंद्र सिंह कनवासी ने 1985-91 तक राज्य, राष्ट्रीय और विश्वस्तर पर पांच स्वर्ण, तीन रजत और तीन कांस्य पदक जीते। इस उपलब्धि के लिए बेशक वह सम्मान के हकदार हैं, लेकिन उत्तराखंड सरकार की उपेक्षा से वह व्यथित हैं।
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कर्णप्रयाग के कोलसो गांव के निवासी सुरेंद्र सिंह कनवासी माध्यमिक शिक्षा के बाद वर्ष 1981 में सेना में भर्ती हुए। 1983 में सीएमई पुणे में तैनाती हुई। 1984 में उनका चयन सेना की रोइंग टीम में कोलकाता में हुए नेशनल गेम्स के लिए हुआ।
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इसी साल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलते हुए उन्होंने देश के लिए रजत पदक जीता। 11 साल में कई मुकाम हासिल करने वाले कनवासी वर्ष 1992 में पीठ दर्द के चलते ओलंपिक में शामिल नहीं हो पाए। इसका मलाल उन्हें आज भी है।
उपेक्षा का हाल
वर्ष 2008 में उत्तराखंड सरकार ने कनवासी को टिहरी डैम में वॉटर स्पोर्ट्स डेवलपमेंट के चीफ इंस्ट्रक्टर के तौर पर तैनात करने की बात की थी। प्रदेश के लिए कुछ करने की ललक में उन्होंने साई से इस्तीफा भी दे दिया, लेकिन प्रदेश सरकार वादा भूल गई।
उपेक्षा का सिलसिला यहीं नहीं रुका। ओएसडी पर्वतारोही के तौर पर भी वॉटर स्पोर्ट्स के लिए प्रोजेक्ट तैयार किया, लेकिन समय पर तय भुगतान भी नहीं हुआ। वर्ष 2010-11 में उत्तराखंड पुलिस के जवानों को भी ट्रेनिंग दी। यहां भी मायूसी मिली।
उत्तराखंड सरकार का खेल और खिलाड़ियों के प्रति रवैया गैरजिम्मेदाराना है। सरकार के कहने पर साई से इस्तीफा दिया, लेकिन आज तक वॉटर स्पोर्ट्स में चीफ इंस्ट्रक्टर तो दूर, समय पर भुगतान भी नहीं हुआ। घर में ढाई माह से पेयजल सप्लाई ठप है।
- सुरेंद्र कनवासी, नौकायन में अर्जुन पुरस्कार विजेता
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