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SYL पर सुप्रीम कोर्ट की केंद्र, पंजाब और हरियाणा सरकार को सख्त हिदायत

Thu, 19 Jan 2017 02:36 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, नई दिल्ली/रोहतक
ब्यूरो/अमर उजाला, नई दिल्ली/रोहतक Updated Thu, 19 Jan 2017 02:36 PM IST
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supreme court strict norification to modi govt, punjab govt and haryana govt in case of syl
सतलुज यमुना लिंक नहर - फोटो : फाइल फोटो
विवाद का विषय बनी सतलुज-यमुना लिंक (एसवाईएल) नहर पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में हरियाणा, पंजाब और केंद्र सरकार को हिदायत दी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इस मामले में वर्ष 2004 में पारित उसके आदेश की अवहेलना हो, ऐसा वह कतई नहीं चाहता। शीर्ष अदालत ने कहा कि हम किसी भी व्यक्ति द्वारा किसी तरह से आदेश की अवहेलना की इजाजत नहीं दे सकते।
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न्यायमूर्ति पीसी घोष और न्यायमूर्ति अमिताभ रॉय की पीठ ने केंद्र सरकार और पंजाब व हरियाणा सरकार की पैरवी कर रहे वकीलों से कहा कि शीर्ष अदालत द्वारा वर्ष 2004 में पारित आदेश की अवज्ञा करने की इजाजत किसी को भी नहीं है। यह आपको देखना है, यह कैसे होगा, यह आपकी सिरदर्दी है। पीठ ने यह टिप्पणी हरियाणा सरकार द्वारा दायर उस याचिका पर सुनवाई के दौरान की, जिसमें वर्ष 2004 के आदेश के अनुपालन की गुहार की गई है।
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पीठ ने हरियाणा सरकार की याचिका पर केंद्र और पंजाब सरकार को नोटिस जारी करते हुए जवाब दाखिल करने के लिए कहा है। केंद्र को इसी हफ्ते और पंजाब सरकार को तीन हफ्ते में जवाब देने के लिए कहा गया है।
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अधिसूचना को निरस्त किए बिना कुछ नहीं कर सकते

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सतलुज यमुना लिंक नहर को पाटते हुए लोग - फोटो : अमर उजाला
केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल रंजीत कुमार ने सुनवाई के दौरान पीठ के समक्ष कहा कि प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर वर्ष 2016 में संविधान पीठ द्वारा दिया गया निर्णय एडवाजरी है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2004 में सुप्रीम कोर्ट ने सतलुज-यमुना नहर के निर्माण का आदेश दिया था।

इसके बाद वर्ष 2004 में ही पंजाब विधानसभा ने पंजाब टर्मिनेशन ऑफ एग्रीमेंट एक्ट पारित कर दिया और राज्यपाल ने भी इस पर मुहर लगा दी। यह कानून अब भी प्रभावी है। सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि जब तक इस अधिसूचना को निरस्त नहीं किया जाता, तब तक इस मामले में कुछ अधिक नहीं किया जा सकता। 

बता दें कि हरियाणा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक अर्जी दायर कर एसवाईएल की जमीन सुरक्षित रखने के लिए रिसीवर नियुक्ति की मांग की थी ताकि जमीन व आधी बन चुकी नहर को कोई क्षति न पहुंचे साथ ही एसवाईएल नहर का निर्माण कराने के कोर्ट के आदेश और डिक्री को लागू करने की भी मांग की थी।

मामले में पंजाब और हरियाणा सरकार की दलीलें

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SYL पर बैठक - फोटो : अमर उजाला
क्या कहा हरियाणा सरकार ने
हरियाणा सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील जगदीप धनकड़ ने पीठ से कहा कि संविधान के अनुच्छेद-144 का इस्तेमाल करते हुए कुछ निर्देश जारी किए जाने चाहिए। केंद्रीय गृह सचिव की रिपोर्ट में यह कहा गया है कि वहां यथास्थिति बनी हुई है, लिहाजा पीठ को अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए निर्देश देना चाहिए। इस पर पीठ ने कहा कि अदालत का आदेश प्रभावी है।

