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कभी फिगर तो कभी सोशल लाइफ के नाम पर बिकती है कोख

Mon, 12 Sep 2016 04:39 PM IST
अभिषेक यादव/अमरउजाला, लखनऊ
अभिषेक यादव/अमरउजाला, लखनऊ Updated Mon, 12 Sep 2016 04:39 PM IST
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government will stop surrogacy in india
गर्भवती महिला - फोटो : demo pic

सरकार कोख के कारोबार पर रोक लगाने जा रही है। पर, राजधानी की बात करें तो 70 से ज्यादा महिलाएं हर साल अपनी कोख बेचती हैं। सूत्रों के मुताबिक ये वे महिलाएं हैं जिनका बच्चा चाह रहे दंपती से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं होता। 

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किराए पर कोख का इंतजाम एजेंसियां कराती हैं। ये एजेंसियां 15-18 लाख रुपये हर केस पर लेती हैं। जबकि बच्चे को जन्म देने वाली महिला के हिस्से में सिर्फ 5 से 8 लाख रुपये जाते हैं। 
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 केंद्र सरकार नए सरोगेसी (नियमन) बिल 2016 में इस बात का इंतजाम कर रही है कि महिला की कोख के व्यावसायिक इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक लगे। इसकी कितनी जरूरत है इस बात को समझने के लिए इस कारोबार के अर्थतंत्र और कैसे यह धंधा चल रहा है इसको समझना होगा। 
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हर महीने छह से आठ सरोगेट मदर से ले रहे बच्चे जन्म, तीन चार बड़े केंद्र सरोगेसी के काम में शामिल हैं। 90 प्रतिशत मामलों में सरोगेट मदर को कोख का किराया दिया जाता है। 

पूरी प्रक्रिया मं 20 लाख रुपये तक खर्च, असली फायदा डॉक्टरों व दलाली कर रही एजेंसियों को। पांच से आठ लाख रुपये ही मिलते हैं महिला को।

डॉक्टरों के मुताबिक भले ही मेडिकल साइंस कहे क‌ि छह  महीने तक शिशु को मां का दूध और निकटता की जरूरत होती है लेकिन सरोगेट मदर से जन्मे बच्चे को मां का दूध कभी नसीब नहीं होता। पैदा होते ही बच्चे को पैसा दे रहे दंपति ले जाते हैं।

गरीब महिलाओं के शोषण का जरिया मात्र                 

government will stop surrogacy in india
नवजात ‌श‌िशु - फोटो : demo pic

जन्म देने वाली मां को अगले दो महीने चिकित्सकीय मदद जरूर दी जाती है, लेकिन भावनात्मक रूप से उसके लिए भी यह मुश्किल समय होता है।

लखनऊ में एक प्रमुख सरोगेसी सेंटर की संचालिका डॉ सुनीता चंद्रा बताती है कि वे हर महीने पांच या छह सरोगेसी के केसेज में डिलीवरी करवा रही हैं। 

हालांकि वे साफ करती है कि अपने सेंटर पर वे इसके लिए विदेशी दंपत्तियों या संभव होते हुए भी खुद बच्चा न पैदा कर सरोगेट मदर की मदद लेने वालों को सेवाएं नहीं देतीं। 

लेकिन वे मानती है कि अगर जरूरतमंद दंपति बच्चे के लिए सरोगेट मदर की मदद चाहें तो उन्हें इससे रोका नहीं जाना चाहिए। कानून बेशक कड़े हो और सरोगेसी के जरिए न महिलाओं का शोषण हो न उन्हें इसका व्यावसायिक उपयोग करने दिया जाए। 

लेकिन जो महिलाएं अपनी इच्छा से सरोगेट मदद बनने को राजी है, उन्हें एक दफा के लिए इसकी अनुमति मिलना चाहिए।डॉ चन्द्रा स्वीकारती हैं कि उनेक पास कई दफा अमीर घरों से ऐसे मामले भी आते हैं जिनमें महिला अपने फिगर को लेकर बच्चे पैदा नहीं करना चाहतीं।

कुछ का तो यह भी तर्क होता  है कि अपनी लाइफ स्टाइल की वजह से उन्हें नौ महीने तक इस स्ट्रेस से गुजरना ठीक नहीं लगता। डॉ चन्द्रा कहती है कि ऐसे मामलों पर रोक के लिए सख्त बिल लाना ही समाज के लिए हितकर है।    
 
 दूसरी ओर कृत्रिम गर्भाधान पर ही काम कर रही डॉ स्मृति भाटिया अलग राय रखती हैं। वे सवाल उठाती हैं कि सरोगेट मदर गरीब महिलाएं ही क्यों बनती हैं? किराए पर कोख लेने वाले दंपति उच्च वर्ग से ही क्यों होते हैं? इनका जवाब खुद सरोगेसी करवा रहे डॉक्टरों को देना चाहिए। 

जिस दंपति के लिए बच्चा पैदा करना किसी भी स्थिति में संभव नहीं है, वे बच्चा गोद भी तो ले सकते हैं। जब सरोगेसी करवाना चाह रहे अधिकतर दंपती आर्थिक रूप से ऊंचे तबके से आते हैं तो समझा जा सकता है कि यह भी गरीब महिलाओं के शोषण का ही एक जरिया मात्र है।    
            
                        

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