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बड़ी ख़बर: यूटी कर्मचारियों की हाउसिंग स्कीम को केंद्र से मंजूरी
अमर उजाला ब्यूरो, चंडीगढ़
Updated Wed, 24 Aug 2016 01:09 AM IST
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UT staff housing scheme
- फोटो : amar ujala
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आवास के मामले में यूटी प्रशासन के करीब 4000 कर्मचारियों को जल्द ही राहत मिलने की उम्मीद है। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में लंबे समय से लंबित इस मामले में आखिरकार केंद्र सरकार ने जवाब दाखिल किया है। जवाब में कहा गया है कि चंडीगढ़ प्रशासन द्वारा गत 10 मार्च को भेजे गए प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई है।
जस्टिस अजय कुमार मित्तल और जस्टिस रामेंद्र जैन की खंडपीठ के समक्ष केंद्र सरकार की ओर से सीनियर एडवोकेट चेतन मित्तल ने बताया कि चंडीगढ़ प्रशासन द्वारा भेजा गया प्रस्ताव केंद्रीय गृह मामले के मंत्रालय ने स्वीकार कर लिया है। अब प्रस्ताव को आवश्यक सहमति के लिए वित्त विभाग के पास भेजा गया है। मामले पर अगली सुनवाई 27 सितंबर को होगी। चंडीगढ़ प्रशासन ने हाउसिंग स्कीम के तहत जमीन की कीमत पर 12 फीसदी ब्याज का प्रस्ताव भेजा था, जिसे केंद्र ने घटाकर 10 प्रतिशत कर दिया है।
चंडीगढ़ प्रशासन के कर्मचारियों को हाउसिंग वेलफेयर स्कीम के तहत चंडीगढ़ हाउसिंग बोर्ड के मकान उपलब्ध करवाने के मामले में प्रशासन ने केंद्रीय गृह विभाग के जरिए केंद्रीय वित्त मंत्रालय से अनुमति मांगी थी। दरअसल, हाउसिंग बोर्ड के समक्ष सबसे बड़ी समस्या जमीन की बड़ी कीमत है और प्रशासन चाहता है कि जमीन की कीमत वित्त मंत्रालय तय करे। चंडीगढ़ प्रशासन ने स्कीम के लिए दक्षिणी सेक्टरों में जमीन रिजर्व रखी हुई है। जमीन की बढ़ी कीमत के चलते यह स्कीम चंडीगढ़ प्रशासन और चंडीगढ़ हाउसिंग बोर्ड के बीच ही उलझकर रह गई थी। हाईकोर्ट में इस मामले पर पिछली कई सुनवाइयों के दौरान चंडीगढ़ प्रशासन जहां हाउसिंग बोर्ड पर देरी ठीकरा फोड़ता रहा। वहीं हाउसिंग बोर्ड यूटी प्रशासन को जिम्मेदार ठहराता रहा था।
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जस्टिस अजय कुमार मित्तल और जस्टिस रामेंद्र जैन की खंडपीठ के समक्ष केंद्र सरकार की ओर से सीनियर एडवोकेट चेतन मित्तल ने बताया कि चंडीगढ़ प्रशासन द्वारा भेजा गया प्रस्ताव केंद्रीय गृह मामले के मंत्रालय ने स्वीकार कर लिया है। अब प्रस्ताव को आवश्यक सहमति के लिए वित्त विभाग के पास भेजा गया है। मामले पर अगली सुनवाई 27 सितंबर को होगी। चंडीगढ़ प्रशासन ने हाउसिंग स्कीम के तहत जमीन की कीमत पर 12 फीसदी ब्याज का प्रस्ताव भेजा था, जिसे केंद्र ने घटाकर 10 प्रतिशत कर दिया है।
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चंडीगढ़ प्रशासन के कर्मचारियों को हाउसिंग वेलफेयर स्कीम के तहत चंडीगढ़ हाउसिंग बोर्ड के मकान उपलब्ध करवाने के मामले में प्रशासन ने केंद्रीय गृह विभाग के जरिए केंद्रीय वित्त मंत्रालय से अनुमति मांगी थी। दरअसल, हाउसिंग बोर्ड के समक्ष सबसे बड़ी समस्या जमीन की बड़ी कीमत है और प्रशासन चाहता है कि जमीन की कीमत वित्त मंत्रालय तय करे। चंडीगढ़ प्रशासन ने स्कीम के लिए दक्षिणी सेक्टरों में जमीन रिजर्व रखी हुई है। जमीन की बढ़ी कीमत के चलते यह स्कीम चंडीगढ़ प्रशासन और चंडीगढ़ हाउसिंग बोर्ड के बीच ही उलझकर रह गई थी। हाईकोर्ट में इस मामले पर पिछली कई सुनवाइयों के दौरान चंडीगढ़ प्रशासन जहां हाउसिंग बोर्ड पर देरी ठीकरा फोड़ता रहा। वहीं हाउसिंग बोर्ड यूटी प्रशासन को जिम्मेदार ठहराता रहा था।
