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एक बागी की कहानी, 'हजार चौरासी की मां' नाटक का मंचन
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Sat, 19 Nov 2016 01:18 AM IST
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'हजार चौरासी की मां' नाटक का मंचन
- फोटो : अमर उजाला
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चंडीगढ़ सेक्टर - 18 स्थित टैगोर थिएटर में शुक्रवार को चंडीगढ़ संगीत नाटक अकादमी की ओर से आयोजित विंटर थिएटर फेस्टिवल केतीसरे दिन हजार चौरासी की मां नाटक का मंचन सुचेतक रंगमंच की ओर से किया गया। इसका निर्देशन शब्दीश ने किया। नाटक महाश्वेता देवी के उपन्यास हजार चौरासी की मां की कहानी पर आधारित रहा।
नाटक में व्रती नाम के लड़के का संघर्ष दिखाया गया है। वह अपने घर के हालात को देखकर बागी बन जाता है। उसके घर में बहनों का अवैध संबंध और मां सुजाता चटर्जी की ओर से इस पर कोई सुधार नहीं किया जाता है। वह समाज में अच्छा काम करने के लिए बाघी बनता है लेकिन वह मारा जाता है। मुर्दाघर में उसे हजार चौरासी की मां का नंबर दिया जाता है। व्रती की मौत के बाद उसकी मां सुजाता चटर्जी को अहसास होता है कि अगर समय रहते हर हालात पर सुधार कर लिया जाता तो इस तरह केहालात का सामना नहीं करना पड़ता। नाटक के माध्यम से नक्सलवाद के आंदोलन को जीवंत दिखाया गया है। इस नाटक के माध्म से दर्शाया गया कि लोग नक्सली 1970 के दशक में क्यों बने? नाटक देखकर पूरा ऑडिटोरियम तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
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नाटक में व्रती नाम के लड़के का संघर्ष दिखाया गया है। वह अपने घर के हालात को देखकर बागी बन जाता है। उसके घर में बहनों का अवैध संबंध और मां सुजाता चटर्जी की ओर से इस पर कोई सुधार नहीं किया जाता है। वह समाज में अच्छा काम करने के लिए बाघी बनता है लेकिन वह मारा जाता है। मुर्दाघर में उसे हजार चौरासी की मां का नंबर दिया जाता है। व्रती की मौत के बाद उसकी मां सुजाता चटर्जी को अहसास होता है कि अगर समय रहते हर हालात पर सुधार कर लिया जाता तो इस तरह केहालात का सामना नहीं करना पड़ता। नाटक के माध्यम से नक्सलवाद के आंदोलन को जीवंत दिखाया गया है। इस नाटक के माध्म से दर्शाया गया कि लोग नक्सली 1970 के दशक में क्यों बने? नाटक देखकर पूरा ऑडिटोरियम तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
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