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नाटक में दिखाई कबीर के जन्म से साहित्यकार बनने की दास्तां
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़।
Updated Mon, 25 Apr 2016 11:48 AM IST
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लेखक शेखर सेन ने ही इसमें सोलो परफार्मेंस दी
- फोटो : amarujala
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कबीरा खड़ा बाजार में सबकी मांगे दुआ, न काहू से दोस्ती न काहू से बैर...। कबीर के इस दोहे और संगीतमयी धुन के बीच रविवार को चंडीगढ़ थिएटर फेस्टिवल के अंतिम दिन ‘कबीर’ नाटक का मंचन हुआ। इसके लेखक शेखर सेन ने ही इसमें सोलो परफार्मेंस दी। मूलरूप से अवधि भाषा में पेश किए नाटक में कबीर के जन्म से लेकर उनके साहित्यकार बनने तक की कहानी दोहों के जरिये बयां की गई है।
नाटक की कहानी शुरू होती है काशी के एक गांव से। जहां के एक जुलाहे नीरु को एक बच्चा नदी में बहकर आता हुआ मिलता है। वह उसे घर ले आता है। इसके बाद नीरु और उसकी पत्नी नीमा उसका पालन-पोषण करते हैं। वह बच्चा वहीं बड़ा होता है और आगे चलकर बनता है कबीर।
कबीर के दोहों व संगीतमयी धुन के बीच बताया गया कि मां की जिद पर जब कबीर लोई को विवाह कर घर लाए तो पता चला कि उनकी झोपड़ी जला दी गई है। इस पर कबीर ने अपनी पत्नी को बताया कि गरीब के घर तो खुशियां घर की झोपड़ी को जलाकर भी मनाई जाती है। इसे दर्शकों ने संजीदा किया तो वहीं एक डायलॉग ‘औरत जात का रोना और कुंभकर्ण का
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सोना’ अगर एक बार शुरू हो जाए तो बस रुकने का नाम हीं नहीं लेते...’ पर दर्शकों ने भी खूब तालियां भी बजाईं।
नाटक में कबीर जन्म से शुरू होकर उनके जीवन की हर घटना को प्रस्तुत किया गया। इसके जरिये कलाकार ने बताने की कोशिश की कि गरीबी अपने आप में अभिशाप नहीं है, वरन इसके लिए समाज के लोग ही जिम्मेदार हैं।
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नाटक की कहानी शुरू होती है काशी के एक गांव से। जहां के एक जुलाहे नीरु को एक बच्चा नदी में बहकर आता हुआ मिलता है। वह उसे घर ले आता है। इसके बाद नीरु और उसकी पत्नी नीमा उसका पालन-पोषण करते हैं। वह बच्चा वहीं बड़ा होता है और आगे चलकर बनता है कबीर।
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कबीर के दोहों व संगीतमयी धुन के बीच बताया गया कि मां की जिद पर जब कबीर लोई को विवाह कर घर लाए तो पता चला कि उनकी झोपड़ी जला दी गई है। इस पर कबीर ने अपनी पत्नी को बताया कि गरीब के घर तो खुशियां घर की झोपड़ी को जलाकर भी मनाई जाती है। इसे दर्शकों ने संजीदा किया तो वहीं एक डायलॉग ‘औरत जात का रोना और कुंभकर्ण का
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सोना’ अगर एक बार शुरू हो जाए तो बस रुकने का नाम हीं नहीं लेते...’ पर दर्शकों ने भी खूब तालियां भी बजाईं।
नाटक में कबीर जन्म से शुरू होकर उनके जीवन की हर घटना को प्रस्तुत किया गया। इसके जरिये कलाकार ने बताने की कोशिश की कि गरीबी अपने आप में अभिशाप नहीं है, वरन इसके लिए समाज के लोग ही जिम्मेदार हैं।