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चरणदास चोर ने चुराया लोगों का दिल
Updated Mon, 12 Mar 2018 10:32 PM IST
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श्रीनगर। चरणदास चोर चोरी करता है, लेकिन झूठ नहीं बोलता है। वह गुरू के समक्ष लिए गए प्रण को पूरा करने में विश्वास रखता है। इसके लिए वह राजा का सिंहासन, रानी का प्रेम और मान- प्रतिष्ठा पाने का अवसर तक ठुकरा देता है। यहां तक कि प्रण के लिए अपने प्राण न्योछावर करने में देर नहीं करता।
चरणदास की इसी कहानी का जश्न-ए-विरासत नाट्य महोत्सव के पहली शाम को मंचन किया गया। गढ़वाल विश्वविद्यालय के स्वामी प्रेक्षागृह में नया थियेटर मध्य प्रदेश के कलाकारों ने लेखक, कवि और थियेटर निर्देशक हबीब तनवीर की रचना ‘चरणदास चोर’ को शानदार प्रस्तुतीकरण किया।
नाटक की शुरुआत होती है छत्तीसगढ़ के चरणदास चोर के पुलिस से बचने के लिए एक साधू के यहां शरण लेने से। चरणदास साधू को गुरु बना लेता है। साधू अपने शिष्यों को नैतिकता व ईमानदारी का पाठ पढ़ाते हैं और बुरी आदतें त्यागने का संकल्प लेने को कहते हैं।
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चरणदास भी गुरु के सामने शपथ लेता है कि वह कभी झूठ नहीं बोलेगा, सोने के बर्तन में खाना नहीं खाएगा और कभी शादी नहीं करेगा। गुरु उससे चोरी छोड़ने के लिए कहते हैं तो वह यह वचन नहीं देता। वह चोरी करता है लेकिन सच बोलता है। इससे उसकी ख्याति लगातार बढ़ती गई। एक दिन वह राजमहल का खजाना चुराने पहुंच गया तो उसकी सच्चाई से प्रभावित रानी उसके सामने शादी का प्रस्ताव रख देती है, लेकिन चरणदास प्रस्ताव को ठुकरा देता है। जिस पर उसको मौत की सजा दे दी जाती है। राम चंद्र सिंह के निर्देशन में कलाकारों ने जबरदस्त अभिनय से दर्शकों को बांधे रखा। हालांकि संवादों में छत्तीसगढ़ की स्थानीय बोली का पुट होने पर दर्शकों को समझने में कठिनाई हुई, लेकिन कलाकारों के अभिनय और कहानी ने इसको भारी नहीं पड़ने दिया।
अलग छवि बना गया चरणदास
चरणदास की कहानी चोरों के बारे में व्याप्त अवधारणा को झुठलाती है। अमूमन एक चोर को झूठा, एहसानफरामोश, निर्दयी, संवेदनहीन और आवारा किस्म का इंसान माना जाता है, लेकिन चरणदास चोर ठीक इसके विपरीत होता है।
नाटक के मुख्य संवाद
सारी दुनियां मुझे चरण दास चोर के नाम से जानती है
रानी तुम भूल गई मैने सच बोलने का प्रण लिया है।
मरुं या बचूं अपने गुरू के प्रण को कभी नहीं छोड़ूंगा।
नाटक के कलाकार
चरनदास चोर- ओंकार दास मानिक पूरी, गुरु-मनहरण गंधर्व, मंत्री-पुजारी रुपेश तिवारी, जुआरी- रोहित वैष्णव, गंजेड़ी-गणेश गंधर्व, रानी-पारूल सिंह, मुनीम-मन्ना लाल गंधर्व, दासी-संगीता सिन्हा, पुलिस-धन्नु लाल व पुरोहित रामचंद्र सिंह, सैनिक-राहुल, प्रयाग, रोहित व योगेंद्र।
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चरणदास की इसी कहानी का जश्न-ए-विरासत नाट्य महोत्सव के पहली शाम को मंचन किया गया। गढ़वाल विश्वविद्यालय के स्वामी प्रेक्षागृह में नया थियेटर मध्य प्रदेश के कलाकारों ने लेखक, कवि और थियेटर निर्देशक हबीब तनवीर की रचना ‘चरणदास चोर’ को शानदार प्रस्तुतीकरण किया।
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नाटक की शुरुआत होती है छत्तीसगढ़ के चरणदास चोर के पुलिस से बचने के लिए एक साधू के यहां शरण लेने से। चरणदास साधू को गुरु बना लेता है। साधू अपने शिष्यों को नैतिकता व ईमानदारी का पाठ पढ़ाते हैं और बुरी आदतें त्यागने का संकल्प लेने को कहते हैं।
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चरणदास भी गुरु के सामने शपथ लेता है कि वह कभी झूठ नहीं बोलेगा, सोने के बर्तन में खाना नहीं खाएगा और कभी शादी नहीं करेगा। गुरु उससे चोरी छोड़ने के लिए कहते हैं तो वह यह वचन नहीं देता। वह चोरी करता है लेकिन सच बोलता है। इससे उसकी ख्याति लगातार बढ़ती गई। एक दिन वह राजमहल का खजाना चुराने पहुंच गया तो उसकी सच्चाई से प्रभावित रानी उसके सामने शादी का प्रस्ताव रख देती है, लेकिन चरणदास प्रस्ताव को ठुकरा देता है। जिस पर उसको मौत की सजा दे दी जाती है। राम चंद्र सिंह के निर्देशन में कलाकारों ने जबरदस्त अभिनय से दर्शकों को बांधे रखा। हालांकि संवादों में छत्तीसगढ़ की स्थानीय बोली का पुट होने पर दर्शकों को समझने में कठिनाई हुई, लेकिन कलाकारों के अभिनय और कहानी ने इसको भारी नहीं पड़ने दिया।
अलग छवि बना गया चरणदास
चरणदास की कहानी चोरों के बारे में व्याप्त अवधारणा को झुठलाती है। अमूमन एक चोर को झूठा, एहसानफरामोश, निर्दयी, संवेदनहीन और आवारा किस्म का इंसान माना जाता है, लेकिन चरणदास चोर ठीक इसके विपरीत होता है।
नाटक के मुख्य संवाद
सारी दुनियां मुझे चरण दास चोर के नाम से जानती है
रानी तुम भूल गई मैने सच बोलने का प्रण लिया है।
मरुं या बचूं अपने गुरू के प्रण को कभी नहीं छोड़ूंगा।
नाटक के कलाकार
चरनदास चोर- ओंकार दास मानिक पूरी, गुरु-मनहरण गंधर्व, मंत्री-पुजारी रुपेश तिवारी, जुआरी- रोहित वैष्णव, गंजेड़ी-गणेश गंधर्व, रानी-पारूल सिंह, मुनीम-मन्ना लाल गंधर्व, दासी-संगीता सिन्हा, पुलिस-धन्नु लाल व पुरोहित रामचंद्र सिंह, सैनिक-राहुल, प्रयाग, रोहित व योगेंद्र।