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शिक्षक दिवस पर पढ़ें 8 लोगों की कहानी, टीचरों ने बदली जिनकी जिंदगानी...कुछ यूं सांझा की यादें
Thu, 05 Sep 2019 11:21 AM IST
खुशबू गोयल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: खुशबू गोयल
Updated Thu, 05 Sep 2019 11:21 AM IST
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छात्रों को शिक्षा दान देते गुरु
- फोटो : फाइल फोटो
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शिक्षक दिवस के मौके पर हम आपको सुना रहे हैं ऐसे 8 लोगों कहानी, जिनकी जिंदगी उनके टीचरों की वजह से बदली और आज वे उस मुकाम पर हैं, जिनके वे सिर्फ सपने देखते थे।
मैं आज जो भी हूं, गुरु की वजह से हूं
मैं आज जो भी हूं, अपने गुरु के आशीर्वाद से ही हूं। मेरे गुरु मेरे पिता रणजीत सिंह सहगल चंडीगढ़ में शिक्षक थे। इतना ही नहीं उन्होंने अपनी आखिरी सांस भी सेक्टर-16 मॉडल में बच्चों को पढ़ाते हुए ली थी। यह बात पंजाब स्टेट फारेंसिक लैब के असिस्टेंट डायरेक्टर व पंतगबाजी में देश दुनिया में देश का नाम रोशन कर चुके डॉ. दविंदर पाल सिंह सहगल ने कही।
उन्होंने बताया कि मेरी पत्नी भी मेरे पिता जी से पढ़ी है। एक समय था कि जब शिक्षकों को वेतन काफी कम हुआ था। उस समय में भी उनके पिता ने उन्हें बड़े ही अच्छे तरीके से पढ़ाया। इसी के चलते मैं और मेरे भाई अच्छे मुकाम हासिल कर पाए है।
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उनके पिता सेक्टर-22 मॉडल और सेक्टर-16 के मॉडल में पढ़ा चुके हैं। वह अंग्रेजी और सामाजिक पढ़ाते थे। उनके पढ़ाए हुए कई लोग आज आईएएस व आईपीएस अधिकारी हैं। उन्हें भी इस बात का गर्व महसूस होता है। वह हमेशा ही उन्हें मेहनत करने की नसीहत देते थे।
डॉ. दविंदर बना चुके हैं सुई की नोक से पतंग निकालने का रिकॉर्ड
बता दें कि डॉ दविंदर पाल सिंह हर राष्ट्रीय दिवस पर पतंग बनाते हैं। उन्होंने सुई की नोक से पतंग निकालकर एक रिकॉर्ड बनाया हुआ। उनका नाम लिम्का बुक ऑफ रिकॉडर्स में दर्ज है।
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मैं आज जो भी हूं, गुरु की वजह से हूं
मैं आज जो भी हूं, अपने गुरु के आशीर्वाद से ही हूं। मेरे गुरु मेरे पिता रणजीत सिंह सहगल चंडीगढ़ में शिक्षक थे। इतना ही नहीं उन्होंने अपनी आखिरी सांस भी सेक्टर-16 मॉडल में बच्चों को पढ़ाते हुए ली थी। यह बात पंजाब स्टेट फारेंसिक लैब के असिस्टेंट डायरेक्टर व पंतगबाजी में देश दुनिया में देश का नाम रोशन कर चुके डॉ. दविंदर पाल सिंह सहगल ने कही।
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उन्होंने बताया कि मेरी पत्नी भी मेरे पिता जी से पढ़ी है। एक समय था कि जब शिक्षकों को वेतन काफी कम हुआ था। उस समय में भी उनके पिता ने उन्हें बड़े ही अच्छे तरीके से पढ़ाया। इसी के चलते मैं और मेरे भाई अच्छे मुकाम हासिल कर पाए है।
