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Chandigarh News: साधु परमेष्ठी की आराधना में गूंजा जैन मंदिर, 256 अर्घ्य किए समर्पित
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चंडीगढ़। सेक्टर-27 स्थित श्री दिगंबर जैन मंदिर में चल रहे अष्टान्हिका महापर्व के छठे दिन रविवार को श्रद्धालुओं ने साधु परमेष्ठी और सम्यक चारित्र की विशेष आराधना की। इस अवसर पर आयोजित श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान एवं शांति महायज्ञ में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया।
महापर्व के तहत सुबह भगवान का अभिषेक, शांतिधारा, नित्य पूजन और श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान की विधिवत पूजा-अर्चना की गई। इस दौरान भगवान को 256 अर्घ्य समर्पित किए गए। जैन धर्म में अष्टान्हिका महापर्व के छठे दिन को विशेष महत्व दिया जाता है, क्योंकि यह साधु परमेष्ठी और सम्यक चारित्र की आराधना को समर्पित माना जाता है।
जैन दर्शन के नवपद सिद्धांत के अनुसार अरिहंत, सिद्ध, आचार्य और उपाध्याय परमेष्ठी की आराधना के बाद छठे दिन साधु परमेष्ठी की विशेष पूजा की जाती है। साधु परमेष्ठी त्याग, तप, संयम और आत्मानुशासन के प्रतीक माने जाते हैं। उनका जीवन अनुशासित और मर्यादित आचरण की प्रेरणा देता है। मंदिर कमेटी के प्रधान धर्म बहादुर जैन और महासचिव संत कुमार जैन ने बताया कि श्रद्धालुओं ने अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह जैसे जैन सिद्धांतों को जीवन में अपनाने का संकल्प लिया। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन पूजा, आराधना और ध्यान से चारित्र मोहनीय कर्मों के क्षय की भावना जागृत होती है, जो आत्मशुद्धि और मोक्ष मार्ग की ओर बढ़ने की प्रेरणा देती है।
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महापर्व के तहत सुबह भगवान का अभिषेक, शांतिधारा, नित्य पूजन और श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान की विधिवत पूजा-अर्चना की गई। इस दौरान भगवान को 256 अर्घ्य समर्पित किए गए। जैन धर्म में अष्टान्हिका महापर्व के छठे दिन को विशेष महत्व दिया जाता है, क्योंकि यह साधु परमेष्ठी और सम्यक चारित्र की आराधना को समर्पित माना जाता है।
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जैन दर्शन के नवपद सिद्धांत के अनुसार अरिहंत, सिद्ध, आचार्य और उपाध्याय परमेष्ठी की आराधना के बाद छठे दिन साधु परमेष्ठी की विशेष पूजा की जाती है। साधु परमेष्ठी त्याग, तप, संयम और आत्मानुशासन के प्रतीक माने जाते हैं। उनका जीवन अनुशासित और मर्यादित आचरण की प्रेरणा देता है। मंदिर कमेटी के प्रधान धर्म बहादुर जैन और महासचिव संत कुमार जैन ने बताया कि श्रद्धालुओं ने अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह जैसे जैन सिद्धांतों को जीवन में अपनाने का संकल्प लिया। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन पूजा, आराधना और ध्यान से चारित्र मोहनीय कर्मों के क्षय की भावना जागृत होती है, जो आत्मशुद्धि और मोक्ष मार्ग की ओर बढ़ने की प्रेरणा देती है।
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