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कहीं देर न हो जाए: बच्चों में तेजी से बढ़ रहे मनोरोग....विशेषज्ञों की सलाह-बच्चों के साथ ज्यादा समय बिताएं

Sun, 18 Sep 2022 02:24 AM IST
पंचकुला ब्‍यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: पंचकुला ब्‍यूरो Updated Sun, 18 Sep 2022 02:24 AM IST
सार

प्रो. आदर्श कोहली ने बताया कि कोविड के दौरान परिवार में आई नजदीकियों ने दूरियां बढ़ाने का काम किया है। कोविड से पहले लोग व्यस्त थे। एक-दूसरे के संपर्क में आने पर नकारात्मक पक्षों को नजरअंदाज कर दिया जाता था लेकिन जब सभी लंबे समय तक एक ही घर में एक साथ रहे तब उन्हें एक-दूसरे की कमी व्यापक स्तर पर दिखी।

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विस्तार

भागमभाग भरी जिंदगी में कुछ क्षण का विराम जरूरी है। खासतौर पर बच्चों के लिए समय निकालिए, इससे पहले कि वे हाथ से न निकल जाएं। वैसे भी कोविड ने परिवार में काफी दरार डाल दी है। बेटियों को मां की रोका-टाकी पसंद नहीं आ रही तो बच्चे एकांतवादी होते जा रहे हैं।

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बच्चों में मनोरोग की समस्या तेजी से बढ़ रही है। इस पर रोक के लिए संयुक्त परिवार की परिकल्पना को साकार करना अब सभी के लिए संभव नहीं है इसलिए कोशिश होनी चाहिए कि जितने भी सदस्य हों सभी एक-दूसरे के साथ लंबा नहीं अच्छा समय गुजारें। ये बातें पीजीआई मनोरोग विभाग के स्थापना दिवस समारोह के दूसरे दिन शनिवार को विशेषज्ञों ने कहीं। चाइल्ड एंड एडोलसेंट मेंटल हेल्थ पर चिंता जताते हुए उन्होंने अभिभावकों को सजग रहने की सलाह दी।
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पीजीआई मनोरोग विभाग की पूर्व प्रोफेसर आदर्श कोहली ने बताया कि अब बच्चों की मनोदशा तेजी से बदल रही है। झगड़े बढ़ रहे हैं। दूरी बढ़ रही है। बातचीत कम होने लगी है। बच्चे अभिभावकों से बातें छिपाने लगे हैं। इससे उनके अंदर मनोविकार उत्पन्न हो रहा है। जिस पर काबू पाना बेहद जरूरी है।

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बच्चे पर जैसा कलेवर लगाएंगे वैसा परिणाम मिलेगा

कार्यक्रम में मौजूद नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेज बेंगलुरु की चाइल्ड एंड एडोलसेंट यूनिट की प्रो. ईशा शर्मा का कहना है कि बच्चे हमारे केंद्र बिंदु में हैं। उनके ऊपर अभिभावक, परिवार, पड़ोस, स्कूल, समाज का कलेवर चढ़ता जा रहा है। ऐसे में जरूरी है कि बच्चों को बेहतर बनाने की बजाय उन कलेवरों को सुधारने का प्रयास किया जाए। अभिभावकों को यह बात समझनी होगी कि वे जैसा व्यवहार करेंगे उन्हें बच्चों से वैसा ही वापस मिलेगा।

मां-बेटी में बढ़ रही दूरी

प्रो. आदर्श कोहली ने बताया कि कोविड के दौरान परिवार में आई नजदीकियों ने दूरियां बढ़ाने का काम किया है। कोविड से पहले लोग व्यस्त थे। एक-दूसरे के संपर्क में आने पर नकारात्मक पक्षों को नजरअंदाज कर दिया जाता था लेकिन जब सभी लंबे समय तक एक ही घर में एक साथ रहे तब उन्हें एक-दूसरे की कमी व्यापक स्तर पर दिखी। इससे उनके बीच दूरी बढ़ी। इसका सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव मां-बेटी के रिश्ते पर पड़ा है। उस दौरान माताओं ने रोका-टोकी करके एक नकारात्मक प्रभाव डाला। बेटियों ने उनकी चिंता को बंदिश समझना शुरू कर दिया है। इस स्थिति से बचाव बेहद जरूरी है।

ये पड़ रहा दुष्प्रभाव

बच्चों का पढ़ाई में मन नहीं लग रहा। एकाग्रता भंग हो रही है। एक ही चीज को बार-बार कर रहे हैं। चिंता, उदासी और घबराहट की प्रवृत्ति बढ़ रही है। प्रो. आदर्श कोहली ने बताया कि छोटी-छोटी वजह से बच्चे को डांटे-फटकारें नहीं। ऐसा होने पर बच्चे भावनात्मक रूप से कमजोर होने लगते हैं। इसके बाद ये घर, स्कूल में ज्यादा मारपीट करने लगते हैं। सामान को तोड़ देते हैं तो कुछ एकांत में रहने लगते हैं। हमेशा गुस्से में रहते हैं, अपशब्द का भी प्रयोग करने लगते हैं। यानी बच्चे ज्यादा शरारत करते हैं। किसी की बात को नहीं सुनते हैं। अकेले में रहना पसंद कर रहे हैं। परिवार की बजाय स्क्रीन पर ज्यादा वक्त गुजारना पसंद आ रहा है। ऐसी स्थिति पर काबू न मिलने पर सुसाइडल सिम्टम्स के रूप में सामने आ रहे हैं।

माताएं इसका रखें ध्यान

अभिभावक यह मानें कि उनके बच्चे किसी से कम नहीं हैं। उन्हें बेहतर माहौल दें। बातों को समझाने का प्रयास करें। बच्चों में सामने आ रही कमी पर उन्हें हर वक्त ताना देने की बजाय समझाने का प्रयास करें। ठीक ऐसे ही अगर बेटी की मां हैं तो ज्यादा सावधान रहें। छोटी-छोटी बातों पर रोका-टोकी न करें। उनकी प्राइवेसी में हर वक्त हस्तक्षेप न करें। निर्णायक की बजाय दोस्ताना व्यवहार रखें। उसे बेहतर बनाने के लिए खुद को आदर्श रूप में प्रस्तुत करें।

ऐसे सुधारें व्यवहार

- जन्म से दो वर्षों तक बच्चों को मोबाइल फोन या स्क्रीन के संपर्क में न आने दें।
- तीन से पांच वर्ष तक स्क्रीन टाइम आधा घंटा हो।
- छह से 12 वर्ष तक के बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम एक से दो घंटा हो।
- 12 से अधिक आयु वर्ग में स्कूल जाने तक की अवस्था तक बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम तीन से चार घंटे तक हो।
- बच्चों को बाहर के खेलकूद के लिए प्रेरित करें।
- उन्हें हम उम्र बच्चों से घुलने मिलने दें।
- बच्चों के लिए समय निकालें। उन्हें पारिवारिक समय दें।
- उन्हें घर के कामों में शामिल करें। घर के पास बने कॉलोनी के पार्क में रोजाना लेकर जाएं।
- बच्चों को किताबें पढ़ने, स्वीमिंग, पौधा लगाने, आर्ट, पेंटिंग करने के लिए प्रेरित करें।
- बच्चों को संगीत से जोड़ें। संगीत मानसिक अवस्था को बेहतर करने में मदद करता है।

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