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उनके पिता सेक्टर-22 मॉडल और सेक्टर-16 के मॉडल में पढ़ा चुके हैं। वह अंग्रेजी और सामाजिक पढ़ाते थे। उनके पढ़ाए हुए कई लोग आज आईएएस व आईपीएस अधिकारी हैं। उन्हें भी इस बात का गर्व महसूस होता है। वह हमेशा ही उन्हें मेहनत करने की नसीहत देते थे।
डॉ. दविंदर बना चुके हैं सुई की नोक से पतंग निकालने का रिकॉर्ड
बता दें कि डॉ दविंदर पाल सिंह हर राष्ट्रीय दिवस पर पतंग बनाते हैं। उन्होंने सुई की नोक से पतंग निकालकर एक रिकॉर्ड बनाया हुआ। उनका नाम लिम्का बुक ऑफ रिकॉडर्स में दर्ज है।
गुरु ने सिखाया, बच्चों को पीटकर अपनी ही गलती को छुपाता है शिक्षक
मैंने 14 साल पढ़ाया लेकिन किसी स्टूडेंट पर हाथ उठाने की जरूरत नहीं पड़ी। कारण था, गुरु द्वारा दी गई शिक्षा। यह कहना है चंडीगढ़ शिक्षा विभाग के पूर्व डिप्टी डायरेक्टर चंचल सिंह का। चंचल सिंह 14 साल अध्यापक, डिप्टी डीईओ, डीईओ और डिप्टी डायरेक्टर केे पद पर काम कर चुके हैं। उन्हें चंडीगढ़ प्रशासन लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड से भी सम्मानित कर चुका है। चंचल सिंह ने बताया कि स्कूली दिनों के दो शिक्षकों वो वह जिंदगी भर नहीं भूल पाए। उनके द्वारा दिए गए मत्रों का पालन किया और इस मुकाम पर पहुंचे।
स्कूली शिक्षा को याद करते हुए उन्होंने बताया कि वर्ष 1971 में जब वो नौवीं कक्षा में थे तो मास्टर जोध सिंह की दी गई शिक्षा से काफी प्रभावित था। उन्होंने बच्चों पर कभी हाथ नहीं उठाया। वह कहते थे कि अगर कोई शिक्षक किसी बच्चे को पीटता है तो वह अपनी कमियां छुपाने के लिए ऐसा करता है। क्योंकि यह उसकी कमजोरी है। जो चीज शिक्षक को अपनी जीभ के माध्यम से सिखानी चाहिए, उसे वह हाथ के माध्यम से सिखाने का प्रयास करता है।
गुरु जोध सिंह ने सिखाया कि किसी भी बच्चे को पढ़ाने से पहले उसे समझने की जरूरत होती है, तभी एक शिक्षक किसी छात्र को बेहतर बना सकता है। चंचल सिंह ने अपने शिक्षक जसवंत सिंह का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि जिस पियर लर्निंग की आज बात होती है, उनके टीचर उस समय में इसी के माध्यम से पढ़ाई कराते थे। पदों पर रहते हुए, कई बार सेमिनारों में जसवंत सिंह के पढ़ाने के तरीके के बारे में सभी को बताया। चंचल सिंह ने बताया कि शिक्षक दिवस का दिन मास्टर जोध सिंह और जसवंत सिंह को याद किए बगैर अधूरा है।
