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Chandigarh News: हजार बार ये कहते हो जले हो तुम, मगर बताते नहीं हो कहां जले तो तुम... पर बजी तालियां

Sun, 29 Jun 2025 01:35 AM IST
Chandigarh Bureau चंडीगढ़ ब्यूरो
Updated Sun, 29 Jun 2025 01:35 AM IST
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You say a thousand times that you are jealous, but you do not tell where you are jealous... but there was applause
चंडीगढ़। सेक्टर-17 के टीएस सेंट्रल स्टेट लाइब्रेरी में शनिवार को शायर अशोक नादिर की लिखी किताब तेरी आखें का विमोचन हुआ। पुस्तक विमोचन के पर इस पर चर्चा और काव्य पाठ हुआ। यह आयोजन भंडारी अदबी ट्रस्ट की ओर से और टीएस सेंट्रल स्टेट लाइब्रेरी के सहयोग से हुआ।
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इस मौके पर वरिष्ठ लेखक और साहित्यकार विजय कुमार अब्रोल जाहिद मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित हुए। सम्मानित अतिथियों में लेखक कृष्ण कुमार तूर, बीडी कालिया हमदम, डॉ. निजा सिंह, सिरी राम अर्श रहे। मंच का संचालन डॉ. जतिंदर परवाज ने किया।
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विजय कुमार अब्रोल ने पुस्तक पर कहा कि इस किताब में 1500 शेर हैं। सभी शेर आंख पर है। इतने शेर सिर्फ आंख पर लिखना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन से कम नहीं है। अभी तक एक हजार शेरों तक सुना था पर अशोक नादिर इससे भी आगे निकल गए। इसके लिए बधाई के पात्र हैं।
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बीडी कालिया हमदम ने कहा कि 1500 अशआर का संग्रह और वह भी एक बहर में और एक रदीफ आंखें के कैनवस पर न कभी देखा और न कभी सुना है। और विश्वास कर रहे हैं क्योंकि ये किताब सामने पड़ा है। नादिर का काम सराहनीय है।
साहित्यकार प्रेम विज ने कहा कि अशोक नादिर की यह पुस्तक समकालीन शायरी में एक उत्कृष्ट रचना मानी जाएगी। यह शायरी प्रेमियों के लिए एक खजाना है।
काव्य गोष्ठी में इन्होंने पढ़ी अपनी रचनाएं...
शम्स तबरेजी ने हजार बार ये कहते हो जले हो तुम, मगर बताते नहीं हो कहां जले तो तुम पेश कर वाहवाही के साथ तालियां बटोरी। जाहिद परवेज ने मुझे भी नींद ना आए, उसे भी चैन ना हो, हमारे बीच भला इतना प्यार थोड़ी है पेश किया।
प्रेम विज ने मैने राज बहुत छुपाए थे, मगर आखों ने सब बताए थे पेश किया। चमन शर्मा चमन ने हम सफर में हैं, हमसफर के बगैर, आंख जैसे कोई नजर के बगैर पेश किया।

कृष्णा गोयल ने दोस्तों कुछ मुस्करा कर देखिए, गीत गजलें गुनगुनाकर देखिए पेश किया। कृष्ण कुमार तूर ने नतीजा सिफर निकला गुफ्तगू का, न मैं माना न मेरे यार माने पेश कर तालियां बटोरी। बीडी कालिया हमदम ने हम ख्यालों के गुलशन सजाते रहे वो बिखरते रहे खुशबुओं की तरह पेर कर वाहवाही के साथ तालियां बटोरी। डॉ तिलक सेठी ने और क्या देती भला बेटी विदाई के समय छोड़ आई है नमी बाबुल की वो दहलीज पर पेश कर वाहवाही लूटी।
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