देश को पहला आईबैंक देने वाले डाक्टर का निधन, ऐसी थी शख्सियत
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पीजीआई के पूर्व प्रोफेसर व जाने माने नेत्र विशेषज्ञ आईएस जैन का दुनिया से जाना देश के लिए एक भारी क्षति है। उनके जैसा आई सर्जन आज तक दुनिया ने नहीं देखा।
किसी भी बीमारी की पहचान के लिए वर्तमान में डाक्टर कई सारे टेस्ट कराते हैं, उसके बाद ही नतीजे पर पहुंचते हैं, लेकिन प्रोफेसर जैन 70 के दशक में ही पहचान जाते थे कि मरीज को क्या बीमारी है। उन्हें किसी भी टेक्नोलाजी की जरूरत नहीं पड़ती थी।
मर्ज पहचानने की जो क्षमता उनमें थी, वो किसी दूसरे में नहीं थीं। उन्होंने 70 के दशक में ही कह दिया था कि जिनकी आंखों का नंबर माइनस पांच से ऊपर है और साथ में डायबिटिक पेशेंट है तो उससे उसकी रेटिना पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। उनकी इस खोज को 50 साल बाद भी कोई चैलेंज नहीं कर पाया।
डाक्टर उनको देखकर ही अपनी घड़ी का समय मिलाते थे
आईएस जैन समय के पूरे पक्के थे। आठ बजने में जब दस मिनट बाकी होता था, तभी वे दफ्तर पहुंच जाते थे। डाक्टर उनको देखकर अपनी घड़ी का समय ठीक करते थे।
पहला कोर्निया ट्रांसप्लांट किया, आईबैंक भी बनाया
कभी भी वे लिफ्ट का इस्तेमाल नहीं करते थे। पांचवीं मंजिल पर जाने के लिए वे रैंप का ही इस्तेमाल करते थे। जब भी कैंप लगता था, वे खुद जाते थे।
पूरे समर्पण के साथ कैंप में मरीजों का इलाज करते थे। कभी भी उन्होंने अमीर-गरीब में फर्क नहीं किया। देश के बड़े-बड़े लोग उनके मरीज थे तो गरीब से गरीब व्यक्ति भी उनका मरीज था।
पहला कोर्निया ट्रांसप्लांट किया, आईबैंक भी बनाया
पढ़ाई, टीचिंग, रिसर्च और पेशेंट केयर के क्षेत्र में वे अव्वल रहे हैं। 300 से ज्यादा उनके रिसर्च पेपर देश व विदेश के नंबर वन जनरल में प्रकाशित हुए।
देश में पहला कोर्निया ट्रांसप्लांट प्रोफेसर जैन ने किया। देश में पहले आईबैंक की स्थापना भी उन्होंने ने की थी। जब आई बैंक नहीं था, तो उस दौरान जैसे ही उन्हें पता चलता था कि मरीज का कोर्निया ट्रांसप्लांट होना है तो वे तुरंत पीजीआई पहुंच जाते थे।
गोल्ड मैडलिस्ट पाने में नंबर वन
रात-रात भर वे आपरेशन थियेटर में रहते थे। रात के वक्त कई आपरेशनों में मैं भी उनके साथ रहा हूं। मरीजों और उनके लिए जो जुनून उनमें था, वो शायद ही किसी में मैंने देखा हो।
गोल्ड मैडलिस्ट पाने में नंबर वन
वे शुरू से ही पढ़ाई में काफी होशियार थे। 1952 में लखनऊ के किंग जार्ज मेडिकल कालेज से एमबीबीएस की डिग्री हासिल की। उन्होंने प्रोफेशनल एग्जाम के सबसे उच्चतम हेविट गोल्ड मेडल हासिल किया।
सर्जरी के क्षेत्र में सेल्बी गोडल मेडल, आनंद लाल गुर्टू, मेमोरियल गोल्ड मेडल, राज बहादुर चौबे शंभूनाथ मिश्रा गोल्ड मेडल और बाली हेंडो गोल्ड मेडल भी हासिल किया।
उन्हें विश्व के सर्वोच्च डाक्टरों के साथ काम करने का मौका भी मिला। 1961 से उन्होंने पीजीआई में कैरियर की शुरुआत की थी। उनके जाने से न सिर्फ मैं दुखी हूं, बल्कि उन हजारों मरीजों की भी आंखें नम हुईं, जिन्होंने प्रोफेसर जैन के माध्यम से दोबारा दुनिया को देखा।