स्कूली शिक्षा को याद करते हुए उन्होंने बताया कि वर्ष 1971 में जब वो नौवीं कक्षा में थे तो मास्टर जोध सिंह की दी गई शिक्षा से काफी प्रभावित था। उन्होंने बच्चों पर कभी हाथ नहीं उठाया। वह कहते थे कि अगर कोई शिक्षक किसी बच्चे को पीटता है तो वह अपनी कमियां छुपाने के लिए ऐसा करता है। क्योंकि यह उसकी कमजोरी है। जो चीज शिक्षक को अपनी जीभ के माध्यम से सिखानी चाहिए, उसे वह हाथ के माध्यम से सिखाने का प्रयास करता है।
गुरु जोध सिंह ने सिखाया कि किसी भी बच्चे को पढ़ाने से पहले उसे समझने की जरूरत होती है, तभी एक शिक्षक किसी छात्र को बेहतर बना सकता है। चंचल सिंह ने अपने शिक्षक जसवंत सिंह का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि जिस पियर लर्निंग की आज बात होती है, उनके टीचर उस समय में इसी के माध्यम से पढ़ाई कराते थे। पदों पर रहते हुए, कई बार सेमिनारों में जसवंत सिंह के पढ़ाने के तरीके के बारे में सभी को बताया। चंचल सिंह ने बताया कि शिक्षक दिवस का दिन मास्टर जोध सिंह और जसवंत सिंह को याद किए बगैर अधूरा है।
शिक्षक ने अनुशासन का ऐसा पाठ पढ़ाया कि आईपीएस बने चहल
स्कूल में शिक्षक ने अनुशासन का ऐसा पाठ पढ़ाया कि कुलदीप सिंह चहल आईपीएस अधिकारी बन इस समय मोहाली में बतौर एसएसपी अपनी सेवाएं दे रहे हैं। तब और अब के तरीके में आए बदलाव को वह समय के साथ आगे बढ़ने वाला मानते हैं। हालांकि वह मानते हैं कि उनकी स्कूल के समय शिक्षकों का जैसा मान-सम्मान था, वैसा आज देखने में नहीं आता। अपने स्कूल के दिनों को याद करते हुए एसएसपी कुलदीप सिंह चहल बताते हैं कि तब शिक्षक का दर्जा काफी ऊंचा था। शिक्षक की कही बात विद्यार्थियों के लिए पत्थर की लकीर हुआ करती थी।
विद्यार्थियों में अनुशासन की भावना पैदा करने के लिए शिक्षक गंभीर रहते थे। तब अनुशासन को ज्यादा महत्व दिया जाता था। अभिभावक भी शिक्षक की बात को महत्व देते थे और बच्चे के भविष्य के लिए उन्हें ही बेहतर मार्गदर्शक माना जाता था। चहल बताते हैं कि उनके शिक्षक अनुशासन को लेकर उतने ही सजग थे जितने पढ़ाई को लेकर। लिहाजा प्राइमरी से ही स्कूल में अनुशासन का ऐसा पाठ पढ़ा कि हर काम को समय पर करने की आदत आज भी बरकरार है।
स्कूल में सीखे इस अनुशासन के साथ ही की गई पढ़ाई के बूते वह सिविल सर्विसिज का एग्जाम पास कर आईपीएस बनने में कामयाब हो सके। वह अपनी कामयाबी को अपने शिक्षक को समर्पित करते हैं। शिक्षक ने अगर उन्हें चुनौतियों का सामना करने के काबिल न बनाया होता तो वह आज इस मुकाम तक न पहुंच पाते।
विद्यार्थियों में अनुशासन की भावना पैदा करने के लिए शिक्षक गंभीर रहते थे। तब अनुशासन को ज्यादा महत्व दिया जाता था। अभिभावक भी शिक्षक की बात को महत्व देते थे और बच्चे के भविष्य के लिए उन्हें ही बेहतर मार्गदर्शक माना जाता था। चहल बताते हैं कि उनके शिक्षक अनुशासन को लेकर उतने ही सजग थे जितने पढ़ाई को लेकर। लिहाजा प्राइमरी से ही स्कूल में अनुशासन का ऐसा पाठ पढ़ा कि हर काम को समय पर करने की आदत आज भी बरकरार है।
