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ऐतिहासिक जगह घूमना चाहते हैं तो आएं मोरनी हिल
अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Sun, 27 Oct 2013 04:00 PM IST
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समुद्र तक से 3500 फुट से अधिक ऊंचाई पर स्थित हरियाणा का इकलौता पर्वतीय पर्यटन स्थल मोरनी अनायास ही सैलानियों को अपनी ओर आकर्षित करता है।
सिटी ब्यूटीफुल यानि चंडीगढ़ से करीब 35 किलोमीटर की दूरी पर स्थित मोरनी शिवालिक की पहाड़ियों के बीच है। पंचकूला से मोरनी आने के दो रास्ते हैं।
एक नाडा साहिब से तो दूसरा क्रेशर जोन से थापली होकर यहां पहुंचता है। सफर के दौरान सैलानी यदि थोड़ी देर आराम करना चाहते हैं तो इसके लिए वन विभाग की ओर से थापली में नेचर कैंप भी है।
मोरनी में पर्यटन निगम की ओर से तैयार किया गया माउंटन क्वेल में मेहमानों के ठहरने के लिए 16 कमरे हैं। यहां सैलानियों के लिए बार कम रेस्टोरेंट की सुविधा है यहां पर आठ सामान्य बजट के जबकि आठ रेग्यूलर तो दो कमरे आधुनिक सुविधाओं से युक्त है।
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इसके अलावा लाल मुनिया वन विश्राम गृह और घगगर नदी के पार वन विभाग की ओर से तैयार स्काई लार्क विश्राम गृह भी मौजूद है।
टिक्कर ताल के पास पर्यटन निगम ने वातानूकुलित चार कमरे तैयार कर रखे हैं। पर्यटकों की संख्या अधिक है तो उनके लिए 16 बेड की डोरमेट्री की सुविधा भी है। इनमें एक डोरमेट्री एसी जबकि दूसरा सामान्य है।
मोरनी में पुराना ऐतिहासिक किला और मोरनी से नौ किलोमीटर दूर स्थित टिक्कर ताल यहां का मुख्य पर्यटन केंद्र है। यहां तक बस या टैक्सी के जरिए पहुंचा जा सकता है।
सैलानियों के लिए बोटिंग, ट्रैकिंग, कैंपिंग की सुविधा है। बच्चों के मनोरंजन के लिए एडवेंचर थीम पार्क भी बना हुआ है। मोरनी के टिक्कर तालों में लगाया गया 162 फुट ऊंचा फाऊंटेन ताल की खूबसूरती में चार चांद लगा देता है।
यहां पहुंचकर पर्यटकों को थोड़ी देर के लिए ऐसा लगता है मानो भीड़ भाड़ की दुनिया से कहीं दूर, प्रकृति की गोद में हैं।
मोरनी के पांडव तालों का अपना एक इतिहास है। अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने शिवालिक की पहाड़ियों में अपनी जिंदगी व्यतीत की थी, लेकिन काफी कम लोगों को पता है कि पांडवों की अज्ञातवास स्थली की सीमारेखा मोरनी हिल्स और मौजूदा पिंजौर तक सीमित थी।
मोरनी ताल के नाम से मशहूर पांडव ताल क्षेत्र में उनके अज्ञातवास का अधिकतर समय व्यतीत हुआ। ठाकुरद्वारा गांव या पांडव ताल गांव भूड से 7 किलोमीटर की दूरी पर है।
महाभारत के नायक पांचों पांडव युधिष्टिर, भीम, अर्जुन, सहदेव और नकुल और कुलवधु द्रौपदी अपने अज्ञातवास के दौरान इसी स्थान पर जंगल और पहाड़ियों के बीच रहे।
इससे पूर्व पांडव गांव पारवाला-खैरवाली के जंगलों में भी रहे जो कि निकटवर्ती क्षेत्र है। वहां पर भी एक तालाब विद्यमान है। दंतकथा है कि यह तालाब भी पांडव-पुत्रों ने ही तैयार किया था।
गांव ठाकुरद्वारा और ताल क्षेत्र में ही पांडवों ने अपने अस्त्र-शस्त्र छिपा रखे थे। इसी क्षेत्र के पास महाराजा विराट के साले कीचक का महल है।
गांव ठाकुरद्वारा में पांडवों ने द्रौपदी के लिए पूजा-अर्चना के लिए एक शिव मंदिर की स्थापना की जिसकी छत वे नही डाल सके थे। फिलहाल अवशेष मात्र हैं।
इस मंदिर की खुदाई के दौरान सीता-राम, उमा-शंकर महादेव, ब्रहा, विष्णु, महेश, गंगा, यमुना, सरस्वती, गंगा धारा सहित प्राप्त हुई है।