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केंद्र के रुख को सराहा
UT staff housing scheme
- फोटो : amar ujala
सुनवाई के दौरान चंडीगढ़ प्रशासन ने जवाब दायर कर कहा था कि चंडीगढ़ हाउसिंग बोर्ड ने स्कीम के तहत जमीन लेने के लिए प्रशासन के पास पैसे जमा नहीं करवाए। इसलिए प्रशासन ने जमीन जारी नही की। दूसरी तरफ चंडीगढ़ हाउसिंग बोर्ड की तरफ से हाईकोर्ट को बताया गया कि जब बोर्ड ने वर्षों पहले यह स्कीम जारी की कि थी उस समय जमीन का रेट 7920 रुपये गज मिल रही थी। जबकि आज के समय चंडीगढ़ में जमीन का दाम 60 हजार रुपये प्रति गज के हिसाब से पड़ रहा है।
बोर्ड ने हाईकोर्ट को यह भी कहा कि वह इस स्कीम को रद कर रहा है। बोर्ड के इस जवाब पर हाईकोर्ट ने प्रशासन को आड़े हाथों लेते हुए कहा था कि प्रशासन वोट बैक को ध्यान में रखकर करोड़ों रुपये खर्च कर झुग्गी वालों को तो मकान दे सकता है। लेकिन अपने उन कर्मचारियों जिन्होंने सारी उम्र प्रशासन की सेवा की है, उनके लिए मकान देने के लिए उसके पास जमीन नहीं है। हाईकोर्ट ने यहां तक कह दिया था कि मामले में शामिल अधिकारियों के खिलाफ वह मामला दर्ज करने का आदेश तक दे सकते हैं। बाद में इस मामले में केंद्रीय गृह मंत्रालय को पक्ष बनाया गया था।
यह है मामला
करीब छह वर्ष पहले चंडीगढ़ प्रशासन ने अपने कर्मचारियों को आवास देने के लिए एक नीति बनाई थी। इसके तहत सभी से अर्नेस्ट मनी भी जमा करवा ली गई, लेकिन बाद में सभी को मकान देने के निर्णय को बदलते हुए ड्रा के जरिए कुछ कर्मचारियों को मकान देने की नीति बनाई गई। ड्रा में सफल होने वाले कर्मचारियों को भी प्रशासन ने आज तक मकान नहीं दिया। प्रशासन का तर्क था कि प्रशासन के पास शहर में जगह की कमी है। बाद में इस मामले को लेकर हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर कर दी गयी थी।
बोर्ड ने हाईकोर्ट को यह भी कहा कि वह इस स्कीम को रद कर रहा है। बोर्ड के इस जवाब पर हाईकोर्ट ने प्रशासन को आड़े हाथों लेते हुए कहा था कि प्रशासन वोट बैक को ध्यान में रखकर करोड़ों रुपये खर्च कर झुग्गी वालों को तो मकान दे सकता है। लेकिन अपने उन कर्मचारियों जिन्होंने सारी उम्र प्रशासन की सेवा की है, उनके लिए मकान देने के लिए उसके पास जमीन नहीं है। हाईकोर्ट ने यहां तक कह दिया था कि मामले में शामिल अधिकारियों के खिलाफ वह मामला दर्ज करने का आदेश तक दे सकते हैं। बाद में इस मामले में केंद्रीय गृह मंत्रालय को पक्ष बनाया गया था।
यह है मामला
करीब छह वर्ष पहले चंडीगढ़ प्रशासन ने अपने कर्मचारियों को आवास देने के लिए एक नीति बनाई थी। इसके तहत सभी से अर्नेस्ट मनी भी जमा करवा ली गई, लेकिन बाद में सभी को मकान देने के निर्णय को बदलते हुए ड्रा के जरिए कुछ कर्मचारियों को मकान देने की नीति बनाई गई। ड्रा में सफल होने वाले कर्मचारियों को भी प्रशासन ने आज तक मकान नहीं दिया। प्रशासन का तर्क था कि प्रशासन के पास शहर में जगह की कमी है। बाद में इस मामले को लेकर हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर कर दी गयी थी।