शिक्षक दिवस: अध्यापक वो मोमबत्ती है जो स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाश देती है...
शिक्षक छात्रों के जीवन को एक नया आयाम देते हैं। शिक्षक छात्रों के जीवन में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो शिक्षक अपना पूरा जीवन हमें शिक्षित करने में लगाते हैं और हमें बेहतर इंसान बनने में मदद करते हैं। हालांकि, आमतौर पर, लोग अपने शिक्षकों को भूल जाते हैं, जब वह अपने स्कूल से बाहर निकलते हैं या पासआउट होते हैं। इस प्रकार, शिक्षकों के लिए एक दिन होना बहुत महत्वपूर्ण है, जो केवल शिक्षकों के योगदान के लिए समर्पित हो।
वे मूल रूप से सिरसा की रहने वाली है। उसके पहले गुरु उसके पिता राज कपूर हैं। कॉलेज में पढ़ते वक्त उनके गणित के टीचर रणजीत लैगा थे। जिनसे वो बहुत इंसपायर हुई। उनसे प्रेरित होकर वो सरकारी सेवा में आई। क्षितिज कपूर, असिस्टेंट डायरेक्टर, उद्योग केंद्र पानीपत
मेडिकल की पढ़ाई जोधपुर से की। वहां उनके टीचर डॉ. गिरिश वर्मा थे। उन्होंने हमेशा उन्हें अच्छा डॉक्टर बनने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने बताया कि एक डॉक्टर क्या होता है। लोगों की उनसे क्या उम्मीद होती है। डॉ. निशि जिंदल, डिप्टी सिविल सर्जन पानीपत
अध्यापक ही उनकी सफलता के पीछे का स्तंभ हैं। उनके आदर्श उनके अध्यापक ओमप्रकाश हैं। जिन्होंने उन्हें जीवन में सफल बनाया। हमेशा मॉटिवेट किया। ये बताया कि जीवन में कुछ भी असंभव नहीं है। कमलजीत सिंह, रिजनल ऑफिसर, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड
मेरे जीवन में सबसे आदर्श गुरु हमारे प्राइमरी अध्यापक रतन सिंह धनखड़ रहे। वे गांव खुबड़ू से मेरे पैतृक गांव अहीर माजरा पढ़ाने आते थे। वे हमारे मित्र, दार्शनिक और मार्गदर्शक रहे। उनके मार्गदर्शन से मैंने कामयाबी पाई। रमेश कुमार, जिला शिक्षा अधिकारी
मां-बाप से भी ऊंचा दर्जा होता है अध्यापक का, जो जीवन की सही डगर दिखाते हैं
वैसे तो पुराणों वेदों में शिक्षक को मां-बाप से भी ऊंचा दर्जा दिया गया है, क्योंकि एक अच्छा शिक्षक अपने विद्यार्थियों का जीवन बदल सकता है, लेकिन आज के माहौल में शिक्षक शिक्षा तंत्र में फंस चुके हैं। ये बातें प्रोफेसर राजेंद्र रंजन चतुर्वेदी ने अमर उजाला से शिक्षक दिवस पर विशेष बातचीत के दौरान कही।
उन्होंने कहा कि आज के शिक्षक पर शिक्षा तंत्र द्वारा इतने प्रतिबंध हैं कि वह एक मशीन का खराब पुर्जा बनकर रह गया है। आज का शिक्षक, शिक्षक न रहकर केवल एक नौकर बन चुका है, बल्कि उसकी समस्त सेवाएं केवल नौकरी में ही बीत रही हैं। उन्होंने बताया कि उनके भी दो शिक्षक रहे हैं। जिनसे उन्होंने गुरु ज्ञान प्राप्त किया और एक लंबे अरसे तक बच्चों को शिक्षा दी।
शिक्षक नहीं, राजनीतिक पार्टी का कार्यकर्ता है
उन्होंने अपने अध्यापक डॉ. विद्यानिवास मिश्र, जो उनके डी-लिट के गाइड रहे, का जिक्र करते हुए बताया कि वे कासनी विद्यापीठ के वाइस चांसलर भी रहे हैं। डायरेक्ट भी रहे हैं, कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में भी रहे हैं। इस दौरान उन्होंने डॉ. पदम सिंह शर्मा कमलेश उनके पीएचडी के गाइड थे, जो कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में कार्यरत थे।
ये ऐसे शिक्षक थे, आजादी के दौर में बिना लोभ के उनकी सेवा एक स्वतंत्र व्यक्तित्व के तौर पर आज भी पहचानी जाती है। दोनों शिक्षक उनके लिए प्रेरणा दायक रहे हैं लेकिन आज के समय के जो शिक्षक हैं, उनमें से अधिकतर राजनीतिक पार्टियों के साथ जुड़े हैं। वे शिक्षक नहीं बल्कि पार्टी कार्यकर्ता हैं।