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उत्तराखंड कांग्रेस में हरीश रावत का एकछत्र राज या निपट अकेले
राकेश खंडूड़ी/ अमर उजाला, देहरादून
Updated Wed, 18 Jan 2017 12:03 PM IST
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हरीश रावत
- फोटो : Self
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प्रदेश कांग्रेस से एक-एक करके दिग्गजों की विदाई ने सीएम हरीश रावत को मुश्किल में डाल दिया है। सवाल मुख्यमंत्री हरीश रावत के नेतृत्व पर भी उठ रहे हैं। दरअसल, सत्ता की कमान संभालने के बाद से दिग्गज नेताओं की विदाई के बाद उनकी एकला चलो की नीति को लेकर सवाल उठ रहे हैं ।
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कमोबेश, ऐसी स्थिति में उनका बोला वह वाक्य ‘एको अहं, द्वितीयो नास्ति’ मौजूं हो उठा जो उन्होंने मुख्यमंत्री बनने के बाद पुलिस लाइन में एक कार्यक्रम के दौरान कहा था। उस वक्त वह मंत्रियों को पोर्टफोलियो न बांटे जाने को लेकर चर्चाओं में थे।
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मंगलवार को जब सीएम पत्रकारों से मुखातिब हुए तो एकला चलो का सवाल उनके सामने उठा।
बेशक सीएम कह रहे हैं कि उनके फैसले सामूहिकता में लिए गए और ये पूरी तरह से नीतिगत थे, मगर चुनावी नतीजे आने तक यह सवाल प्रेत की तरह उनके पीछे रहेगा। सियासी जानकारों की मानें तो दिग्गजों की विदाई से कांग्रेस के भीतर इंदिरा हृदयेश के सिवा अब कोई नेता नहीं रह गया जो हरीश रावत को चुनौती देने वाला हो।
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मुख्यमंत्री की कुर्सी के तकरीबन सभी दावेदार एक-एक करके कांग्रेस से विदा हो चुके हैं। मगर ऐन चुनाव के समय सियासी चौसर पर कांग्रेस के एक और वजीर को झपट कर भाजपा ने हरीश रावत के सामने सत्ता और कुर्सी दोनों को बचाने की सबसे कठिन चुनौती पेश की है।
जानकारों का मानना है कि हरीश रावत 18 मार्च के सियासी संकट के बाद एक बार फिर अपने राजनीतिक जीवन की सबसे कठिन चुनौती से आ घिरे हैं। इस कठिन वक्त में वे कांग्रेस की चुनावी वैतरणी पार लगा गए तो पार्टी में उनका एकछत्र राज कायम हो जाएगा, लेकिन कहीं नतीजे खिलाफ रहे तो उनके निपट अकेले हो जाने का भी उतना ही खतरा है।
सबसे कठिन चुनौती इस लिहाज से भी है कि भाजपा ने कांग्रेस की दुखती रग पर हाथ रखा है। जहां-जहां वह कमजोर थी, वहां-वहां उसने कांग्रेसी दिग्गजों को साधा और उन्हें मैदान में उतार दिया। बेशक मुख्यमंत्री इन बागियों को अब आपदा का सूत्रधार कहें, पॉली हाउस घोटाले और यूएस नगर में खनन के खेल से उनके कनेक्शन को उजागर करें, मगर बड़ा प्रश्न यह है कि क्या उनके ये खुलासे वोटों में तब्दील हो सकेंगे?
जहां तक सीएम का प्रश्न है तो कम से कम बागियों के मामले में वह वो देख पा रहे हैं, जो भाजपा नहीं देख पा रही है। उनका कहना है, ‘साल भर बाद जब ये (बागी) भाजपा छोड़कर जाएंगे, तब मेरी बात याद आएगी।’ बहरहाल, उनकी अगुआई में कांग्रेस सहानुभूति के मुद्दे के साथ चुनावी समर में उतरने जा रही है, जिसमें सीएम प्रदेश भर में घूम-घूमकर 18 मार्च से लेकर अब तक की सियासी घटनाओं की कथाएं सुनाएंगे।
उनकी इन कथाओं का जनता की मनोदशा पर क्या असर पड़ेगा, ये तो भविष्य बताएगा, मगर चुनावी नतीजों को लेकर सीएम का राजनीतिक भविष्य जरूर पढ़ा जाने लगा है। ये चुनाव कांग्रेस में या तो उनके एकछत्र राज की पटकथा लिखेंगे, या उन्हें निपट अकेला छोड़ देंगे?