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चाबहार पर अमेरिकी दबाव: भारत के रणनीतिक हितों पर सीधा प्रहार, अब निर्णायक फैसले का समय

Mon, 19 Jan 2026 07:32 PM IST
Chandigarh Bureau चंडीगढ़ ब्यूरो
Updated Mon, 19 Jan 2026 07:32 PM IST
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US pressure on Chabahar: A direct attack on India's strategic interests, now is the time for decisive action.
-रक्षा मामलों के विशेषज्ञ राजिंदर सिंह लिट्ट बोले- नीति, ईरान प्रतिबंधों की आड़ में भारत को घेरने की कोशिश
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कंवरपाल हलवारा। ईरान स्थित चाबहार बंदरगाह परियोजना भारत के लिए केवल एक आर्थिक परियोजना नहीं बल्कि रणनीतिक कनेक्टिविटी, ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय संतुलन का मजबूत स्तंभ है। ऐसे में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अपनाई जा रही आक्रामक नीतियां भारत के लिए गंभीर चुनौती बनती दिख रही हैं। ट्रंप प्रशासन जहां एक ओर अपने देशवासियों को खुश करने के लिए पूरी दुनिया से टकराव की नीति अपना रहा है, वहीं दूसरी ओर भारत जैसे रणनीतिक साझेदार पर भी दबाव बढ़ाया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अब भी भारत ने कठोर और स्पष्ट रुख नहीं अपनाया, तो भविष्य में इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।
चाबहार बंदरगाह भारत को पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए अफगानिस्तान, मध्य एशिया और रूस तक सीधा व्यापारिक मार्ग उपलब्ध कराता है। यह परियोजना न केवल भारत के कनेक्टिविटी लक्ष्यों को मजबूत करती है, बल्कि चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) के प्रभाव को संतुलित करने में भी अहम भूमिका निभाती है।
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रक्षा मामलों के विशेषज्ञ और भारतीय सेना के सेवानिवृत्त कैप्टन राजिंदर सिंह लिट्ट के अनुसार ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों ने चाबहार परियोजना की गति और क्षमता को बार-बार बाधित किया है। ये प्रतिबंध सटीक और लक्षित न होकर एक कठोर हथौड़े की तरह इस्तेमाल किए जा रहे हैं, जिनका सीधा नुकसान भारत को उठाना पड़ रहा है।
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अमेरिकी प्रतिबंध: उद्देश्य और वास्तविक असर
अमेरिका ने ईरान के बैंकिंग तंत्र, तेल निर्यात, जहाजरानी, बंदरगाहों और वित्तीय लेनदेन पर कड़े प्रतिबंध लगाए हैं। इनका घोषित उद्देश्य ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय सुरक्षा गतिविधियों पर दबाव बनाना है। हालांकि, इन प्रतिबंधों में यह भेद नहीं किया गया कि कौन-सी परियोजना सैन्य है और कौन-सी विकासात्मक या मानवीय हितों से जुड़ी हुई है। यही कठोरता भारत के लिए सबसे बड़ी समस्या बनकर उभरी है। चाबहार जैसी परियोजनाएं, जिनका उद्देश्य क्षेत्रीय स्थिरता और व्यापार बढ़ाना है, वे भी इन प्रतिबंधों की चपेट में आ गई हैं।

भारत-अमेरिका संबंधों पर भी असर
भारत और अमेरिका हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती ताकत को संतुलित करने के लिए करीबी रणनीतिक साझेदार हैं। अफगानिस्तान की स्थिरता और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी में भी अमेरिका भारत की भूमिका का समर्थन करता रहा है। बावजूद इसके, ईरान पर लगाए गए प्रतिबंध अनजाने में उन्हीं लक्ष्यों को कमजोर कर रहे हैं, जिनका अमेरिका खुद समर्थक है। विशेषज्ञों का कहना है कि चाबहार विवाद के चलते भारत-अमेरिका संबंधों में अनावश्यक तनाव पैदा हो रहा है और भारत को अपनी परियोजनाएं धीमी या स्थगित करनी पड़ रही हैं। कंवरपाल के अनुसार, ईरान के प्रति अमेरिकी दृष्टिकोण में गंभीर अंतर्विरोध है। अमेरिका ईरान को शत्रु मानते हुए प्रतिबंधों का सहारा ले रहा है, लेकिन उसी प्रक्रिया में भारत जैसे रणनीतिक साझेदार को भी नुकसान पहुंचा रहा है।
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