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मिसाल बनी दिव्यांग महिलाएं: बबिता, प्रवीण और मोनिका
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Tue, 08 Mar 2016 10:56 AM IST
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मिसाल बनी दिव्यांग महिलाएं: बबिता, प्रवीण और मोनिका
- फोटो : file
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पूरी दुनिया आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मना रही है। ‘महिला’ शब्द में ही इसकी परिभाषा छिपी है। इसी में इसके भाव और अर्थ हैं, जिन्हें समाज में मानवता, महानता, ममता, मृदुलता, मातृत्व और समर्पण जैसे नामों से जाना जाता है।
नारी चाहे समाज के एक निचले तबके से जुड़ी हो या प्रतिष्ठित वर्ग से, उसका शोषण हर जगह देखने को मिल ही जाता है। कई बार तो पढ़ी-लिखी और किसी बड़े ओहदे पर होने के बावजूद महिला खुद अपने घर में ही परिजनों के शोषण की शिकार हो जाती है। समाज, परिवार, आफिस या किसी वर्ग विशेष से लड़कर सामने आने वाली ही महिलाशक्ति समाज के लिए मिसाल बनती है।
लोगों के लिए मिसाल हैं बबिता
मूलरूप से उत्तराखंड निवासी बबिता बिष्ट जन्म से चंडीगढ़ में हैं। जन्म से दिव्यांग बबिता की परवरिश और पढ़ाई-लिखाई यहीं से हुई। दिव्यांग होने को उन्होंने कभी अपनी कमजोरी नहीं बनाया, बल्कि वह इससे और मजबूती से लड़ीं। जीसीजी-11 से कॉलेज की पढ़ाई करने के बाद उन्होंने लॉ करने की ठानी। बबिता के अनुसार दिव्यांग होने के कारण कई बार लोगों की सहानुभूति मिली, लेकिन जब आपका लक्ष्य सामने हो तो किसी की सहानुभूति की जरूरत नहीं पड़ती। पांच भाई-बहनों में सबसे बड़ी बबिता के पिता सरकारी बैंक में कार्यरत थे।
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हालांकि परिवार में आर्थिक रूप से कभी कोई कमी नहीं थी, लेकिन पढ़ाई के साथ-साथ वह खुद अपने खर्चों के लिए पैसे जुटाती थीं। उन्होंने सिलाई-कढ़ाई सीख इसे अपनी कमाई का जरिया बनाया और अपनी लॉ की फीस जमा की।
वर्ष 2000 में पंजाब यूनिवर्सिटी से लॉ करने के बाद वकालत की प्रैक्टिस शुरू की। बबिता के अनुसार दिव्यांग होने के कारण बचपन से कई बार सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ा, लेकिन जिंदगी में कभी लक्ष्य से नहीं डगमगाई। आज बबिता सेक्टर-44 में परिवार के साथ रह रहीं हैं और जिला अदालत में वकालत कर रही हैं। अपने संघर्ष के कारण ही उन्होंने जिंदगी में एक अलग मुकाम हासिल किया है। उनका कहना है कि नारी किसी भी रूप में हो, उसे कभी साहस नहीं छोड़ना चाहिए, बस संघर्ष करते रहना चाहिए जब तक कि उसे मुकाम हासिल नहीं हो जाता।
हादसे के बाद हुईं और मजबूत
माता-पिता की इकलौती बेटी होने के कारण बचपन से प्रवीण मिली को बहुत लाड़ प्यार मिला। हर वह खुशी जो एक बच्चे को अपने अभिभावकों से मिलती है वह मिली। अच्छी स्कूली और कॉलेज शिक्षा मिली और उसके बाद पंजाब यूनिवर्सिटी से वकालत भी की। इसके बाद आगे भी पढ़ाई का इरादा था, लेकिन शादी हो गई और शुरुआत में हर लड़की की तरह घर गृहस्थी में व्यस्त हो गईं। लेकिन शादी के कुछ समय बाद ही एक हादसा हुआ और प्रवीण की जिंदगी ही बदल गई। हादसे के कारण वह दिव्यांग हो गईं।
इसके बावजूद प्रवीण ने हौसला नहीं खोया और वकालत शुरू करने का फैसला लिया। विपरीत परिस्थितियों के बावजूद प्रवीण ने इसे चुनौती की तरह लिया और इसमें सफल भी हुईं। प्रवीण के अनुसार हादसे के बाद लोगों का उनके प्रति नजरिया ही बदल गया। कोई बेचारा समझता तो कोई सहानुभूति देता, लेकिन हौसला बढ़ाने वाला कोई नहीं था।
