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World Kidney Day: अपनों की जान बचाने में भी महिलाएं आगे, गुर्दा दान करने वालों में 70 प्रतिशत महिलाएं शामिल
Thu, 09 Mar 2023 01:59 PM IST
निवेदिता वर्मा
वीणा तिवारी, अमर उजाला, चंडीगढ़
वीणा तिवारी, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Thu, 09 Mar 2023 01:59 PM IST
सार
विशेषज्ञों का कहना है कि पुरुषों को सीख लेने की जरूरत है। अगर स्त्री-पुरुष दोनों मिलकर एक-दूसरे के लिए ऐसी भावना रखें तो गुर्दा प्रत्यारोपण की प्रतिक्षा सूची में शामिल महिलाओं को भी समय रहते गुर्दा मिल सकेगा और वे भी अपनों के साथ खुशहाल जिंदगी जी सकेंगी।
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सास निर्मला ने दामाद पंकज को दिया गुर्दा।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
जिंदगी के हर मोड़ पर खुद को साबित करने वाली महिलाएं गुर्दा दान करने में भी सबसे आगे हैं। पीजीआई के नेफ्रोलॉजी विभाग में अब तक हुए गुर्दा प्रत्यारोपण की संख्या पर गौर करें तो उनमें 70 प्रतिशत महिला दानकर्ता शामिल हैं। इन महिलाओं में भी मां, बहन, पत्नी के साथ अब सास भी अपने दामाद को गुर्दा देने के लिए आगे आ रही हैं। इतना ही नहीं एकाकी परिवार के कारण लेन-देन की प्रवृत्ति भी तेजी से बढ़ रही है। लेकिन इस लेन-देन में भी महिलाएं ही सबसे आगे नजर आ रही हैं, जो अपनी किडनी किसी और के पति को देकर उसकी पत्नी से अपने पति का जान बचा रही हैं।
सास अपने दामाद के लिए बनीं वरदान
पीजीआई के पूर्व शोध अधिकारी पंकज बहुगुणा जो मौजूदा समय में स्कॉटलैंड में हैं, को 2018 में पता चला कि उनके गुर्दे खराब हो गए हैं। परिवार में कोई सदस्य ऐसा नहीं था जो उन्हें अपना गुर्दा दे सके। पत्नी प्रीति ने हामी भरी लेकिन ब्लड ग्रुप मैच न होने के कारण वह किडनी नहीं दे पाई। प्रीति की परेशानी को देखकर उनकी मां निर्मला से नहीं रहा गया। उन्होंने गुर्दा देने का निर्णय लिया। 2018 में पीजीआई में ही पंकज को उनकी सासु मां का गुर्दा प्रत्यारोपित किया गया। मौजूदा समय में गुर्दा देने वाले और लेने वाले दोनों ही ठीक हैं। पंकज का कहना है कि उनकी सासू मां उनके लिए वरदान साबित हुई हैं। वहीं निर्मला के लिए बच्चों की खुशी के आगे सब कम है। निर्मला का कहना है कि जब एक गुर्दे पर भी जीवित रहा जा सकता है तो दूसरे को देकर किसी अपने की जान बचाने से बेहतर और क्या होगा।
हर रिश्ते पर नारी भारी
गुर्दा दान करने वाले प्रतिशत
माता 33 प्रतिशत
पत्नी 31 प्रतिशत
पिता 13 प्रतिशत
पति 4.7 प्रतिशत
बहन 5.4 प्रतिशत
भाई 6.1 प्रतिशत
(इसमें अलग-अलग रिश्तों में शामिल महिला गुर्दा दाता 70 प्रतिशत हैं।)
एकाकी परिवार ने बढ़ाया लेन-देन का चलन
प्रो. कोहली ने बताया कि तेजी से बढ़ते एकाकी परिवार के चलन ने स्वैप यानि लेन-देन की अवधारण को मजबूती देने का काम किया है। परिणामतः अपनों को बचाने के लिए स्वैप यानि लेन-देन के माध्यम से गुर्दा प्राप्त करने वालों की संख्या सबसे ज्यादा है। लेकिन इसमें भी पुरुषों की तुलना में महिलाओं की संख्या कहीं ज्यादा हैं। अगर आंकड़ों पर गौर करें तो 75 प्रतिशत पत्नियां पतियों के लिए स्वैप का सहारा ले अपना गुर्दा देकर अपने पति के मैच का गुर्दा उसके बदले में प्राप्त कर रही हैं। जबकि इसमें पुरुषों की भागीदारी महज 10 प्रतिशत है।
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रिश्तों पर भारी लेन-देन
दाता का वर्ग प्रतिशत
स्वैप से 38 प्रतिशत
ससुराल वालों से 23 प्रतिशत
चचेरे भाई-बहन 9 प्रतिशत
मिश्रित दाता 12 प्रतिशत
(ससुराल वालों में 24 प्रतिशत सास शामिल हैं जिन्होंने अपने दामाद को अपना गुर्दा दान किया है।)
