उत्तराखंड: पूर्व मुख्यमंत्रियों के आवास बकाया मामले में सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने सुरक्षित रखा फैसला
- आवास व अन्य सुविधाओं का बकाया माफ करने का मामला
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नैनीताल हाईकोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्रियों को आवास व अन्य सुविधाओं के बकाया माफ करने को लेकर सरकार के संशोधित अधिनियम को चुनौती देनी वाली जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद निर्णय सुरक्षित रख लिया है।
मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन एवं न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। रुलक देहरादून की ओर से हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर संशोधित अधिनियम को असांविधानिक करार देते हुए निरस्त करने की मांग की थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि पूर्व में कोर्ट ने बाजार दर पर किराया वसूलने का आदेश पारित किया था जिसके बाद विधायिका को कोर्ट के आदेश को बाईपास करने का अधिकार नहीं है।
याचिकाकर्ता की ओर से पूर्व मुख्यमंत्रियों से बकाया वसूली के लिए आदेश पारित करने की प्रार्थना की गई थी। याचिका में कहा कि पूर्व में कोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्रियों से बाजार दर पर सुविधाओं का बकाया जमा करने के आदेश पारित किए थे।
जिसके बाद सरकार ने अध्यादेश पारित कर पूर्व मुख्यमंत्रियों को राहत देते हुए अध्यादेश को विधानसभा में पारित कराकर अधिनियम की शक्ल दे दी। अधिनियम में कहा गया था कि पूर्व मुख्यमंत्रियों से सुविधाओं के एवज में मानक किराए से 25 फीसदी अधिक किराया वसूला जाएगा।
यह भी कहा था कि मानक किराया सरकार तय करेगी। सरकार का कहना था कि पूर्व मुख्यमंत्री बिजली, पानी, सीवरेज, सरकारी आवास आदि का बकाया खुद वहन करेंगे मगर किराया सरकार तय करेगी।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने बताया कि अधिनियम पूरी तरह असांवधानिक है और संविधान के अनुच्छेद 14 समानता के अधिकार का उल्लंघन है। पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने निर्णय सुरक्षित रख लिया।