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लक्षण देखें, कहीं आपके बच्चे को मनोरोग तो नहीं
आशीष वर्मा/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Wed, 14 May 2014 12:27 PM IST
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टाइप वन डायबिटीज पीड़ित बच्चे मानसिक बीमारियों के शिकार हो सकते हैं। इन बच्चों को डिप्रेशन, इनजाइटी और अन्य बीमारियां हो सकती हैं। साइकोसोशल दिक्कत होने के कारण बच्चों की शुगर कंट्रोल में नहीं होती। इससे उनकी दिक्कतें काफी बढ़ जाती हैं।
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यह खुलासा पीजीआई के पीडियाट्रिक डिपार्टमेंट की एक स्टडी में सामने आया है। इसमें यह भी बताया गया है कि भारतीय बच्चे टाइप वन डायबिटीज से लड़ने में विदेशी बच्चों से ज्यादा सक्षम हैं। जिनके पैरेंट्स डायबिटीज के प्रति अवेयर थे, उन बच्चों में मनो सामाजिक की दिक्कत नहीं देखी गई।
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विशेषज्ञ बताते हैं कि टाइप वन डायबिटीज से पीड़ित बच्चों के पैरेंट्स को बराबर मनोचिकित्सक के संपर्क में रहना चाहिए। पीजीआई की इस स्टडी को इंडियन सोसाइटी फार पीडियाट्रिक एंड एडोलेशंट इंडोक्रिनोलॉजी में आयोजित कांफ्रेंस में काफी सराहा गया और शोधकर्ताओं को सम्मानित किया गया।
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स्टडी में पीडियाट्रिक डिपार्टमेंट के डा.ज्योति अग्रवाल, डा. राकेश कुमार, डा. प्रभजोत और डा. देवी दयाल की अहम भूमिका रही है। टाइप वन डायबिटीज के पीड़ित बच्चों पर पहली बार इस तरह की स्टडी की गई है।
करीब 97 बच्चों पर की गई स्टडी
स्टडी में पीडियाट्रिक डिपार्टमेंट के विशेष क्लीनिक में आने वाले उन 97 बच्चों को शामिल किया गया है, जो पिछले छह महीने से क्लीनिक में आ रहे थे। इनकी उम्र चार से 15 साल थी। बच्चों पर मानसिक रोग की स्थिति जानने के लिए पीजीआई की ओर से बनाई गई विशेष प्रणाली को अपनाया गया है।
यह प्रणाली पीजीआई के मनोरोग विभाग की ओर से 90 के दशक में बनाई गई थी। इसमें बच्चों के पैरेंट्स से विभिन्न प्रकार के प्रश्न पूछे गए। अलग-अलग बच्चों के पैरेंट्स से करीब 30-70 प्रश्न पूछे गए। इनमें से 20 बच्चों में पाया गया कि वे मनोसामाजिक बीमारी से पीड़ित थे।
कुछ इस तरह के प्रश्न पूछे गए
क्या बच्चा रोज स्कूल जाता है
बच्चे का पढ़ाई में कितना मन लगता है
बच्चे खुद से अपनी कितनी साफ-सफाई रखता है
बच्चा आपकी कितनी बात मानता है
बच्चे के कितने दोस्त हैं और उनसे कैसा व्यवहार है
कहीं बच्चा आपसे बदतमीजी तो नहीं करता
बच्चा आपसे जिद करता है कि नहीं
बच्चे की ख्वाहिश पूरी नहीं होने पर कैसे रियेक्ट करता है
क्या होती है टाइप वन डायबिटीज
क्या है टाइप वन डायबिटीज
यह बचपन में या किशोर अवस्था में अचानक इंसुलिन के उत्पादन की कमी होने से पैदा होने वाली बीमारी है। इसमें इंसुलिन हॉर्मोन बनना पूरी तरह बंद हो जाता है। ऐसा किसी एंटीबॉडी की वजह से बीटा सेल्स के पूरी तरह से काम बंद करने से होता है। इससे शरीर में ग्लूकोज की मात्रा बढ़ जाती है।
ग्लूकोज को कंट्रोल करने के लिए बच्चों को इंजेक्शन के माध्यम से दिन में रोजाना चार बार इंसुलिन दी जाती है। इससे बच्चों का बुरा हाल हो जाता है। यह 20 प्रतिशत जेनेटिक की वजह से होती है, जबकि 80 प्रतिशत मरीजों के कारणों का पता नहीं चल सका है। पिछले दो से तीन सालों में ऐसे मरीजों की संख्या बढ़ने लगी है।
क्या होते हैं लक्षण
1. बार-बार पेशाब आना
2. पहले से ज्यादा प्यास लगना
3. दो से तीन हफ्ते में कमजोर होना
4. अचानक से वजन घटना