पीजीआई में अब तक इतनों में हुआ गुर्दा प्रत्यारोपण
वर्ष प्रत्यारोपण
2012 188
2013 200
2014 207
2015 251
2016 227
2017 231
2018 219
2019 224
2020 114
2021 187
2022 148
जिस रफ्तार से गुर्दे की समस्या बढ़ रही है, उसे देखते हुए लोगों को अपनी सेहत के प्रति सचेत होने की जरूरत है। इसलिए जरूरी है कि लक्षणों के आधार पर शुरुआती दौर में ही बीमारी का पता चल जाए और उसका इलाज शुरू हो जाए। जहां तक गुर्दा दान करने की बात है तो इसमें महिलाओं की भागीदारी पुरुषों से कहीं ज्यादा है। यहां भी महिलाएं पुरुषों से आगे हैं। इनसे सभी को सीख लेनी चाहिए। - प्रो. एसएच कोहली, प्रमुख, नेफ्रोलॉजी विभाग पीजीआई
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सास अपने दामाद के लिए बनीं वरदान
पीजीआई के पूर्व शोध अधिकारी पंकज बहुगुणा जो मौजूदा समय में स्कॉटलैंड में हैं, को 2018 में पता चला कि उनके गुर्दे खराब हो गए हैं। परिवार में कोई सदस्य ऐसा नहीं था जो उन्हें अपना गुर्दा दे सके। पत्नी प्रीति ने हामी भरी लेकिन ब्लड ग्रुप मैच न होने के कारण वह किडनी नहीं दे पाई। प्रीति की परेशानी को देखकर उनकी मां निर्मला से नहीं रहा गया। उन्होंने गुर्दा देने का निर्णय लिया। 2018 में पीजीआई में ही पंकज को उनकी सासु मां का गुर्दा प्रत्यारोपित किया गया। मौजूदा समय में गुर्दा देने वाले और लेने वाले दोनों ही ठीक हैं। पंकज का कहना है कि उनकी सासू मां उनके लिए वरदान साबित हुई हैं। वहीं निर्मला के लिए बच्चों की खुशी के आगे सब कम है। निर्मला का कहना है कि जब एक गुर्दे पर भी जीवित रहा जा सकता है तो दूसरे को देकर किसी अपने की जान बचाने से बेहतर और क्या होगा।
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हर रिश्ते पर नारी भारी
गुर्दा दान करने वाले प्रतिशत
माता 33 प्रतिशत
पत्नी 31 प्रतिशत
पिता 13 प्रतिशत
पति 4.7 प्रतिशत
बहन 5.4 प्रतिशत
भाई 6.1 प्रतिशत
(इसमें अलग-अलग रिश्तों में शामिल महिला गुर्दा दाता 70 प्रतिशत हैं।)
एकाकी परिवार ने बढ़ाया लेन-देन का चलन
प्रो. कोहली ने बताया कि तेजी से बढ़ते एकाकी परिवार के चलन ने स्वैप यानि लेन-देन की अवधारण को मजबूती देने का काम किया है। परिणामतः अपनों को बचाने के लिए स्वैप यानि लेन-देन के माध्यम से गुर्दा प्राप्त करने वालों की संख्या सबसे ज्यादा है। लेकिन इसमें भी पुरुषों की तुलना में महिलाओं की संख्या कहीं ज्यादा हैं। अगर आंकड़ों पर गौर करें तो 75 प्रतिशत पत्नियां पतियों के लिए स्वैप का सहारा ले अपना गुर्दा देकर अपने पति के मैच का गुर्दा उसके बदले में प्राप्त कर रही हैं। जबकि इसमें पुरुषों की भागीदारी महज 10 प्रतिशत है।
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रिश्तों पर भारी लेन-देन
दाता का वर्ग प्रतिशत
स्वैप से 38 प्रतिशत
ससुराल वालों से 23 प्रतिशत
चचेरे भाई-बहन 9 प्रतिशत
मिश्रित दाता 12 प्रतिशत
(ससुराल वालों में 24 प्रतिशत सास शामिल हैं जिन्होंने अपने दामाद को अपना गुर्दा दान किया है।)
पीजीआई में अब तक इतनों में हुआ गुर्दा प्रत्यारोपण
वर्ष प्रत्यारोपण
2012 188
2013 200
2014 207
2015 251
2016 227
2017 231
2018 219
2019 224
2020 114
2021 187
2022 148
जिस रफ्तार से गुर्दे की समस्या बढ़ रही है, उसे देखते हुए लोगों को अपनी सेहत के प्रति सचेत होने की जरूरत है। इसलिए जरूरी है कि लक्षणों के आधार पर शुरुआती दौर में ही बीमारी का पता चल जाए और उसका इलाज शुरू हो जाए। जहां तक गुर्दा दान करने की बात है तो इसमें महिलाओं की भागीदारी पुरुषों से कहीं ज्यादा है। यहां भी महिलाएं पुरुषों से आगे हैं। इनसे सभी को सीख लेनी चाहिए। - प्रो. एसएच कोहली, प्रमुख, नेफ्रोलॉजी विभाग पीजीआई