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नारायण स्वामी इंस्टीट्यूट पर 7.60 लाख रुपये हर्जाना
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ब्यूरो/अमर उजाला/देहरादून।
मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया की मान्यता बगैर छात्रों को प्रवेश देने वाले नारायण स्वामी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस एंड रिसर्च पर 7.60 लाख रुपये हर्जाना लगाया गया है। जिला उपभोक्ता फोरम ने एक छात्र की शिकायत पर इंस्टीट्यूट के लिए यह फैसला सुनाया है। इस रकम में से 2.60 लाख रुपये छात्र की फीस और पांच लाख रुपये मानसिक व आर्थिक क्षतिपूर्ति के रूप में देने होंगे। धनराशि एक माह के भीतर लौटानी होगी।
अधिवक्ता आशीष चक्रवर्ती ने बताया कि सन्नी पुत्र श्यामलाल सैनी निवासी ग्राम कोटला कलन जिला उना हिमाचल प्रदेश ने नारायण स्वामी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस एंड रिसर्च नंदा की चौकी प्रेमनगर का एक विज्ञापन देखा था। इसी विज्ञापन के आधार पर उसने वर्ष 2016 में एमबीबीएस में दाखिला लिया। इसके लिए सन्नी ने पांच लाख रुपये डोनेशन और 2.60 लाख रुपये फीस के तौर पर दिए। उस वक्त इंस्टीट्यूट ने दावा किया था कि उसे एमसीआई की मान्यता प्राप्त है, लेकिन प्रथम वर्ष के परिणाम घोषित नहीं किए गए। पता चला कि इंस्टीट्यूट को एमसीआई की मान्यता ही नहीं मिल सकी है, इस कारण परिणाम घोषित नहीं हुआ। अन्य छात्रों ने भी जब इंस्टीट्यूट के अधिकारियों से पूछा तो वे टाल मटोल करने लगे। यही नहीं छात्रों ने जब अपनी फीस वापस मांगी तो इंस्टीट्यूट ने इनकार कर दिया। इसके बाद सन्नी की ओर से जिला उपभोक्ता फोरम में परिवाद दाखिल कर दिया गया। जिला उपभोक्ता फोरम ने मंगलवार को इंस्टीट्यूट के खिलाफ निर्णय सुनाया है।
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मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया की मान्यता बगैर छात्रों को प्रवेश देने वाले नारायण स्वामी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस एंड रिसर्च पर 7.60 लाख रुपये हर्जाना लगाया गया है। जिला उपभोक्ता फोरम ने एक छात्र की शिकायत पर इंस्टीट्यूट के लिए यह फैसला सुनाया है। इस रकम में से 2.60 लाख रुपये छात्र की फीस और पांच लाख रुपये मानसिक व आर्थिक क्षतिपूर्ति के रूप में देने होंगे। धनराशि एक माह के भीतर लौटानी होगी।
अधिवक्ता आशीष चक्रवर्ती ने बताया कि सन्नी पुत्र श्यामलाल सैनी निवासी ग्राम कोटला कलन जिला उना हिमाचल प्रदेश ने नारायण स्वामी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस एंड रिसर्च नंदा की चौकी प्रेमनगर का एक विज्ञापन देखा था। इसी विज्ञापन के आधार पर उसने वर्ष 2016 में एमबीबीएस में दाखिला लिया। इसके लिए सन्नी ने पांच लाख रुपये डोनेशन और 2.60 लाख रुपये फीस के तौर पर दिए। उस वक्त इंस्टीट्यूट ने दावा किया था कि उसे एमसीआई की मान्यता प्राप्त है, लेकिन प्रथम वर्ष के परिणाम घोषित नहीं किए गए। पता चला कि इंस्टीट्यूट को एमसीआई की मान्यता ही नहीं मिल सकी है, इस कारण परिणाम घोषित नहीं हुआ। अन्य छात्रों ने भी जब इंस्टीट्यूट के अधिकारियों से पूछा तो वे टाल मटोल करने लगे। यही नहीं छात्रों ने जब अपनी फीस वापस मांगी तो इंस्टीट्यूट ने इनकार कर दिया। इसके बाद सन्नी की ओर से जिला उपभोक्ता फोरम में परिवाद दाखिल कर दिया गया। जिला उपभोक्ता फोरम ने मंगलवार को इंस्टीट्यूट के खिलाफ निर्णय सुनाया है।
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