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14 साल से है एचआईवी पॉजिटिव, फिर भी बिंदास
आशीष वर्मा
Updated Sat, 30 Nov 2013 10:24 AM IST
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आमतौर पर एचआईवी पॉजिटिव का मतलब जीवन का अंत मान लिया जाता है।
विशेषज्ञ भी पहले मानते थे कि ज्यादा से ज्यादा पीड़ित दस साल तक जी सकता है, लेकिन इस मिथ्य को चंडीगढ़ के एक पॉजिटिव ने इसे पूरी तरह से खारिज कर दिया। साल 2000 में पता चला कि वह पॉजिटिव है।
कुछ ही दिन में 14 साल होने को है, लेकिन पीड़ित सामान्य जीवन व्यतीत कर रहा है। वे दूसरा काम करना भले ही भूल जाएं, लेकिन हेल्दी डाइट और मेडिसिन लेना नहीं भूलते। यही रामबाण उन्हें जीने की संजीवनी दे रहा।
वे इतने आत्मविश्वास से भरे हैं कि खुद को एचआईवी पॉजिटिव बताने में न तो उन्हें शर्म और न ही किसी प्रकार की झिझक। वे कहते हैं कि जीने का सिर्फ जज्बा था।
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मन में एक बात ठान ली थी कि एचआईवी वायरस को कभी हावी नहीं होने देंगे। शरीर के अंदर किसी भी तरह का इंफेक्शन न हो, इसके लिए वे पूरी तरह सतर्क और चौकस रहते हैं।
14 साल पहले जीना छोड़ दिया था
पीड़ित के मुताबिक उनके भाई की साल 2000 में मौत हो गई थी। भाई के गम में वे हरिद्वार पहुंच गए। वहां पर उन्हें डायरिया हो गया। पेट में सूजन आ गई। जांच में एचआईवी पाजिटिव का पता चला।
यहां से उन्हें दिल्ली के एम्स में भेज दिया गया। वे तीन दिन तक अस्पताल में पड़े रहे। उनका किसी ने इलाज नहीं किया। डाक्टर उनसे दूर भागते रहे। हर किसी ने जानलेवा बीमारी बताई।
इससे वे पूरी तरह से डर गए और जीने की आस छोड़ दी। अपनी जीवनलीला समाप्त करने से पहले वे अमरनाथ की यात्रा पर जाना चाहते थे। वे यात्रा के लिए रवाना हो गए, लेकिन किस्मत ने उन्हें अमृतसर पहुंचा दिया।
वहां पर उनकी तबियत खराब हो गई तो लोगों ने उन्हें गुरु नानक हॉस्पिटल में एडमिट करा दिया। डॉक्टरों ने फिर से उन्हें फिर एम्स में रेफर कर दिया, लेकिन वे चंडीगढ़ पीजीआई आ गए।
हौसला हो तो पूरी जिंदगी जी सकता है मरीज
एड्स कंट्रोल सोसाइटी के डिप्टी डायरेक्टर संदीप मित्तल ने बताया कि पहले यह धारणा थी कि एड्स का मतलब मौत। सच्चाई यह है कि एड्स से कोई नहीं मरता। यदि कोई व्यक्ति मरता है तो वह टीबी या फिर किसी इंफेक्शन से।
चंडीगढ़ के इस व्यक्ति के बारे में अच्छी बात यह है कि वह भूल चुके है कि उसे एड्स है। उसे इस बात की फिक्र नहीं है कि सामने वाला उसके बारे में क्या सोचेगा? यही सकारात्मक रवैया उसे जिंदगी जीने की दवा दे रहा।
(इस खबर पर प्रतिक्रिया देने के लिए नीचे के बॉक्स में कमेट करें, शेयर करने के लिए फेसबुक शेयर बटन पर क्लिक करें)
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विशेषज्ञ भी पहले मानते थे कि ज्यादा से ज्यादा पीड़ित दस साल तक जी सकता है, लेकिन इस मिथ्य को चंडीगढ़ के एक पॉजिटिव ने इसे पूरी तरह से खारिज कर दिया। साल 2000 में पता चला कि वह पॉजिटिव है।
कुछ ही दिन में 14 साल होने को है, लेकिन पीड़ित सामान्य जीवन व्यतीत कर रहा है। वे दूसरा काम करना भले ही भूल जाएं, लेकिन हेल्दी डाइट और मेडिसिन लेना नहीं भूलते। यही रामबाण उन्हें जीने की संजीवनी दे रहा।
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वे इतने आत्मविश्वास से भरे हैं कि खुद को एचआईवी पॉजिटिव बताने में न तो उन्हें शर्म और न ही किसी प्रकार की झिझक। वे कहते हैं कि जीने का सिर्फ जज्बा था।
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मन में एक बात ठान ली थी कि एचआईवी वायरस को कभी हावी नहीं होने देंगे। शरीर के अंदर किसी भी तरह का इंफेक्शन न हो, इसके लिए वे पूरी तरह सतर्क और चौकस रहते हैं।
14 साल पहले जीना छोड़ दिया था
पीड़ित के मुताबिक उनके भाई की साल 2000 में मौत हो गई थी। भाई के गम में वे हरिद्वार पहुंच गए। वहां पर उन्हें डायरिया हो गया। पेट में सूजन आ गई। जांच में एचआईवी पाजिटिव का पता चला।
यहां से उन्हें दिल्ली के एम्स में भेज दिया गया। वे तीन दिन तक अस्पताल में पड़े रहे। उनका किसी ने इलाज नहीं किया। डाक्टर उनसे दूर भागते रहे। हर किसी ने जानलेवा बीमारी बताई।
इससे वे पूरी तरह से डर गए और जीने की आस छोड़ दी। अपनी जीवनलीला समाप्त करने से पहले वे अमरनाथ की यात्रा पर जाना चाहते थे। वे यात्रा के लिए रवाना हो गए, लेकिन किस्मत ने उन्हें अमृतसर पहुंचा दिया।
वहां पर उनकी तबियत खराब हो गई तो लोगों ने उन्हें गुरु नानक हॉस्पिटल में एडमिट करा दिया। डॉक्टरों ने फिर से उन्हें फिर एम्स में रेफर कर दिया, लेकिन वे चंडीगढ़ पीजीआई आ गए।
हौसला हो तो पूरी जिंदगी जी सकता है मरीज
एड्स कंट्रोल सोसाइटी के डिप्टी डायरेक्टर संदीप मित्तल ने बताया कि पहले यह धारणा थी कि एड्स का मतलब मौत। सच्चाई यह है कि एड्स से कोई नहीं मरता। यदि कोई व्यक्ति मरता है तो वह टीबी या फिर किसी इंफेक्शन से।
चंडीगढ़ के इस व्यक्ति के बारे में अच्छी बात यह है कि वह भूल चुके है कि उसे एड्स है। उसे इस बात की फिक्र नहीं है कि सामने वाला उसके बारे में क्या सोचेगा? यही सकारात्मक रवैया उसे जिंदगी जीने की दवा दे रहा।
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