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Chandigarh News: नहीं तोड़ी जाएगी दीवार, एडवांस पीडियाट्रिक सेंटर की आईसीयू से टला खतरा

Mon, 11 Sep 2023 01:41 AM IST
Chandigarh Bureau चंडीगढ़ ब्यूरो
Updated Mon, 11 Sep 2023 01:41 AM IST
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Wall will not be broken, danger from ICU of Advanced Pediatric Center averted
चंडीगढ़। पीजीआई के एडवांस पीडियाट्रिक सेंटर में जन्मजात हृदयरोग से ग्रस्त बच्चों के लिए वरदान साबित हो रहे हाई डिपेंडेंसी यूनिट आईसीयू पर मंडरा रहा खतरा टल गया है। पीजीआई निदेशक प्रो. विवेक लाल ने यूनिट की दीवार को तोड़ने के लिए जारी किए गए आदेश पर कहा है कि बच्चों का इलाज प्रभावित किए बिना मानक के अनुरूप व्यवस्था बहाल की जाएगी। दीवार तोड़ने की बजाय उसी दीवार में दरवाजा भी बनाया जा सकता है। अमर उजाला ने इस समस्या को 31 अगस्त के अंक में प्रमुखता से प्रकाशित किया था। इसे संज्ञान लेकर पीजीआई निदेशक ने बिना तोड़फोड़ के व्यवस्था बेहतर बनाने की बात कही है। बता दें कि पीजीआई प्रशासन के निर्देश पर 2021 में जिस 4सी वार्ड में एक दीवार खड़ी कर इस आईसीयू की स्थापना की गई थी, उस दीवार को तोड़ने का आदेश जारी कर दिया गया। पीजीआई प्रशासन ने 28 अगस्त को जारी आदेश में अग्नि सुरक्षा के मानकों के पालन न होने का हवाला दिया गया। जिसके बाद उस यूनिट पर खतरा मंडराने लगा। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर दीवार तोड़ी गई तो आईसीयू जनरल वार्ड से जुड़ जाएगा जिससे आईसीयू में भर्ती गंभीर बच्चे संक्रमण का शिकार होंगे। इसलिए दीवार को तोड़े बिना कोई वैकल्पिक व्यवस्था करनी चाहिए।
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गौरतलब है कि उत्तर भारत में जन्मजात हृदयरोग से ग्रस्त बच्चों के इलाज के लिए कोई सुविधा न होने से पीजीआई में 2021 अक्तूबर में इस यूनिट की शुरुआत की गई थी। 10 बेड वाले इस यूनिट को 4सी वार्ड में ही जगह चिह्नित कर बनाया गया है। जहां 2021 से अब तक जन्मजात हृदयरोग के लगभग 900 बच्चों की जान बचाई जा चुकी है। प्रतिवर्ष यहां 270 से 280 बच्चे भर्ती किए जा रहे हैं।
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अयोध्या के सूर्यांशू की बची जान अयोध्या निवासी सात महीने का सूर्यांशू जब पीजीआई पहुंचा तो उसके हृदय में बड़ा छेद था। वह तीन हफ्ते एपीसी की हाई डिपेंडेंसी यूनिट आईसीयू में वेंटीलेटर पर रहा। स्थिति नियंत्रित होने पर उसकी सर्जरी हुई। सर्जरी के बाद उसे दोबारा यूनिट में शिफ्ट किया गया। जहां फिर तीन हफ्ते रहने के बाद उसकी रविवार को छुट्टी हो गई। बच्चे के पिता ओम बाबू का कहना है कि पीजीआई में उनके बच्चे की जान बच गई। जन्मजात हृदयरोग का इलाज कराते-कराते वे कई अस्पतालों के चक्कर काट चुके थे। अंत में पीजीआई में उनके बच्चे की जान बची है।
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