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सरहदी गावों के लोगों का जज्बा- 'हम 65 और 71 की जंग में चट्टान की तरह खड़े, अब क्यों छोड़ेंगे घर'

Thu, 28 Feb 2019 09:25 AM IST
खुशबू गोयल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अटारी बार्डर/तरनतारन (अमृतसर)
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अटारी बार्डर/तरनतारन (अमृतसर) Published by: खुशबू गोयल Updated Thu, 28 Feb 2019 09:25 AM IST
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Tension in border villages of Punjab after Air strike in Pok
सीमावर्ती गांवों में इकट्ठा ग्रामीण

पाकिस्तान पर एयर स्ट्राइक के बाद सीमा पर लगे गांवों में तनाव भरी शांति है। यहां सेना लगातार अपनी गतिविधियां बढ़ा रही है। इसके बावजूद ग्रामीण निडर और पूरे जोश में हैं। गांव के लोगों का कहना है कि वे चट्टान की तरह खड़े हैं। उन्होंने 1965 व 1971 की जंग में अपने घर नहीं छोड़े, अब क्या वह छोड़ेंगे। वे बुधवार को भी कंटीली तार पार कर अपने खेतों में काम करने गए। 

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अटारी में ही 35 गांव पाकिस्तान की सीमा से सटे हैं। ऐसे ही एक गांव घरिंडी के रहने वाले सतबीर का कहना है कि युद्ध वाली बात तो हमारे यहां नहीं है और न ही कोई भयभीत है। रोज की तरह लोग अपने कामकाज कर रहे हैं। गांव के सरपंच सर्बजीत का कहना है कि हमने तो 1965 और 1971 के युद्ध देखे हैं। पाकिस्तान से तनाव तो हर साल होता है, यह उनकी जिंदगी का हिस्सा है। इससे किस बात का डरना। 
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गांव मावा के काला सिंह का कहना है कि गांव के लोगों का आपस में पूरा तालमेल है और हम लोग सेना के साथ खड़े हैं। पहले हमारा देश है, फिर हम। अगर युद्ध होता है तो हम खुद सेना के साथ खड़े होंगे। गांव के लोग एकजुट हैं और कोई भी मुसीबत आती है तो सभी एक मंच पर आ जाते हैं। गांव गल्लूवाला के निशान सिंह का भी कहना है कि हमारे यहां कोई तनाव नहीं है। अभी सरकार की तरफ से कोई आदेश नहीं आया है कि गांवों को खाली किया जाए।

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‘बदला जरूरी था, जंग की भी फिक्र नहीं’

Tension in border villages of Punjab after Air strike in Pok

वायुसेना की ओर से बालाकोट में की गई एयर सर्जिकल स्ट्राइक से सीमा के गांवों में खुशी की लहर है। ग्रामीणों का कहना है कि वे हर स्थिति में भारत के साथ हैं। स्ट्राइक के बाद पाकिस्तान गीदड़भभकी दे रहा है और यह झेंप मिटाने की उसकी बचकाना हरकत है। भारत-पाक सीमा पर तरनतारन के सीमावर्ती गांव खेमकरण, मेहंदीपुर के लोगों ने 1971 की जंग भी देखी। 

यह गांव सीमा के पास देश का पहला गांव है। यहां लोगों ने वायुसेना की इस कार्रवाई की तारीफ की। एक हजार आबादी वाले इस गांव के लोगों ने कहा कि पाकिस्तान को आतंकवाद का साथ देने के लिए सबक सिखाना जरूरी है। मेहंदीपुर के किसान सतनाम ने बताया कि वे लोग कई बार उजड़े और बसे। आज एक बार फिर उन्हें डर सताने लगा है।

पता नहीं सरकार कब उन्हें अपना जरूरी सामान उठा कर गांव छोड़ने के आदेश दे दे। लेकिन, हम हर हाल में देश के साथ हैं और सेना के कंधे से कंधा मिलाकर सेना का साथ देंगे। अंतरराष्ट्रीय सीमा से करीब पांच किलोमीटर दूर खेमकरण निवासी बलदेव सिंह ने बताया कि पीओके में एयर सर्जिकल स्ट्राइक के बाद गांव के लोग सहमे हैं। लेकिन खुशी है कि हमने पाकिस्तान से बदला ले लिया। 

सीमांत गांवों के लोगों ने 1965, 1971 और 1999 के युद्ध देखे हैं। हर युद्ध ने उन्हें बर्बादी दी है, लेकिन पाकिस्तान के दुस्साहस को जवाब देने के लिए वह देश के साथ हैं। गांव सिधवा के सरताज सिंह, गुरप्रीत सिंह ने कहा कि सीमा पर माहौल को देखते हुए गांव में बैठक कर हर घर से एक सदस्य को रात के समय जागने के लिए कहा गया है। ताकि किसी भी परिस्थिति में उनके परिवार सुरक्षित रह सकें। 

वहीं, कंटीली तारों के पास बीओपी पर तैनात बीएसएफ जवानों से भी बात की तो उन्होंने सब ठीक होने की बात कही। ग्रामीणों ने बताया कि युद्ध का सबसे ज्यादा प्रभाव सीमांत गांवों के लोगों पर होता है। परंतु पाकिस्तानी आतंकवाद को कुचलने के लिए गांव के लोग हर कीमत अदा करने के लिए तैयार हैं। बीएसएफ ने भारत-पाक अंतरराष्ट्रीय सीमा पर फेंसिंग के पार किसानों के खेतों में जाने की इजाजत नहीं दी। खेमकरण के दिलजिंदर सिंह, सेवा सिंह, हरपाल सिंह  ने बताया कि सुरक्षा कारणों से ऐसा किया गया।

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