स्कूल में सीखे इस अनुशासन के साथ ही की गई पढ़ाई के बूते वह सिविल सर्विसिज का एग्जाम पास कर आईपीएस बनने में कामयाब हो सके। वह अपनी कामयाबी को अपने शिक्षक को समर्पित करते हैं। शिक्षक ने अगर उन्हें चुनौतियों का सामना करने के काबिल न बनाया होता तो वह आज इस मुकाम तक न पहुंच पाते।
प्राइमरी शिक्षक की काउंसलिंग से आज प्रिंसिपल हैं हरीश कुमारी
प्राइमरी स्कूल में बुजुर्ग शिक्षक की महज 2-3 मिनट की काउंसलिंग ने ऐसी दिशा दी कि हरीश कुमारी आज मोहाली के खालसा कॉलेज में प्रिंसिपल हैं। उनके माता-पिता दोनों ही टीचर थे। अपनी स्कूल के दिनों को वह एक बेहतर वक्त मानती हैं। हालांकि 25 साल पहले के दौर और मौजूदा समय के एजुकेशन सिस्टम में खालसा कॉलेज की प्रिंसिपल बड़ा अंतर देखती हैं।
प्रिंसिपल पिता व लेक्चरर मां की संतान हरीश कुमारी कहती हैं कि जब हम स्कूल में थे तब शिक्षक की बात पर कोई शक नहीं होता था। शिक्षक भी अपने पेशे को महज रोजी-रोटी का साधन न मान कर इसे समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझते थे। उस समय के शिक्षक समाज के निर्माण में अपनी भूमिका को बाखूबी समझते व निभाते थे।
आज के शिक्षक अपने हकों को लेकर तो पूरी तरह जागरूक हैं, लेकिन शिक्षकों के सम्मान के प्रति गंभीर नहीं हैं। लगातार गिरती नैतिकता के कारण समाज में भी टीचिंग के नोबेल प्रोफेशन के प्रति सम्मान घटा है। इसकी बड़ी वजह प्राइवेट स्कूलों की तादाद बढ़ना है। आज पेरेंट्स भी नंबर गेम में फंसे हैं, जिससे टीचर्स को अपनी सेल्फ रिस्पेक्ट बचाना मुश्किल होता जा रहा है।
दूसरी-तीसरी में क्लास बंक करती थी, मैडम के समझाने पर छोड़ी आदत
प्रिंसिपल हरीश कुमारी के मन पर उनकी एक प्राइमरी शिक्षक की ऐसी छाप है जिसे वह आज तक नहीं भुला पाईं। वह बताती हैं कि जब वह दूसरी या तीसरी में पढ़ती थीं, तो स्कूल में बहुत शरारतें किया करती थीं। अक्सर किसी न किसी बहाने गायब हो जाया करतीं। उनकी एक बुजुर्ग मैडम ज्ञान कौर उनकी इन हरकतों को नोट करतीं। एक दिन उन्होंने उसकी महज 2 से 3 मिनट की काउंसलिंग की। उस दिन के बाद उन्होंने फिर कभी क्लास से बंक नहीं मारा।
प्रिंसिपल पिता व लेक्चरर मां की संतान हरीश कुमारी कहती हैं कि जब हम स्कूल में थे तब शिक्षक की बात पर कोई शक नहीं होता था। शिक्षक भी अपने पेशे को महज रोजी-रोटी का साधन न मान कर इसे समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझते थे। उस समय के शिक्षक समाज के निर्माण में अपनी भूमिका को बाखूबी समझते व निभाते थे।
आज के शिक्षक अपने हकों को लेकर तो पूरी तरह जागरूक हैं, लेकिन शिक्षकों के सम्मान के प्रति गंभीर नहीं हैं। लगातार गिरती नैतिकता के कारण समाज में भी टीचिंग के नोबेल प्रोफेशन के प्रति सम्मान घटा है। इसकी बड़ी वजह प्राइवेट स्कूलों की तादाद बढ़ना है। आज पेरेंट्स भी नंबर गेम में फंसे हैं, जिससे टीचर्स को अपनी सेल्फ रिस्पेक्ट बचाना मुश्किल होता जा रहा है।