ऐसे में उनके पति, ससुराल पक्ष और अभिभावकों ने उनका हर कदम पर साथ दिया और आज वह जिला अदालत में बतौर वकील काम कर रही हैं और कोर्ट में ओथ कमिश्नर भी हैं। प्रवीण के अनुसार किसी के भी बुरे वक्त में परिवार को सामाजिक दबाव में नहीं आना चाहिए। बल्कि उन्हें आगे आकर और खुलकर सपोर्ट करना चाहिए।
खुद को साबित कर पाया मुकाम
जन्म के छह माह बाद से दिव्यांग होने के बावजूद मोनिका गार्गी अपने परिवार में अकेली एडवोकेट हैं। यह मुकाम हासिल करने के लिए उन्हें जिंदगी के किन-किन रास्तों से होकर गुजराना पड़ा, यह वही जानती हैं। मानसा की एक आर्थिक रूप से संपन्न बिजनेसमैन फैमिली से होने के बावजूद उन्हें बचपन से ही स्कूल, कॉलोनी, दोस्तों, रिश्तेदारों में एक अलग ही नजरिये से देखा गया। इसका अहसास उन्हें भी था, लेकिन उनका मकसद लोगों को कुछ कर दिखाने का था, ताकि उनकी सोच दिव्यांग लोगों के प्रति बदल सके और उनका समाज के प्रति नजरिया भी। ग्रेजुएशन कंपलीट करने के बाद मोनिका ने वकालत का पेशा चुनने की सोची। इसके लिए उन्होंने कड़ी मेहनत की और पढ़ाई पूरी कर प्रैक्टिस शुरू की।
इसी दौरान शादी को लेकर सामाजिक और पारिवारिक दबाव पड़ने लगा। दिव्यांग होने के कारण शादी में भी रोड़ा आने लगा। कई बार की ना-नुकर के बाद 1998 में शादी हुई। इसके बाद से ही ससुराल पक्ष की ओर से पेशे और गृहस्थी को लेकर परेशानी होने लगी। शादी के एक साल बाद उनके घर एक नन्हीं परी ने जन्म लिया। इससे कुछ समय के लिए मोनिका ने वकालत से ब्रेक लिया और बेटी की परवरिश में लग गईं।
वर्ष 2000 में चंडीगढ़ आकर उन्होंने वकालत शुरू कर दी। इसमें उनके पति ने उनका पूरा साथ दिया। उन्होंने कभी वकालत और बेटी की परवरिश में दिव्यांगता को आड़े नहीं आने दिया। इसके बावजूद उनकी जिंदगी में कई उतार चढ़ाव आए, लेकिन वह कभी नहीं घबराईं।
आज मोनिका चंडीगढ़ जिला अदालत में बतौर एडवोकेट काम कर रही हैं और इसी पेशे की बदौलत उन्होंने जीरकपुर में अपना मकान बनाया। मोनिका का मानना है कि अभिभावकों को दिव्यांग बच्चों को सपोर्ट करना चाहिए, न कि यह सोचकर उन्हें घर में बैठा देना चाहिए कि समाज क्या कहेगा। उनका कहना है कि आज उनकी प्रेरणा उनकी बेटी है।
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नारी चाहे समाज के एक निचले तबके से जुड़ी हो या प्रतिष्ठित वर्ग से, उसका शोषण हर जगह देखने को मिल ही जाता है। कई बार तो पढ़ी-लिखी और किसी बड़े ओहदे पर होने के बावजूद महिला खुद अपने घर में ही परिजनों के शोषण की शिकार हो जाती है। समाज, परिवार, आफिस या किसी वर्ग विशेष से लड़कर सामने आने वाली ही महिलाशक्ति समाज के लिए मिसाल बनती है।
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लोगों के लिए मिसाल हैं बबिता
मूलरूप से उत्तराखंड निवासी बबिता बिष्ट जन्म से चंडीगढ़ में हैं। जन्म से दिव्यांग बबिता की परवरिश और पढ़ाई-लिखाई यहीं से हुई। दिव्यांग होने को उन्होंने कभी अपनी कमजोरी नहीं बनाया, बल्कि वह इससे और मजबूती से लड़ीं। जीसीजी-11 से कॉलेज की पढ़ाई करने के बाद उन्होंने लॉ करने की ठानी। बबिता के अनुसार दिव्यांग होने के कारण कई बार लोगों की सहानुभूति मिली, लेकिन जब आपका लक्ष्य सामने हो तो किसी की सहानुभूति की जरूरत नहीं पड़ती। पांच भाई-बहनों में सबसे बड़ी बबिता के पिता सरकारी बैंक में कार्यरत थे।
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हालांकि परिवार में आर्थिक रूप से कभी कोई कमी नहीं थी, लेकिन पढ़ाई के साथ-साथ वह खुद अपने खर्चों के लिए पैसे जुटाती थीं। उन्होंने सिलाई-कढ़ाई सीख इसे अपनी कमाई का जरिया बनाया और अपनी लॉ की फीस जमा की।