पंजाब सरकार का जवाब
पंजाब सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील राम जेठमलानी ने कहा कि पंजाब एवं हरियाणा ‘सिस्टर स्टेट’ हैं। उन्होंने कहा कि इस मामले में केंद्र सरकार को मध्यस्थता करनी चाहिए और विवाद का हल निकालना चाहिए।

 

जमीन को डिनोटिफाई करने पर क्या हुआ

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Supreme Court
पीठ ने सवाल किया कि पंजाब द्वारा जमीनों को गैर अधिसूचित करने को लेकर क्या हुआ। पीठ ने कहा कि आपने उसे क्यों नहीं चुनौती दी।  खबर यह है कि किसानों को जमीनें वापस की जा रही हैं, हालांकि जमीन के स्वरूप में बदलाव नहीं हुआ है। हम यह जानना चाह रहे हैं कि पंजाब सरकार द्वारा की जाने वाली कार्रवाई को क्या आप अलग से चुनौती देंगे। इस पर वरिष्ठ वकील ने कहा कि इस कार्रवाई पर पहले ही रोक लगा दी गई है।

सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब का कानून कर दिया था रद्द
गत वर्ष 10 नवंबर को उच्चतम न्यायालय ने एसवाईएल  नहर विवाद मामले में पंजाब सरकार को झटका देते हुए जल-बंटवारा समझौते को निरस्त करने संबंधी अधिनियम को अवैध करार दिया था। संविधान पीठ ने जल बंटवारे से संबंधित’पंजाब समझौता निरस्तीकरण अधिनियम 2004 को असंवैधानिक करार दिया। शीर्ष अदालत ने कहा था कि हरियाणा और अन्य पड़ोसी राज्यों के साथ जल बंटवारे का समझौता निरस्त करने के उद्देश्य से पंजाब सरकार द्वारा बनाया गया कानून असंवैधानिक है।

दोनों राज्यों के बीच सियासी मुद्दा बना

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कैबिनेट की बैठक - फोटो : अमर उजाला
पंजाब सरकार के अधिनियम को रद्द करने के बाद दोनों राज्यों में सियासत तेज हो गई थी। हरियाणा सरकार ने जहां इसे बड़ी उपलब्धि बताकर राजनीतिक श्रेय लेने की कोशिश की,वहीं पंजाब सरकार ने विधानसभा सत्र बुलाकर नहर के लिए अधिग्रहीत की गई जमीन किसानों को लौटने का फैसला किया।

16 नवंबर को ही विधानसभा में एक और बिल पेश किया गया। इसमें कहा गया कि पंजाब सरकार एक नवंबर से हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली को दिए नदी पानी की कीमत वसूलेगी। इसके बाद हरियाणा और पंजाब सरकार का एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल इस मामले में राष्ट्रपति से भी मिला था।

हरियाणा सरकार ने सर्वदलीय बैठक के लिए पीएम से भी समय मांग रखा है, जो अभी तक नहीं मिला है। इसे लेकर सरकार पर लगातार सियासी हमले हो रहे हैं।

क्या है एसवाईएल विवाद

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सतलुज यमुना लिंक - फोटो : self
उत्तराधिकार पंजाब पुनर्गठन अधिनियम के अन्तर्गत 1 नवंबर 1966 को हरियाणा अलग राज्य बना, परंतु उत्तराधिकारी राज्यों (पंजाब व हरियाणा) के बीच पानी का बंटवारा नहीं हुआ।

विवाद खत्म करने के लिए केंद्र ने 24 मार्च 1976 को अधिसूचना जारी करके हरियाणा को 3.5 एमएएफ पानी आवंटित कर दिया। 8 अप्रैल 1982 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पटियाला के कपूरी गांव में एसवाईएल की खुदाई की शुरूआत की।

नहर की लंबाई 214 किलोमीटर है, जिसमें 122 किमी लंबाई पंजाब और हरियाणा में 82 किमी है। हिंसा की घटनाओं के चलते पंजाब में 1990 में नहर की खुदाई का काम रोक दिया गया था। 1996 में एसवाईएल नहर का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया।

 
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