दूसरी-तीसरी में क्लास बंक करती थी, मैडम के समझाने पर छोड़ी आदत
प्रिंसिपल हरीश कुमारी के मन पर उनकी एक प्राइमरी शिक्षक की ऐसी छाप है जिसे वह आज तक नहीं भुला पाईं। वह बताती हैं कि जब वह दूसरी या तीसरी में पढ़ती थीं, तो स्कूल में बहुत शरारतें किया करती थीं। अक्सर किसी न किसी बहाने गायब हो जाया करतीं। उनकी एक बुजुर्ग मैडम ज्ञान कौर उनकी इन हरकतों को नोट करतीं। एक दिन उन्होंने उसकी महज 2 से 3 मिनट की काउंसलिंग की। उस दिन के बाद उन्होंने फिर कभी क्लास से बंक नहीं मारा।
गुरु की एक सीख से बनी मेरी जिंदगी
मेरी जिंदगी मेरे गुरु का अहम रोल है। एक समय मेरे जीवन में ऐसा आ गया था कि मैं समझ नहीं पा रहा था कि आखिरी में क्या करूं। उस समय उन्होंने हालातों से लड़ने के लिए ऐसा मंत्र दिया कि आज मैं एक सफल मोटिवेटर स्पीकर हूं। यह बात 27 साल कारपोरेट जगत में विभिन्न पदों पर काम कर चुके गिरीश आनंद ने कही। आज मैं जो भी हूं। अपने गुरु की वजह से हूं। वहीं, जब भी मुझे समय मिलता है तो मैं उनसे मिलने के लिए दिल्ली जाता हूं। वहीं, आज भी जब उनके मार्गदर्शन की जरूरत होती तो उन्हें फोन कर लेता हूं।
गिरीश ने बताया कि एक समय उनके जीवन में ऐसा आया था कि वह समझ नहीं पा रहा थे कि वह अपने करियर के ग्राफ को आगे कैसे बढ़ाएं। हालात भी खराब होते जा रहे थे। इसी बीच मैं अपने पहले बॉस व गुरु योगेश चोपड़ा से मिला। उनके सामने मैंने अपनी सारी बात रखी। पहले वह मेरी बात को काफी ध्यान से सुनते रहे। आखिर में उन्होंने मुझे कहा कि हालातों से लड़ो व आगे बढ़ो। भगवान आपके जीवन में जो भी हालात लेकर आया है, वह आपके भले के लिए ही है। अपने पैशन को प्रोफेशन बना लो। यह सुनते ही उन्हें दिमाग आया कि वह ट्रेनिंग देने का शौक है।
इसके बाद उन्होंने तुरंत मोटिवेशनल स्पीकर की राह चुन ली। वह छोटे बच्चों से लेकर आईएएस की परीक्षा में अपीयर होने वाले को ट्रेनिंग दे रहे है। इससे जहां उन्हें ख्याति मिल रही है, वहीं सारी समस्याएं भी खत्म हो गई है। वहीं, आज वह जीवन की समस्याओं में फंसे उन जैसे कई युवाओं को सही राह दिखाते हैं।
गिरीश ने बताया कि एक समय उनके जीवन में ऐसा आया था कि वह समझ नहीं पा रहा थे कि वह अपने करियर के ग्राफ को आगे कैसे बढ़ाएं। हालात भी खराब होते जा रहे थे। इसी बीच मैं अपने पहले बॉस व गुरु योगेश चोपड़ा से मिला। उनके सामने मैंने अपनी सारी बात रखी। पहले वह मेरी बात को काफी ध्यान से सुनते रहे। आखिर में उन्होंने मुझे कहा कि हालातों से लड़ो व आगे बढ़ो। भगवान आपके जीवन में जो भी हालात लेकर आया है, वह आपके भले के लिए ही है। अपने पैशन को प्रोफेशन बना लो। यह सुनते ही उन्हें दिमाग आया कि वह ट्रेनिंग देने का शौक है।