वर्ष 2000 में पंजाब यूनिवर्सिटी से लॉ करने के बाद वकालत की प्रैक्टिस शुरू की। बबिता के अनुसार दिव्यांग होने के कारण बचपन से कई बार सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ा, लेकिन जिंदगी में कभी लक्ष्य से नहीं डगमगाई। आज बबिता सेक्टर-44 में परिवार के साथ रह रहीं हैं और जिला अदालत में वकालत कर रही हैं। अपने संघर्ष के कारण ही उन्होंने जिंदगी में एक अलग मुकाम हासिल किया है। उनका कहना है कि नारी किसी भी रूप में हो, उसे कभी साहस नहीं छोड़ना चाहिए, बस संघर्ष करते रहना चाहिए जब तक कि उसे मुकाम हासिल नहीं हो जाता।
हादसे के बाद हुईं और मजबूत
माता-पिता की इकलौती बेटी होने के कारण बचपन से प्रवीण मिली को बहुत लाड़ प्यार मिला। हर वह खुशी जो एक बच्चे को अपने अभिभावकों से मिलती है वह मिली। अच्छी स्कूली और कॉलेज शिक्षा मिली और उसके बाद पंजाब यूनिवर्सिटी से वकालत भी की। इसके बाद आगे भी पढ़ाई का इरादा था, लेकिन शादी हो गई और शुरुआत में हर लड़की की तरह घर गृहस्थी में व्यस्त हो गईं। लेकिन शादी के कुछ समय बाद ही एक हादसा हुआ और प्रवीण की जिंदगी ही बदल गई। हादसे के कारण वह दिव्यांग हो गईं।
इसके बावजूद प्रवीण ने हौसला नहीं खोया और वकालत शुरू करने का फैसला लिया। विपरीत परिस्थितियों के बावजूद प्रवीण ने इसे चुनौती की तरह लिया और इसमें सफल भी हुईं। प्रवीण के अनुसार हादसे के बाद लोगों का उनके प्रति नजरिया ही बदल गया। कोई बेचारा समझता तो कोई सहानुभूति देता, लेकिन हौसला बढ़ाने वाला कोई नहीं था।
ऐसे में उनके पति, ससुराल पक्ष और अभिभावकों ने उनका हर कदम पर साथ दिया और आज वह जिला अदालत में बतौर वकील काम कर रही हैं और कोर्ट में ओथ कमिश्नर भी हैं। प्रवीण के अनुसार किसी के भी बुरे वक्त में परिवार को सामाजिक दबाव में नहीं आना चाहिए। बल्कि उन्हें आगे आकर और खुलकर सपोर्ट करना चाहिए।
खुद को साबित कर पाया मुकाम
जन्म के छह माह बाद से दिव्यांग होने के बावजूद मोनिका गार्गी अपने परिवार में अकेली एडवोकेट हैं। यह मुकाम हासिल करने के लिए उन्हें जिंदगी के किन-किन रास्तों से होकर गुजराना पड़ा, यह वही जानती हैं। मानसा की एक आर्थिक रूप से संपन्न बिजनेसमैन फैमिली से होने के बावजूद उन्हें बचपन से ही स्कूल, कॉलोनी, दोस्तों, रिश्तेदारों में एक अलग ही नजरिये से देखा गया। इसका अहसास उन्हें भी था, लेकिन उनका मकसद लोगों को कुछ कर दिखाने का था, ताकि उनकी सोच दिव्यांग लोगों के प्रति बदल सके और उनका समाज के प्रति नजरिया भी। ग्रेजुएशन कंपलीट करने के बाद मोनिका ने वकालत का पेशा चुनने की सोची। इसके लिए उन्होंने कड़ी मेहनत की और पढ़ाई पूरी कर प्रैक्टिस शुरू की।
इसी दौरान शादी को लेकर सामाजिक और पारिवारिक दबाव पड़ने लगा। दिव्यांग होने के कारण शादी में भी रोड़ा आने लगा। कई बार की ना-नुकर के बाद 1998 में शादी हुई। इसके बाद से ही ससुराल पक्ष की ओर से पेशे और गृहस्थी को लेकर परेशानी होने लगी। शादी के एक साल बाद उनके घर एक नन्हीं परी ने जन्म लिया। इससे कुछ समय के लिए मोनिका ने वकालत से ब्रेक लिया और बेटी की परवरिश में लग गईं।
वर्ष 2000 में चंडीगढ़ आकर उन्होंने वकालत शुरू कर दी। इसमें उनके पति ने उनका पूरा साथ दिया। उन्होंने कभी वकालत और बेटी की परवरिश में दिव्यांगता को आड़े नहीं आने दिया। इसके बावजूद उनकी जिंदगी में कई उतार चढ़ाव आए, लेकिन वह कभी नहीं घबराईं।
आज मोनिका चंडीगढ़ जिला अदालत में बतौर एडवोकेट काम कर रही हैं और इसी पेशे की बदौलत उन्होंने जीरकपुर में अपना मकान बनाया। मोनिका का मानना है कि अभिभावकों को दिव्यांग बच्चों को सपोर्ट करना चाहिए, न कि यह सोचकर उन्हें घर में बैठा देना चाहिए कि समाज क्या कहेगा। उनका कहना है कि आज उनकी प्रेरणा उनकी बेटी है।