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कोरोना वायरस: पीजीआई में एमडब्ल्यू वैक्सीन का पहला फेज सफल, अभी लगेगा तीन माह का वक्त
Sun, 03 May 2020 01:16 PM IST
ajay kumar
वीणा तिवारी, अमर उजाला, चंडीगढ़
वीणा तिवारी, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: ajay kumar
Updated Sun, 03 May 2020 01:16 PM IST
सार
- पीजीआई डायरेक्ट ने दी जानकारी, कहा ट्रायल पूरा होने में लगता है 3 से 6 महीने का समय
- वैक्सीन के हानिकारक तत्व का प्रभाव जानने को किया गया ट्रायल सुरक्षित पूरा
- इससे पहले पीजीआई में पल्मोनरी सेप्सिस के मरीजों पर किया जा चुका है ट्रायल
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पीजीआई चंडीगढ़
- फोटो : फाइल फोटो
विस्तार
कोरोना को मात देने के लिए पीजीआई में माइकोबैक्टीरियम वैक्सीन (एमडब्ल्यू) पर शुरू किए गए ट्रायल का पहला फेज यानी सुरक्षा ट्रायल को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया है। यह वैक्सीन के ट्रायल का प्रथम चरण है। ऐसे कई चरणों से गुजरने के बाद इस वैक्सीन की कोरोना वायरस के इलाज में उपयोगिता सिद्ध हो पाएगी।
पीजीआई डायरेक्ट प्रो. जगतराम ने बताया कि ट्रायल पूरा होने में 3 से 6 महीने का समय लगता है। उम्मीद है कि पीजीआई इसे तीन महीने में पूरा कर लेगा। इसके सुरक्षा ट्रायल में जिन मरीजों पर इसका प्रभाव चेक किया गया है वह सभी सुरक्षित हैं, इसलिए ट्रायल को आगे जारी रखते हुए इसे 40 मरीजों पर शुरू करने की अनुमति दे दी गई है।
प्रो. जगतराम ने बताया कि आगे के ट्रायल में जिन 40 मरीजों को शामिल किया जाएगा, वो अगर पहले ठीक हो गए तो उन्हें डिस्चार्ज कर दिया जाएगा। लेकिन उनका लगातार फोलोअप लिया जाएगा ताकि वैक्सीन के परिणाम का सही आकलन हो सके।
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प्रो. जगतराम ने बताया कि इस वैक्सीन का प्रयोग पूर्व में पीजीआई के पल्मोनरी सेप्सिस (फेफड़े से जुड़ी गंभीर बीमारी) के मरीजों पर ट्रायल के रूप में सफल परीक्षण किया जा चुका है। इसके परिणाम संतोषजनक आए हैं इसलिए उम्मीद है कि कोरोना के इलाज में भी ये वैक्सीन कारगर साबित होगी। प्रो. जगतराम ने बताया कि इस वैक्सीन को कैडिला कंपनी बनाती है।
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पीजीआई डायरेक्ट प्रो. जगतराम ने बताया कि ट्रायल पूरा होने में 3 से 6 महीने का समय लगता है। उम्मीद है कि पीजीआई इसे तीन महीने में पूरा कर लेगा। इसके सुरक्षा ट्रायल में जिन मरीजों पर इसका प्रभाव चेक किया गया है वह सभी सुरक्षित हैं, इसलिए ट्रायल को आगे जारी रखते हुए इसे 40 मरीजों पर शुरू करने की अनुमति दे दी गई है।
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प्रो. जगतराम ने बताया कि आगे के ट्रायल में जिन 40 मरीजों को शामिल किया जाएगा, वो अगर पहले ठीक हो गए तो उन्हें डिस्चार्ज कर दिया जाएगा। लेकिन उनका लगातार फोलोअप लिया जाएगा ताकि वैक्सीन के परिणाम का सही आकलन हो सके।
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प्रो. जगतराम ने बताया कि इस वैक्सीन का प्रयोग पूर्व में पीजीआई के पल्मोनरी सेप्सिस (फेफड़े से जुड़ी गंभीर बीमारी) के मरीजों पर ट्रायल के रूप में सफल परीक्षण किया जा चुका है। इसके परिणाम संतोषजनक आए हैं इसलिए उम्मीद है कि कोरोना के इलाज में भी ये वैक्सीन कारगर साबित होगी। प्रो. जगतराम ने बताया कि इस वैक्सीन को कैडिला कंपनी बनाती है।
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सीएसआईआर की भी महत्वपूर्ण भूमिका
प्रो. जगतराम ने बताया कि देशभर में तेजी से बढ़ते कोरोना के मरीजों पर काबू पाने के लिए व्यापक स्तर पर बचाव व राहत कार्य किया जा रहा है लेकिन तीव्र परिणाम नहीं मिल रहा। ऐसे में इसके इलाज की व्यवस्था इजात करना जरूरी हो गया है। एमडब्ल्यू वैक्सीन को कोरोना के इलाज के लिए ट्रायल के रूप में प्रयोग किए जाने में सीएसआईआर की अहम भूमिका है। सरकार की तरफ से इस वैक्सीन के ट्रायल के लिए संबंधित कंपनी और चुने गए चिकित्सा संस्थानों के बीच सीएसआईआर अहम कड़ी है। उसके इनिसिएटिव पर ही यह ट्रायल संभव हो सका है।
रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में है कारगर
प्रो. जगतराम ने बताया कि एमडब्ल्यू वैक्सीन इम्युनो मोड्यूलेटर की श्रेणी में आती है। जिसके प्रयोग से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। कोरोना के मरीजों में कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता को इस वैक्सीन की मदद से तेजी से मजबूत करने में मदद मिलेगी। इसलिए वैक्सीन के ट्रायल के लिए कोरोना के ऐसे मरीजों का चयन किया गया है जिनकी स्थिति बेहद गंभीर है, ताकि इसके प्रभाव का सही आंकलन किया जा सके।
रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में है कारगर
प्रो. जगतराम ने बताया कि एमडब्ल्यू वैक्सीन इम्युनो मोड्यूलेटर की श्रेणी में आती है। जिसके प्रयोग से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। कोरोना के मरीजों में कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता को इस वैक्सीन की मदद से तेजी से मजबूत करने में मदद मिलेगी। इसलिए वैक्सीन के ट्रायल के लिए कोरोना के ऐसे मरीजों का चयन किया गया है जिनकी स्थिति बेहद गंभीर है, ताकि इसके प्रभाव का सही आंकलन किया जा सके।