इसके बाद उन्होंने तुरंत मोटिवेशनल स्पीकर की राह चुन ली। वह छोटे बच्चों से लेकर आईएएस की परीक्षा में अपीयर होने वाले को ट्रेनिंग दे रहे है। इससे जहां उन्हें ख्याति मिल रही है, वहीं सारी समस्याएं भी खत्म हो गई है। वहीं, आज वह जीवन की समस्याओं में फंसे उन जैसे कई युवाओं को सही राह दिखाते हैं।
टीचर में सिखाया- किसी का नुकसान न करो, जिंदगी भर इसी पथ पर चला
आठवीं कक्षा में एक घटना घटी, जिसके बाद टीचर ने समझाया कि किसी का नुकसान कभी नहीं करना चाहिए। इस बात को मैंने मंत्र बना लिया और पूरे समय इसी पथ पर चला। यह कहना है शहर के पूर्व मेयर अरुण सूद का। उन्होंने शिक्षक दिवस के मौके पर स्कूल की यादों को साझा किया। सूद ने शहर के जीएमएसएसएस-37 से पढ़ाई की है। अरुण सूद ने बताया कि वर्ष 1987 में उन्होंने जीएमएसएसएस-37 से 8वीं की पढ़ाई की थी। बताया कि वह शुरू से पढ़ाई में अच्छे थे, इसलिए शिक्षक उन्हें पसंद करते थे।
एक दोस्त था, जो पढ़ाई में काफी कमजोर था। एक परीक्षा के दौरान उन्होंने दोस्त को पेपर दिखाया, दोस्त ने देखकर सभी जवाब लिख दिए। चेकिंग करते वक्त टीचर को पता लग गया कि नकल हुई है लेकिन टीचर चंद्रकांता ने दोस्त के नंबर काटने की बजाय उनके नंबर काट लिए। जब रिजल्ट आया तो वह काफी हैरान हुए कि पेपर तो अच्छा हुआ था, फिर नंबर कम क्यों आए। वह पूछने गए तो टीचर ने उन्हें समझाया कि नकल कराकर वह दोस्त की मदद नहीं बल्कि उसका नुकसान कर रहे थे।
उस दिन उन्होंने कहा कि कभी भी किसी का नुकसान नहीं करना, कोई नहीं कर पा रहा है तो उसको समझाओ, उसे प्रेरित करो लेकिन उसे शॉर्टकट का रास्ता मत दिखाओ। अरुण सूद ने बताया कि उनके एक मैथ्स के चौधरी सर थे, जिनसे उन्होंने बहुत कुछ सीखा। मैथ्स में 100 नंबर आने के बाद भी मास्टर चौधरी उन्हें डांट देते थे तो एक दिन उन्होंने टीचर से इसके पीछे का कारण पूछ ही लिया। मास्टर चौधरी ने कहा कि वह नहीं चाहते कि छात्र अपनी एनर्जी किसी गलत काम में लगाए, इसलिए हमेशा टोकते रहते हैं। इस बात सुनकर सूद ने पैर स्पर्श किए और आशीर्वाद लिया।
एक दोस्त था, जो पढ़ाई में काफी कमजोर था। एक परीक्षा के दौरान उन्होंने दोस्त को पेपर दिखाया, दोस्त ने देखकर सभी जवाब लिख दिए। चेकिंग करते वक्त टीचर को पता लग गया कि नकल हुई है लेकिन टीचर चंद्रकांता ने दोस्त के नंबर काटने की बजाय उनके नंबर काट लिए। जब रिजल्ट आया तो वह काफी हैरान हुए कि पेपर तो अच्छा हुआ था, फिर नंबर कम क्यों आए। वह पूछने गए तो टीचर ने उन्हें समझाया कि नकल कराकर वह दोस्त की मदद नहीं बल्कि उसका नुकसान कर रहे थे।
