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17 साल की उम्र में आंदोलनकारी बने थे दुर्गा मल्ल
Updated Sat, 25 Aug 2018 02:04 AM IST
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ब्यूरो/अमर उजाला, डोईवाला। अमर शहीद मेजर दुर्गा मल्ल के बलिदान दिवस के मौके पर शनिवार को शक्ति भवन मंदिर सभागार में कार्यक्रम का आयोजन किया जाएगा। कार्यक्रम में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत, राज्य विधानसभा अध्यक्ष प्रेमचंद अग्रवाल और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट मौजूद रहेंगे। मेजर दुर्गा मल्ल का जन्म विकासखंड डोईवाला के खता गांव में 1913 में हुआ था। दुर्गा मल्ल 1930 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए सत्याग्रह आंदोलन से बहुत प्रभावित हुए। उस समय वह नौवीं कक्षा में पढ़ते थे। उन्होंने स्थानीय आंदोलन में भाग लेना शुरू कर दिया। उनकी इस सक्रियता के कारण बालक दुर्गा मल्ल के परिजनों पर अंगरेज शासन का दबाव बढ़ता गया।
1931 मे जब वह मात्र 18 वर्ष की आयु थे, तो वह गोरखा रायफल्स में भरती हो गए। वह नेताजी सुभाष चंद्र बोस से प्रभावित हुए और भारत को स्वतंत्र देखने के लिए ब्रिटिश फौज छोड़कर 1942 में आजाद हिंद फौज में भरती हो गए। 27 मार्च 1944 को कोहिमा मणिपुर क्षेत्र में आजाद हिंद फौज के लिए जासूसी करते हुए मेजर दुर्गा मल्ल ब्रिटिश फौज द्वारा पकड़ लिए गए। दिल्ली के लालकिले में ब्रिटिश फौजी अदालत ने उन्हें फांसी की सजा सुना दी। तत्कालीन अंग्रेज सरकार ने क्षमा मांगने और भूल स्वीकार करने पर फांसी की सजा माफ करने देने का प्रस्ताव दिया।
देशभक्त दुर्गा मल्ल ने प्रस्ताव ठुकरा दिया और कहा कि मेरा बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। 25 अगस्त 1944 को देशभक्त दुर्गा मल्ल को अंग्रेजों द्वारा तिहाड़ जेल में फांसी दे दी गई। उन्होंने अपने प्राणों का बलिदान देकर उत्तराखंड ही नहीं वरन पूरे राष्ट्र को गौरवान्वित किया। केंद्र सरकार ने उनकी शहादत को नमन करते हुए संसद भवन में उनकी कांस्य प्रतिमा को स्थापित किया। राज्य सरकार की ओर से डोईवाला महाविद्यालय को मेजर दुर्गा मल्ल का नाम देने के अलावा उनके गांव को जाने वाले मार्ग और नगर चौक डोईवाला को भी शहीद का नाम दिया गया।
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1931 मे जब वह मात्र 18 वर्ष की आयु थे, तो वह गोरखा रायफल्स में भरती हो गए। वह नेताजी सुभाष चंद्र बोस से प्रभावित हुए और भारत को स्वतंत्र देखने के लिए ब्रिटिश फौज छोड़कर 1942 में आजाद हिंद फौज में भरती हो गए। 27 मार्च 1944 को कोहिमा मणिपुर क्षेत्र में आजाद हिंद फौज के लिए जासूसी करते हुए मेजर दुर्गा मल्ल ब्रिटिश फौज द्वारा पकड़ लिए गए। दिल्ली के लालकिले में ब्रिटिश फौजी अदालत ने उन्हें फांसी की सजा सुना दी। तत्कालीन अंग्रेज सरकार ने क्षमा मांगने और भूल स्वीकार करने पर फांसी की सजा माफ करने देने का प्रस्ताव दिया।
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देशभक्त दुर्गा मल्ल ने प्रस्ताव ठुकरा दिया और कहा कि मेरा बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। 25 अगस्त 1944 को देशभक्त दुर्गा मल्ल को अंग्रेजों द्वारा तिहाड़ जेल में फांसी दे दी गई। उन्होंने अपने प्राणों का बलिदान देकर उत्तराखंड ही नहीं वरन पूरे राष्ट्र को गौरवान्वित किया। केंद्र सरकार ने उनकी शहादत को नमन करते हुए संसद भवन में उनकी कांस्य प्रतिमा को स्थापित किया। राज्य सरकार की ओर से डोईवाला महाविद्यालय को मेजर दुर्गा मल्ल का नाम देने के अलावा उनके गांव को जाने वाले मार्ग और नगर चौक डोईवाला को भी शहीद का नाम दिया गया।
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