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सिटी ब्यूटीफुल यानि चंडीगढ़ से करीब 35 किलोमीटर की दूरी पर स्थित मोरनी शिवालिक की पहाड़ियों के बीच है। पंचकूला से मोरनी आने के दो रास्ते हैं।
एक नाडा साहिब से तो दूसरा क्रेशर जोन से थापली होकर यहां पहुंचता है। सफर के दौरान सैलानी यदि थोड़ी देर आराम करना चाहते हैं तो इसके लिए वन विभाग की ओर से थापली में नेचर कैंप भी है।
पढ़ें: हर मुराद पूरी करती है मां मनसा देवी
ठहरने की सुविधा
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मोरनी में पर्यटन निगम की ओर से तैयार किया गया माउंटन क्वेल में मेहमानों के ठहरने के लिए 16 कमरे हैं। यहां सैलानियों के लिए बार कम रेस्टोरेंट की सुविधा है यहां पर आठ सामान्य बजट के जबकि आठ रेग्यूलर तो दो कमरे आधुनिक सुविधाओं से युक्त है।
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इसके अलावा लाल मुनिया वन विश्राम गृह और घगगर नदी के पार वन विभाग की ओर से तैयार स्काई लार्क विश्राम गृह भी मौजूद है।
टिक्कर ताल के पास पर्यटन निगम ने वातानूकुलित चार कमरे तैयार कर रखे हैं। पर्यटकों की संख्या अधिक है तो उनके लिए 16 बेड की डोरमेट्री की सुविधा भी है। इनमें एक डोरमेट्री एसी जबकि दूसरा सामान्य है।
पढ़ें: छतबीड़ जू, यानी पिकनिक का पूरा इंतजाम
आकर्षण का केन्द्रमोरनी में पुराना ऐतिहासिक किला और मोरनी से नौ किलोमीटर दूर स्थित टिक्कर ताल यहां का मुख्य पर्यटन केंद्र है। यहां तक बस या टैक्सी के जरिए पहुंचा जा सकता है।
सैलानियों के लिए बोटिंग, ट्रैकिंग, कैंपिंग की सुविधा है। बच्चों के मनोरंजन के लिए एडवेंचर थीम पार्क भी बना हुआ है। मोरनी के टिक्कर तालों में लगाया गया 162 फुट ऊंचा फाऊंटेन ताल की खूबसूरती में चार चांद लगा देता है।
यहां पहुंचकर पर्यटकों को थोड़ी देर के लिए ऐसा लगता है मानो भीड़ भाड़ की दुनिया से कहीं दूर, प्रकृति की गोद में हैं।
पढ़ें: औरंगजेब के जमाने की है यह पर्यटन स्थल
पांडवों ने यहीं बिताए थे अज्ञातवासमोरनी के पांडव तालों का अपना एक इतिहास है। अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने शिवालिक की पहाड़ियों में अपनी जिंदगी व्यतीत की थी, लेकिन काफी कम लोगों को पता है कि पांडवों की अज्ञातवास स्थली की सीमारेखा मोरनी हिल्स और मौजूदा पिंजौर तक सीमित थी।
मोरनी ताल के नाम से मशहूर पांडव ताल क्षेत्र में उनके अज्ञातवास का अधिकतर समय व्यतीत हुआ। ठाकुरद्वारा गांव या पांडव ताल गांव भूड से 7 किलोमीटर की दूरी पर है।
महाभारत के नायक पांचों पांडव युधिष्टिर, भीम, अर्जुन, सहदेव और नकुल और कुलवधु द्रौपदी अपने अज्ञातवास के दौरान इसी स्थान पर जंगल और पहाड़ियों के बीच रहे।
इससे पूर्व पांडव गांव पारवाला-खैरवाली के जंगलों में भी रहे जो कि निकटवर्ती क्षेत्र है। वहां पर भी एक तालाब विद्यमान है। दंतकथा है कि यह तालाब भी पांडव-पुत्रों ने ही तैयार किया था।
गांव ठाकुरद्वारा और ताल क्षेत्र में ही पांडवों ने अपने अस्त्र-शस्त्र छिपा रखे थे। इसी क्षेत्र के पास महाराजा विराट के साले कीचक का महल है।
गांव ठाकुरद्वारा में पांडवों ने द्रौपदी के लिए पूजा-अर्चना के लिए एक शिव मंदिर की स्थापना की जिसकी छत वे नही डाल सके थे। फिलहाल अवशेष मात्र हैं।
इस मंदिर की खुदाई के दौरान सीता-राम, उमा-शंकर महादेव, ब्रहा, विष्णु, महेश, गंगा, यमुना, सरस्वती, गंगा धारा सहित प्राप्त हुई है।