विश्व रेडियो दिवस: गुस्से में खरीदा था रेडियो, अब वही बना चंडीगढ़ के बूट पालिश करने वाले की पहचान
सेक्टर-29 स्थित ऋषि आयुर्वेद के मालिक शैलेंद्र ऋषि के पास सात रेडियो हैं। चार रेडियो तो अब भी चलते हैं। उनके पास फिलिप्स का 60 वर्ष पुराना एक रेडियो है। उन्होंने बताया कि रेडियो की वास्तविक आवाज बहुत अच्छी है।
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चंडीगढ़ सेक्टर-17 स्थित इंडियन कॉफी हाउस के बाहर बूट पॉलिश करने वाले बाबूराम हमेशा अपने साथ रेडियो रखते हैं और गाने सुनते रहते हैं। उन्होंने बताया कि वह वर्ष 1972 से चंडीगढ़ में बूट पॉलिश का काम कर रहे हैं। रेडियो उनकी लाइफलाइन है।
उन्होंने बताया कि कुछ साल पहले उनके साथ वाली बूट पॉलिश की दुकान पर रेडियो में एक बहुत अच्छा गाना चल रहा था। उन्होंने आवाज बढ़ाने के लिए कहा तो दुकानदार ने मना कर दिया। गुस्से में वह नया रेडियो खरीद लाए। अब वह हमेशा इस रेडियो को अपने साथ रखते हैं। बाबूराम ने बताया कि अब यही रेडियो उनकी पहचान बन गई है। वह रेडियो वाले बूट पॉलिश की दुकान से पहचाने जाते हैं। बताया कि उन्हें बचपन से ही रेडियो का शौक था। गाने सुनना बेहद पसंद था लेकिन अब रेडियो के सेल बहुत महंगे हो गए हैं। कोविड की वजह से काम कम है और आमदनी पर काफी फर्क पड़ गया है। बाबूराम ने बताया कि वह सेक्टर-38 में रहते हैं और परिवार में एक बेटा और दो बेटियां हैं। कहा कि वे जब तक जीवित हैं, रेडियो का साथ नहीं छूटेगा।
60 साल पुराना रेडियो
सेक्टर-29 स्थित ऋषि आयुर्वेद के मालिक शैलेंद्र ऋषि के पास सात रेडियो हैं। चार रेडियो तो अब भी चलते हैं। उनके पास फिलिप्स का 60 वर्ष पुराना एक रेडियो है। उन्होंने बताया कि रेडियो की वास्तविक आवाज बहुत अच्छी है। जब वे 17 वर्ष के थे, तब से रेडियो का श्रोता रहे हैं। उनके पास फिलिप्स, नेशनल पैनासोनिक और स्थानीय निर्मित रेडियो भी हैं। फिलिप्स रेडियो शॉर्ट और मीडियम वेव का है। अब वह नहीं चलता, लेकिन उसे रिकार्ड प्लेयर के साथ जोड़ दिया है। एफएम भी सुनते हैं। उन्होंने बताया कि रेडियो का महत्व कभी खत्म नहीं होगा।
किस्तों पर लिया था 80 रुपये का रेडियो
वरिष्ठ नागरिक आईपी पुरी ने बताया कि वर्ष 1962 में वह लाइफ इंश्योरेंस कारपोरेशन (एलआईसी) में नौकरी कर रहे थे। उस समय उनकी तनख्वाह 145 रुपये थी। तब उन्होंने 80 रुपये का रेडियो किस्तों पर खरीदा था। हर महीने की पांच रुपये की किस्त जाती थी। नौकरी के बाद शाम को रेडियो पर गाने सुनकर थकान मिटाता था।
बिनाका गीतमाला का तो हर कोई था दीवाना
निजी स्कूल से वाइस प्रिंसिपल के पद से सेवानिवृत्त रेणु अब्बी ने बीते दिनों को याद करते हुए बताया कि 35 वर्ष पहले उन्होंने रेडियो खरीदा था। तक रेडियो रखना स्टेटस सिंबल माना जाता था। रेडियो पर अमीन सयानी का मशहूर कार्यक्रम बिनाका गीतमाला का तो परिवार का हर सदस्य दीवाना था। वहीं, फौजी भाईयों की पसंद नाम से भी एक कार्यक्रम आता था, जिसमें फौजियों की फरमाइश पर गाने सुनाए जाते थे। यह कार्यक्रम भी बेहद लोकप्रिय था। परिवार वाले इसे समय निकालकर सुनते थे।
हवामहल कार्यक्रम सुनकर मिटाता था थकान
फोरेंसिक लैबोरेटरी से सहायक डायरेक्टर के पद से सेवानिवृत्त डॉ. दविंदर पाल सिंह सहगल ने बताया कि वर्ष 1977-78 में जब वह बीएससी के छात्र थे तब हवामहल नाम से एक प्रोग्राम रेडियो पर आता था, जिसमें कई रोचक कहानियां होती थीं। पढ़ाई के बाद हवामहल कार्यक्रम सुनकर वह अपनी थकान को कम करते थे।