उस दिन उन्होंने कहा कि कभी भी किसी का नुकसान नहीं करना, कोई नहीं कर पा रहा है तो उसको समझाओ, उसे प्रेरित करो लेकिन उसे शॉर्टकट का रास्ता मत दिखाओ। अरुण सूद ने बताया कि उनके एक मैथ्स के चौधरी सर थे, जिनसे उन्होंने बहुत कुछ सीखा। मैथ्स में 100 नंबर आने के बाद भी मास्टर चौधरी उन्हें डांट देते थे तो एक दिन उन्होंने टीचर से इसके पीछे का कारण पूछ ही लिया। मास्टर चौधरी ने कहा कि वह नहीं चाहते कि छात्र अपनी एनर्जी किसी गलत काम में लगाए, इसलिए हमेशा टोकते रहते हैं। इस बात सुनकर सूद ने पैर स्पर्श किए और आशीर्वाद लिया।
आज पढ़ाई में पदार्थवाद ने ली सिद्धांत की जगह
समय के साथ हर चीज बदलती है। शिक्षा प्रणाली पर भी इसका असर पड़ा है। ज्यादा आबादी ने देश की शिक्षा प्रणाली को नुकसान पहुंचाया है। वर्तमान में पढ़ाई में सिद्धांत की जगह पदार्थवाद हावी हो गया है। जब हम छात्र थे तब शिक्षकों के साथ वन-टू-वन संबंध होता था। यह कहना है गवर्नमेंट कॉलेज मोहाली की प्रिंसिपल कोमल बरोका का।
मेरी प्राथमिक शिक्षा पटियाला के लेडी फातिमा मॉडल स्कूल में हुई। उस समय छात्र और शिक्षक के बीच अच्छा रिश्ता होता था। शिक्षक मेहनती होते थे। वे अपने छात्र के सर्वपक्षीय विकास के लिए काम करते थे। आज स्कूलों की संख्या में इजाफा भले ही हो गया है, लेकिन शिक्षा का स्तर नीचे आया है। शिक्षक की छवि भी अब पहले जैसी नहीं रही।
हमारे टीचर्स हमारे रोल मॉडल थे। अभिभावकों ने सिखाया था कि स्कूल एक मंदिर है, जिसका पूरा सम्मान किया जाना चाहिए। उनकी उच्च शिक्षा हिमाचल के सेक्रेड हार्ट कॉलेज डल्हौजी से हुई। अपनी प्रिंसिपल के साथ रिश्ते को आज भी वह भुला नहीं पाई हैं। कॉलेज की प्रिंसिपल एक ब्रिटिश सिटीजन सिस्टर एंटनिजिया थीं।
वह एक समर्पित इंसान थीं। अगर सीढ़ियों पर उन्हें कोई धागा भी नजर आ जाता तो उसे इकट्ठा करने लग जातीं। हमने उनसे ही नैतिकता का पाठ पढ़ा और जीवन की चुनौतियों का सामना करना सीखा।
मेरी प्राथमिक शिक्षा पटियाला के लेडी फातिमा मॉडल स्कूल में हुई। उस समय छात्र और शिक्षक के बीच अच्छा रिश्ता होता था। शिक्षक मेहनती होते थे। वे अपने छात्र के सर्वपक्षीय विकास के लिए काम करते थे। आज स्कूलों की संख्या में इजाफा भले ही हो गया है, लेकिन शिक्षा का स्तर नीचे आया है। शिक्षक की छवि भी अब पहले जैसी नहीं रही।
हमारे टीचर्स हमारे रोल मॉडल थे। अभिभावकों ने सिखाया था कि स्कूल एक मंदिर है, जिसका पूरा सम्मान किया जाना चाहिए। उनकी उच्च शिक्षा हिमाचल के सेक्रेड हार्ट कॉलेज डल्हौजी से हुई। अपनी प्रिंसिपल के साथ रिश्ते को आज भी वह भुला नहीं पाई हैं। कॉलेज की प्रिंसिपल एक ब्रिटिश सिटीजन सिस्टर एंटनिजिया थीं।
वह एक समर्पित इंसान थीं। अगर सीढ़ियों पर उन्हें कोई धागा भी नजर आ जाता तो उसे इकट्ठा करने लग जातीं। हमने उनसे ही नैतिकता का पाठ पढ़ा और जीवन की चुनौतियों का सामना करना सीखा।
