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Hindi News ›   Chandigarh ›   There will be a war of supremacy between Sukhjinder Singh Randhawa and Bikram Singh Majithia in Majha region

सियासत: डिप्टी सीएम सुखजिंदर रंधावा व मजीठिया की जंग का मैदान बनेगा माझा, दोनों नेताओं का है इस क्षेत्र में प्रभाव

Fri, 17 Dec 2021 04:37 PM IST
ajay kumar सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर (पंजाब)
सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर (पंजाब) Published by: ajay kumar Updated Fri, 17 Dec 2021 04:37 PM IST
सार

माझा में 2017 के चुनावों में कांग्रेस का जबरदस्त परचम लहराया था और 25 में से 22 सीट कांग्रेस की झोली में आई थी। जिसके बल पर कांग्रेस सत्ता में आ गई। अकाली दल बेअदबी के केसों के कारण कटघरे में था और माझा का इलाका पंथक माना जाता है, इसलिए अकाली दल का सफाया हो गया था। 2017 में अमरिंदर सिंह ने राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर अपना चुनावी अभियान आगे बढ़ाया। ऐसे में हिंदुओं और सिखों ने कांग्रेस को वैसे ही वोट किया जैसा उन्होंने 2007 के चुनाव में अकाली दल और भाजपा को किया था।

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There will be a war of supremacy between Sukhjinder Singh Randhawa and Bikram Singh Majithia in Majha region
सुखजिंदर सिंह रंधावा, बिक्रम सिंह मजीठिया। - फोटो : फाइल फोटो।

विस्तार

पंजाब विधानसभा चुनाव में माझा में मुकाबला काफी दिलचस्प होने जा रहा है। कारण यह है कि अकाली दल व कांग्रेस दोनों के पास माझा में ताकतवर जरनैल हैं और दोनों में कड़वाहट भी जगजाहिर है। सुखजिंदर उर्फ सुक्खी रंधावा पंजाब के डिप्टी सीएम है जबकि बिक्रम सिंह मजीठिया सुखबीर बादल के साले हैं। ऐसे में दोनों शक्तिशाली है और दोनों ने माझा में सरदारी के लिए तैयारी शुरू कर दी है। 

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शिरोमणि अकाली दल बादल के सुप्रीमो सुखबीर बादल ने अपने साले बिक्रम सिंह मजीठिया के रास्ते की तमाम अड़चनों को किनारे कर शिअद में मजीठिया को न केवल नंबर दो पर बैठा रखा है बल्कि माझा की सरदारी भी मजीठिया को सौंप रखी है। माझा में सिर्फ अब सुखबीर सिंह बादल के जीजा आदेश प्रताप कैरों ही बचे हैं, जो मजीठिया के खिलाफ हैं। 
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राजनीति में मजीठिया की एंट्री 2007 में हुई थी, इससे पहले शिअद की माझा में कमान सेवा सिंह सेखवां, रंजीत सिंह ब्रह्मपुरा, रतन सिंह अजनाला, सुच्चा सिंह लंगाह, विरसा सिंह वल्टोहा और कैरों परिवार के हाथ में थी। 2007 में मजीठिया की शिअद में एंट्री दमदार तरीके से हुई तो तमाम पुराने टकसाली नेता दरकिनार होने लगे। 

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सत्ता का केंद्र बिंदू मजीठिया बन गए। 2012 में मजीठिया अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी को 47581 वोट से हराकर चुने गए तो उनको कैबिनेट मंत्री का पद दे दिया गया। मजीठिया शक्तिशाली होते चले गए और मजीठिया के रास्ते में आया, उसको शिअद से बाहर का रास्ता दिखाया जाता रहा। सबसे पहले ब्यास से पूर्व विधायक मंजिंदर सिंह कंग की मजीठिया के साथ खटास हुई तो पार्टी ने उनको चलता कर दिया। 

अमृतसर से विधायक रमिंदर बुलारिया से मजीठिया की ठनी तो शिअद ने उनको भी निकाल दिया। बाद में उन्होंने कांग्रेस का दामन थामा और विधायक बने। माझा के दमदार नेताओं में सुच्चा सिंह लंगाह भी शामिल रहे। पार्टी ने लंगाह को भी चलता कर दिया क्योंकि उनका भी मजीठिया के साथ तालमेल नहीं बैठ रहा था। 

