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सबूत बंद होने के बाद बचाव मजबूत करने के लिए गवाह को दोबारा नहीं बुला सकते: हाईकोर्ट

Wed, 07 Oct 2026 01:44 AM IST
Chandigarh Bureau चंडीगढ़ ब्यूरो
Updated Wed, 07 Oct 2026 01:44 AM IST
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Witness cannot be recalled to strengthen the defence after the conclusion of evidence: High Court
धारा 348 का इस्तेमाल न्यायपूर्ण निर्णय के लिए हो, बचाव की कमियां दूर करने के लिए नहीं
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चेक बाउंस मामले में आरोपी की याचिका को हाईकोर्ट ने किया खारिज
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 348 के तहत गवाह को दोबारा बुलाने या अतिरिक्त साक्ष्य मंगाने की शक्ति व्यापक जरूर है लेकिन इसका इस्तेमाल सबूत बंद होने के बाद बचाव पक्ष की कमियां दूर करने, मामले को नए सिरे से तैयार करने या बचाव को मजबूत करने के लिए नहीं किया जा सकता। जस्टिस सुमित गोयल ने चेक बाउंस मामले में आरोपी अवतार सिंह की याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।

मालेरकोटला की शिकायतकर्ता फर्म एम/एस देसराज एंड कंपनी ने आरोप लगाया था कि आरोपी ने दिसंबर 2019 से जून 2020 के बीच तीन किस्तों में 10.30 लाख रुपये उधार लिए थे। इसके बदले 27 अगस्त 2021 का चेक जारी किया जो खाते में पर्याप्त राशि न होने के कारण बाउंस हो गया। आरोपी ने ऋण लेने से इन्कार करते हुए कहा कि चेक सुरक्षा के तौर पर दिया गया था। उसका दावा था कि रकम वास्तव में वर्ष 2018-19 और 2019-20 में बेची गई फसल के भुगतान से संबंधित थी। उसने अपने बचाव में जे-फॉर्म, नीलामी रजिस्टर और मंडी से संबंधित दस्तावेजों का सहारा लिया। आरोपी ने शिकायतकर्ता के प्रतिनिधि से इन लेनदेन को लेकर विस्तृत जिरह की थी। इसके अलावा मंडी समिति के एक अधिकारी को बचाव पक्ष के गवाह के तौर पर पेश किया गया, जिसने नीलामी रजिस्टर और संबंधित रिकॉर्ड प्रस्तुत किए। 18 मई 2026 को एक अन्य बचाव गवाह अदालत में आया लेकिन उसने बयान देने से इन्कार कर दिया। इसके बाद अदालत ने बचाव पक्ष के साक्ष्य बंद कर दिए और मामले को बहस के लिए तय कर दिया। साक्ष्य बंद होने के बाद आरोपी ने बचाव पक्ष के साक्ष्य दोबारा खोलने, मंडी समिति के गवाह को फिर बुलाने, जे-फॉर्म और एक अन्य फर्म की खाता पुस्तिकाएं मंगाने तथा लिखावट विशेषज्ञ से जांच कराने की मांग की। मालेरकोटला की अदालत ने 8 सितंबर 2026 को यह आवेदन खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट ने पाया कि फसल बिक्री और जे-फॉर्म से संबंधित बचाव पहले ही शिकायतकर्ता के गवाह के सामने रखा जा चुका था और इस मुद्दे पर विस्तृत जिरह भी हुई थी। मंडी समिति के अधिकारी को भी बचाव पक्ष ने गवाह बनाया था। ऐसे में यह नहीं कहा जा सकता कि आरोपी को अपना बचाव रखने का अवसर नहीं मिला।
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