भविष्य उज्ज्वल बनाने में स्कूल टीचर का अहम रोल: डीसीपी
हर बच्चे के भविष्य को मजबूत व उज्ज्वल बनाने का दारोमदार स्कूल टीचर पर होता है। बच्चों के भविष्य की नींव स्कूल टीचर ही तैयार करते हैं। उस दौरान की सीख हर छात्र के दिमाग में अंत तक रहती है। छात्रों के अपने-अपने अनुभव रहते हैं। स्कूल स्तर पर टीचर हर छात्र को भविष्य की चुनौतियों का सामना करना और उन पर विजय हासिल करने के योग्य बनाते हैं। किसी भी शिक्षक के लिए गौरव की बात होती है, जब उनका पढ़ाया छात्र समाज को उत्कृष्ट सेवाएं देने योग्य बनता है। गुरु-शिष्य के अटूट संबंध से ही सकारात्मक समाज का सृजन होता रहा है। शिक्षक दिवस पर यह विचार डीसीपी, पंचकूला कमलदीप गोयल ने अमर उजाला से साझा किए।
कंटेंट में बदलाव नहीं तरीके बदले
डीसीपी कमलदीप गोयल ने बताया कि शिक्षा पद्धति में पहले के मुकाबले कोई व्यापक अंतर नहीं आया है। कंटेंट में कोई बदलाव नहीं आया है लेकिन पठन-पाठन के तरीकों में बदलाव जरूर आया है। उन्होंने कहा कि स्कूल स्तर की कक्षाओं में जो कंटेंट पहले के थे, वही आज भी हैं। हालांकि पढ़ाई के तरीकों में बदलाव आने से बच्चे अब क्रिएटिव जरूर हुए हैं।
सोशल साइट का सदुपयोग करें तो हैं अच्छे दोस्त
डीसीपी कमलदीप गोयल ने बताया कि वर्तमान समय में सोशल साइट से चंद सेकेंड में व्यापक जानकारी हासिल की जाती है। इसका छात्र जीवन में अहम योगदान हो चुका है। प्राइमरी विंग के छात्रों से लेकर न केवल कॉलेज लाइफ, बल्कि शिक्षा पूरी होने के बाद तक अब हर कोई इन पर निर्भर रहता है। यदि सोशल साइट्स का सदुपयोग किया जाए तो वे एक अच्छी दोस्त हैं। जो शिक्षा ग्रहण के लिए हर छात्र के लिए हर समय मददगार रोल अदा करती हैं।
कंटेंट में बदलाव नहीं तरीके बदले
डीसीपी कमलदीप गोयल ने बताया कि शिक्षा पद्धति में पहले के मुकाबले कोई व्यापक अंतर नहीं आया है। कंटेंट में कोई बदलाव नहीं आया है लेकिन पठन-पाठन के तरीकों में बदलाव जरूर आया है। उन्होंने कहा कि स्कूल स्तर की कक्षाओं में जो कंटेंट पहले के थे, वही आज भी हैं। हालांकि पढ़ाई के तरीकों में बदलाव आने से बच्चे अब क्रिएटिव जरूर हुए हैं।
सोशल साइट का सदुपयोग करें तो हैं अच्छे दोस्त
डीसीपी कमलदीप गोयल ने बताया कि वर्तमान समय में सोशल साइट से चंद सेकेंड में व्यापक जानकारी हासिल की जाती है। इसका छात्र जीवन में अहम योगदान हो चुका है। प्राइमरी विंग के छात्रों से लेकर न केवल कॉलेज लाइफ, बल्कि शिक्षा पूरी होने के बाद तक अब हर कोई इन पर निर्भर रहता है। यदि सोशल साइट्स का सदुपयोग किया जाए तो वे एक अच्छी दोस्त हैं। जो शिक्षा ग्रहण के लिए हर छात्र के लिए हर समय मददगार रोल अदा करती हैं।