टकसाली नेता रणजीत सिंह ब्रह्मपुरा, रतन सिंह अजनाला भी मजीठिया का विरोध कर रहे थे वह अब बाहर हैं। अजनाला के बेटे बोनी अजनाला वापस आ चुके है लेकिन अब मजीठिया के अधीन ही काम करना पड़ेगा। पार्टी के पास माझा में आदेश प्रताप कैरों ही एक ऐसे नेता बचे हैं, जो मजीठिया के कट्टर विरोधी माने जाते हैं लेकिन कैरो का अपना सियासी कद ऊंचा है लेकिन सुखबीर ने अपने जीजा कैंरों को पॉवरफुल करने के स्थान पर अपने साले बिक्रम सिंह मजीठिया को माझा की कमान सौंप रखी है। अब भी माझा में अकाली दल की टिकटों का वितरण मजीठिया की भेजी गई सूची को आगे रखकर किया गया है। 

वहीं इस बार माझा में कांग्रेस का कद्दावर चेहरा बनाकर सुखजिंदर उर्फ सुक्खी रंधावा उभरे हैं। रंधावा पंजाब में मौजूदा समय में डिप्टी सीएम हैं और पंजाब का गृह विभाग उनके पास है। सुखजिंदर रंधावा पूर्व कांग्रेस प्रधान संतोख सिंह रंधावा के बेटे हैं। सुखजिंदर सिंह रंधावा मूलरूप से पंजाब के माझा क्षेत्र के गुरदासपुर के रहने वाले हैं और डेरा बाबा नानक सीट से विधायक हैं। वह लगातार दो बार 2002 और 2007 में विधायक रहे और फिर पिछले चुनाव 2017 में कांग्रेस से विधायक बने। 

राज्य कांग्रेस के उपाध्यक्ष और महासचिव पद पर भी वे रह चुके हैं। दरअसल, रंधावा को राजनीति विरासत में मिली है। वे ऐसे परिवार से आते हैं जिनकी तीन पीढ़ियां कांग्रेस में रही हैं। उनके पिता संतोख सिंह दो बार प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे व पंजाब में कांग्रेस पार्टी के कद्दावर नेता के तौर पर उनकी गिनती रही है। 

रंधावा ने अपने पिता के साथ रहकर राजनीति की बारीकियां सीखीं। रंधावा की पहचान एक आक्रामक नेता के तौर पर रही है। 2015 में पंजाब में श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की बेअदबी और उसके बाद पुलिस फायरिंग में दो युवकों की मौत के मामलों में उन्होंने बादल परिवार के खिलाफ आवाज बुलंद की थी और आरोपियों पर मुकदमा न चलने का मुद्दा उठाया था।

सुखजिंदर सिंह रंधावा कैप्टन अमरिंदर सिंह की सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे हैं। उनके पास जेल और सहकारिता मंत्रालय था। मंत्री रहते हुए भी सरकार पर चुनावी वादों को पूरा ना कर पाने का आरोप लगाते रहे हैं और बिक्रम सिंह मजीठिया के खिलाफ विधानसभा से लेकर माझा में ललकार मारते रहे हैं। रंधावा पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू के भी बेहद करीबी हैं। 

यही नहीं उन्होंने सिद्धू के साथ मिलकर कैप्टन अमरिंदर सिंह के खिलाफ मोर्चा खोला था। माझा में पिछली बार कांग्रेस के काफी दमदार नेता जीते थे जिसमें सुखबिंदर सिंह सरकारिया, तृप्त राजिंदर सिंह बाजवा, नवजोत सिंह सिद्धू के अलावा सुखजिंदर सिंह रंधावा थे। रंधावा पहले दिन से ही मजीठिया के खिलाफ ताल ठोकते रहे हैं और उन्होंने मजीठिया के खिलाफ कार्रवाई को लेकर कई बार आवाज बुलंद की और कई बार विधानसभा में तल्खी भी हुई।

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