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Chandigarh News: आत्महत्या की कोशिश में खुद को गोली मारने वाले व्यक्ति पर दर्ज एफआईआर हाईकोर्ट ने की रद्द

Wed, 07 Oct 2026 01:43 AM IST
Chandigarh Bureau चंडीगढ़ ब्यूरो
Updated Wed, 07 Oct 2026 01:43 AM IST
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High Court quashes FIR against man who shot himself in a suicide attempt.
मानसिक स्वास्थ्य कानून में गंभीर तनाव की वैधानिक धारणा को अभियोजन नहीं कर सका खारिज
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लाइसेंसी रिवॉल्वर के इस्तेमाल मात्र से शस्त्र अधिनियम की धाराएं भी नहीं बनतीं
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने आत्महत्या का प्रयास करने के मामले में एक व्यक्ति के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी, आरोपपत्र और उससे जुड़ी पूरी आपराधिक कार्रवाई रद्द कर दी है। अदालत ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 की धारा 115 के तहत आत्महत्या का प्रयास करने वाले व्यक्ति के गंभीर तनाव में होने की वैधानिक धारणा है। मौजूदा मामले में अभियोजन इस धारणा को खारिज करने के लिए कोई सामग्री सामने नहीं ला सका। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति द्वारा लाइसेंसी हथियार का इस्तेमाल किए जाने मात्र से शस्त्र अधिनियम की धाराएं नहीं लगाई जा सकतीं जब तक कानून के किसी विशेष प्रावधान या लाइसेंस की शर्त के उल्लंघन को स्पष्ट रूप से नहीं बताया गया हो।

मामला पंजाब के बठिंडा जिले के तलवंडी साबो थाने का है। मार्च 2024 में पुलिस ने एक व्यक्ति के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 309 और 109 तथा शस्त्र अधिनियम की धाराओं 27 और 30 के तहत प्राथमिकी दर्ज की थी। आरोप था कि घरेलू परिस्थितियों के कारण तनाव में आए व्यक्ति ने अपनी जान लेने का प्रयास किया और इसके लिए सह-आरोपी के नाम पर लाइसेंसी रिवॉल्वर का इस्तेमाल किया। इस दौरान उसे गोली लगने से चोट आई थी। जांच पूरी होने के बाद सितंबर 2024 में पुलिस ने आरोपपत्र भी दाखिल कर दिया था। मामले में आरोपी ने हाईकोर्ट का रुख करते हुए कहा कि प्राथमिकी में ही उसके गंभीर मानसिक तनाव में होने की बात सामने आती है। ऐसे में मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम की धारा 115 के तहत उसे संरक्षण प्राप्त है। उसके अधिवक्ता ने यह भी दलील दी कि शस्त्र अधिनियम के तहत लगाए गए आरोपों में अपराध के लिए जरूरी वैधानिक तत्वों का उल्लेख नहीं है।
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जस्टिस नीरजा के कलसन ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम की धारा 115(1) आत्महत्या का प्रयास करने वाले व्यक्ति के गंभीर तनाव में होने की वैधानिक धारणा स्थापित करती है। जब तक इसके विपरीत साबित न हो, ऐसे व्यक्ति को भारतीय दंड संहिता की धारा 309 के तहत मुकदमा चलाकर दंडित नहीं किया जा सकता। अदालत ने धारा 120 का भी उल्लेख किया, जिसके तहत इस अधिनियम के प्रावधानों को असंगत दूसरे कानूनों पर प्रभावी माना गया है। हाईकोर्ट ने कहा कि कानून की सोच अब केवल दंड देने तक सीमित नहीं है, बल्कि आत्महत्या का प्रयास करने वाले व्यक्ति के प्रति उपचार, देखभाल और पुनर्वास की दिशा में है। अदालत ने पाया कि इस मामले में गंभीर तनाव की वैधानिक धारणा को खारिज करने के लिए कोई ठोस सामग्री रिकॉर्ड पर नहीं है। बल्कि अभियोजन का अपना मामला ही था कि व्यक्ति ने स्वयं अपनी जान लेने का प्रयास किया था और उसके पिता ने भी इसे व्यक्तिगत तथा पारिवारिक परिस्थितियों से पैदा हुए तनाव से जोड़ा था। इसलिए धारा 309 के तहत आपराधिक कार्यवाही जारी रखना उचित नहीं था।
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